फोकस का अभाव या केवल बकलोली की चाह

आज ईद है। कम से कम आज ईद की सरकारी छुट्टी है तो ईद है, इससे अधिक कोई शब्दच्छल नहीं चाहिए।

सोशल मीडिया में बहुतों के लिए मुद्दा यह है कि हमारे त्योहारों को लेकर जो हर तरह का विलाप किया जाता है वह ईद पर क्यों नहीं किया जाता। हम पर जो बंधन लड़े जाते हैं वे उन पर क्यों नहीं लादे जाते, इसी मुद्दे पर छाती कूटना चलता है।

और केवल बकलोली होती है इसके अलावा कुछ नहीं। क्योंकि असल समस्या क्या है, करना क्या है, उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं करना चाहता, और यह अनुभव से कह रहा हूँ।

पहले फोकस की बात करते हैं। क्या हम समस्या को समझे भी हैं?

हम पर किस एंगल से कौन वार करता है? क्या हम इस बात को लेकर स्पष्ट हैं भी?

वा क ई (वामी-कसाई-इसाई) गिरोह में से क्या कसाई-इसाई हम पर त्योहारों को लेकर कभी प्रत्यक्ष वार करते भी हैं? क्या वामी भी अपने झंडे तले हम पर हमला बोलते हैं? कृपया हर शब्द को ध्यान से पढ़िये और उसके बाद ही प्रतिक्रिया देने की सोचिए।

तो क्या आप अब स्पष्ट हैं कि हम पर जो वार करते हैं उनकी पहचान क्या है?

ये आप को NGO के रूप में मिलेंगे। जन्मना हिन्दू ही मिलेंगे और भले ही कामरेड हों, यहाँ पर्यावरण, गरीब आदि फॉर्म्युला ही रटते रहेंगे।

वे मीडिया द्वारा जनमत का दिखावा करेंगे। आप को एक बात बताता हूँ, एक प्रोफेशनल दिखता वीडियो कैमरा ले जाइए और रास्ते चलते किसी साधारण स्त्री पुरुष से बात कीजिये, उससे आप अपनी मर्जी की बात बुलवा सकते हैं। प्रश्न पूछने की टेक्निक होती है जिससे अगर व्यक्ति ट्रेंड न हो तो आसानी से वांछित उत्तर दे देगा। जिसको ‘हमने सर्वे किया है’ कर के ज़ोर शोर से प्रचारित किया जाएगा।

त्योहारों को प्रदूषण के मुद्दे पर घेरना बहुत आसान है। लेकिन उसके लिए भी मेहनत लगती है। मेहनत है तो समय लगता है और समय लगता है तो उसके पैसे भी लगते हैं। मेहनत का डाटा बनता है, डाटा को तथ्य में मोल्ड किया जाता है, तथ्य को रंग रोगन कर के सत्य की शक्ल दी जाती है। ये सभी स्किल के काम हैं और ये स्किल्स महंगे आते हैं। तो जाहिर है इसमें प्रचुर धन लगता होगा।

ये धन कौन देता है और ये कहाँ से आता है, इस पर अटकलें बहुत हैं लेकिन ठोस सबूत नहीं। ऐसे कोई कानून भी नहीं जो इस धन के इस तरह के विनियोग को रोकें। जब तक सीधा सीधा प्रतिबंधित संगठनों को फंडिंग सिद्ध नहीं किया जाता, आप किसी NGO पर देश विघातक कार्रवाई का आरोप लगा नहीं सकते।

सरकार केवल उनके आर्थिक व्यवहार का हिसाब मांगकर, उसे न देने पर उनको बंद करवा सकी है। अगर कोई हिसाब दे दे तो वह NGO बंद नहीं होगा। और दूसरे नाम से कारोबार करने से किसने रोका है? कागज़ी काम क्या होता है किसको नहीं पता? कानून भी कागज़ के बाहर के सबूत नहीं स्वीकारता।

नेता की संपत्ति अगर दूसरे के नाम से है तो दुनिया जानती है कि वो कागज़ी मालिकी केवल कागज़ी ही है लेकिन कानून के लिए वही वास्तव है तो कानून नेता को छू नहीं सकता। हमें इस बात को भी समझकर चलना होगा। सरकार कानून का उल्लंघन नहीं कर सकती।

तो मुद्दा यह है कि जैसे बंदूक से तलवार लेकर नहीं लड़ा जा सकता, बंदूक ही चाहिए, वैसे यहाँ भी कुछ करने की आवश्यकता है। लेकिन हम हैं कि इसके लिए संघ को या भाजपा को दोषी ठहराते हैं। शायद इसलिए क्योंकि यह आसान है, आप पर कोई एक्शन नहीं होगा बल्कि आप के साथ सुर मिलाने के लिए भी बहुत लोग आ जाएँगे। वे आप की हिम्मत बढ़ाएँगे। आप को अच्छा लगेगा कि इतने सारे लोग आप से सहमति जता रहे हैं और आप ये देखना भूल जाएँगे कि वे असल में हैं कौन।

क्या यह सत्य नहीं कि इन पर एक्शन हो यह आप की आंतरिक इच्छा है? तो फिर यह बताइये कि आप की इस इच्छा की पूर्ति के लिए आप क्या कर रहे हैं?

प्रदूषण के मुद्दे पर उनके त्योहारों पर भी एक्शन हो सकता है लेकिन इसलिए हमें ही लड़ना पड़ेगा। कोई पार्टी नहीं लड़ेगी, एक सामाजिक संगठन को यह ज़िम्मेदारी उठानी होगी।

हमारे त्योहारों पर या धर्मस्थलों पर नकेल कसने वे न खुद आते हैं, न कोई पार्टी आती है, यह आप ने नोट किया भी है या नहीं? तो यह समझ लीजिये कि इस खेल के नियम उन्हें पता हैं और हम बिना खेले ही ‘हार गया रे, मार दिया रे’ कर के किकिया रहे हैं। अपनी ओर से अपने खिलाड़ी तैयार भी नहीं करवा रहे। और जैसे अभी बता दिया है, कोई भी पक्ष यह काम नहीं कर सकता और न करेगा।

समाज के योगदान से धार्मिकों को जोड़कर यह काम को परिणाम दिया जा सकता है। इसके लिए निधि की आवश्यकता होती है। हमारे शत्रु यही कर रहे हैं। ईमानदारी से अपना आर्थिक सहयोग दे रहे हैं, संगठन या तो बना रहे हैं या अपने काम के संगठनों को वित्तपोषित कर रहे हैं। जिसका परिणाम तो हमारी चीखें निकलने में हो रहा है, बस उनकी खुशी सार्वजनिक नहीं हो रही।

हम क्या कर सकते हैं इसकी मैंने एक बहुत संकीर्ण झांकी एक गणित द्वारा प्रस्तुत की थी। वृहत की सोचिए, संकीर्ण नहीं, और उसका पोटेन्शियल सोचिए।

जाने दीजिये, सिरदर्द होगा। तो मोदी जी को चार गालियां दीजिये, संघ को भी चार गालियां दीजिये और नोटा का 108 बार जप कीजिये।

लेकिन आप को तो स्वयं को सक्षम और समर्थ नहीं करना, बस नोटा दबाना है!

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