यादों के झरोखे से : बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी अटल जी

पिछले दिनों मैंने पंजाब केसरी के अपने साप्ताहिक कॉलम में अटल जी से संबंधित संस्मरणों का उल्लेख किया था। इसके पश्चात् अनेक मित्रों ने आग्रह किया है कि इस विषय पर कुछ और प्रकाश डाला जाए। इस संबंध में मैं यह लेख ऐसे ही मित्रों को नज़र कर रहा हूं।

मितव्ययी अटल जी :

प्रारम्भ में जनसंघ और संघ से संबंधित अन्य संगठनों की आर्थिक स्थिति बहुत जर्जर हुआ करती थी क्योंकि आर्थिक सहयोग का एकमात्र साधन गुरुदक्षिणा ही हुआ करता था। यही कारण है कि जनसंघ के जो सांसद होते थे उन्हें अपने वेतन और भत्तों का आमतौर पर नब्बे प्रतिशत भाग पार्टी निधि में देना पड़ता था। उन्हें गुजारा के लिए औसतन एक सौ रुपए ही मासिक मिला करते थे। यही कारण है कि प्रारम्भ में अटल जी का हाथ हमेशा तंग रहता था।

इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि दिल्ली में आने के बाद एक दशक तक अटल जी के पास अपना कोई निजी वाहन नहीं था और वह आम यात्रियों जैसे ही डीटीसी की बसों में धक्के खाते हुए यात्रा किया करते थे। मुझे इस बात का भलीभांति स्मरण है कि तब साउथ एवेन्यू से संसद भवन तक का टैक्सी भाड़ा तीन रुपए लगा करता था। अनेक बार इच्छा होते हुए भी अटल जी टैक्सी का उपयोग नहीं कर पाते थे और पैदल ही संसद भवन जाया करते थे।

संगीत प्रेमी अटल जी :

इस बात को बहुत कम लोग जानते होंगे कि अटल जी को संगीत से गहरा लगाव था। इसका पहली बार अनुभव मुझे साठ के दशक में दिल्ली से हिसार तक उनके सहयात्री के रूप में हुआ। उन दिनों ‘कोरा कागज़’ फिल्म रिलीज़ हुई थी। जब हम दिल्ली से टैक्सी में हिसार जा रहे थे तो रास्ते में अटल जी के कानों में इस गाने के कुछ अंश पड़े। इस गाने के जादूई प्रभाव में अटल जी खो गए।

उन दिनों संघ एवं जनसंघ के नेता किसी होटल या डाक बंगले में ठहरने की बजाय अपने किसी कार्यकर्ता के घर ही ठहरा करते थे। हिसार में हम श्री बंसल के घर में रुके। अटल जी ने मुझे बुलाकर निर्देश दिया कि वह बंसल जी से अनुरोध करें कि वे इस फिल्म के रिकॉर्ड कहीं से उपलब्ध करवाएं जिसके बोल थे ‘कोरा कागज़ सा मन मेरा’।

मैंने अटल जी की इच्छा के बारे में बंसल जी को अवगत करा दिया। उन दिनों टेप रिकॉर्डर का चलन नहीं था। ग्रामोफोन पर ही रिकॉर्ड लगाकर गीत सुने जाते थे। बंसल जी ना जाने कहां से एक ग्रामोफोन और रिकॉर्ड ले आए। अटल जी इस गाने के संगीत में खो गए और उन्हें अपना होश ना रहा।

कार्यकर्ताओं की नजर में मैं अटल जी का पी.ए. था इसलिए वे मुझसे बार-बार आग्रह कर रहे थे कि अटल जी को जल्द ही जनसभा में भेजा जाए और वे वहां जल्द नहीं पहुंचे तो सभा उखड़ जाएगी। मैं अटल जी से जनसभा में चलने का अनुरोध कर रहा था मगर अटल जी इस गाने के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पा रहे थे। उन्होंने इस गाने को 75 बार सुना और इसके बाद अटल जी जनसभा को सम्बोधित करने के लिए पहुंचे।

कला मर्मज्ञ अटल जी :

1975 की बात है, इमरजेंसी की घोषणा से पूर्व माउंट आबू (राजस्थान) में जनसंघ की कार्यकारिणी बैठक का आयोजन किया गया था। जिसमें भाग लेने के लिए अटल जी के साथ मैं भी वहां गया था। हम दोनों वहां खेती हाउस में ठहरे हुए थे।

एक दिन सुबह-सुबह अटल जी मेरे कमरे में पधारे और मुझे निर्देश दिया कि मैं दरोगा जी (भैंरो सिंह शेखावत) से कल के लिए एक जीप मांग लूं। इसके साथ यह भी निर्देश दिया कि मैं कल के लिए बिल्कुल फ्री रहूं क्योंकि उनके साथ मुझे कल कहीं जाना होगा।

शाम को जब मैं शेखावत जी के पास गया और उनसे जीप मांगी तो उनका पहला प्रश्न यह था कि तुम जीप का क्या करोगे? इस पर मुझे यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि जीप मुझे नहीं बल्कि अटल जी को चाहिए। शेखावत जी का जवाब था कि उनके पास केवल दो ही जीप हैं इसलिए अटल जी को जीप देना उनके लिए सम्भव नहीं होगा। सौभाग्य से उस समय वीरेन्द्र कुमार सकलेचा भी वहीं खड़े थे। जब मैंने उन्हें समस्या बताई तो उन्होंने अपनी जीप उपलब्ध करवाने का आश्वासन दिया।

अगले दिल सकलेचा जी की जीप खेती हाउस में हाजिर थी। मैं और अटल जी उसमें बैठे और हम एक दिशा में रवाना हो गए। थोड़ी देर बाद हम एक स्थान पर पहुंचे। बाद में पता चला कि हम दिलवाड़ा के विश्व विख्यात मंदिरों का अवलोकन करने के लिए आए हैं।

जो लोग दिलवाड़ा गए होंगे वह इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि दिलवाड़ा के यह मंदिर ऊपरी तौर पर बहुत ही मामूली नजर आते हैं मगर जब आप उनके भीतर जाकर अवलोकन करते हैं कि वे भारतीय मूर्तियों कला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में शामिल हैं।

सुबह आठ बजे से लेकर अटल जी दोपहर तक इन मंदिरों की मूर्तियों को निहारते रहे और मुझे उनके इतिहास और कला की बारीकियों से अवगत कराते रहे। दोपहर के समय अटल जी ने मुझसे कहा कि खाने की क्या व्यवस्था होगी, भूख लगी है।

मैंने कहा कि यहां तो मुझे कोई व्यवस्था नजर नहीं आती मगर अटल जी के जोर देने पर मैं मंदिर प्रबंधकों के पास गया तो पता चला कि वहां दो रुपए में शाकाहारी थाली भोजन काल में मिलती है मगर उसे प्राप्त करने के लिए लाइन में लगना पड़ता है और इसके बाद बर्तनों को स्वयं ही धोना पड़ता है।

मैं दो टोकन ले आया और मैं और अटल जी लाइन में लग गए। नम्बर आने पर हमें दो थालियां थमा दी गई। हम दोनों ने पेट-पूजा की। इसके बाद मैं अपनी थाली धोने लगा। अटल जी ने जैसे ही अपनी थाली धोने लगे तो मंदिर के एक प्रबंधक ने पूछा कि यह अटल जी हैं? तो मैंने सहमति से सिर हिलाकर हां। मुझे याद है कि दो दिन तक निरंतर सुबह से शाम तक अटल जी भारतीय मूर्तिकला के इन अनमोल भंडारों को अवलोकन करने में जुटे रहे। यह उनके गहरे कला प्रेम का संकेत है।

मानवतावादी अटल जी :

अटल जी के स्वभाव में मानव प्रेम कूट-कूटकर भरा हुआ था। यही कारण है कि हम जिस भी जगह पहुंचते वहां पहुंचते ही अटल जी संबंधित व्यक्ति को इस बात का कड़ा निर्देश देते थे कि चालक के भोजन और आवास की समूचित व्यवस्था की जाए। आमतौर पर अटल जी चालक को व्यक्तिगत रूप से बुलाकर पूछते थे कि उसके भोजन और आवास की उचित व्यवस्था हुई या नहीं। यह गुण पंडित नेहरु में भी था।

…जारी

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