जब आपकी हैसियत ही नहीं मुद्दों पर बात करने की, तो करने क्या गए थे वहां?

चंद महीनों पहले जापान में कॉन्फ्रेंस के दौरान 400 लोगों की भीड़ में मुझे एक भारतीय जैसी शक्ल सूरत का आदमी दिखा।

बाकी सारे गोरे सोरे चिंकी पिंकी मौजूद थे कॉन्फ्रेंस में। वो अपने टाइप का दिखा, खुशी हुई देखकर।

एक दूसरे को देखकर हम मिले, मैंने उससे हिंदी में बात की तो पता चला जनाब पाकिस्तान से हैं।

बंदा बहुत ही अदब व तहज़ीब से बात कर रहा था। खाने की प्लेट हाथ में देता, खाना सर्व कर देता। सुबह मिलते ही हाल चाल लेता। एकदम व्यवहार कुशल व्यक्ति था।

मेरे कलीग ने बोला कि कितने प्रेम से मिल रहा है पाकिस्तान वाला, दो देशों के बीच ये दुश्मनी क्यों है ये समझ के परे है?

हमने कहा कि साहब, गफलत मत पालिए, दोस्ती दुश्मनी मुद्दे पर होती है, दो देशों के बीच दुश्मनी का मुद्दा है, इसलिए दुश्मनी है। आपके व्यक्तिगत बात व्यवहार से इसका कोई लेना देना नहीं है।

यहां आपके हित व उसके हितों में कोई टकराव नहीं है, तो प्रेम उमड़ रहा है। लेकिन गलती से भी जब हितों में टकराव होता है तो भाई भाई भी दुश्मन हो जाते हैं, भारत पाकिस्तान की बात ही क्या? इसीलिए व्यक्तिगत बात चीत से इन मुद्दों पर गफलत मत पालिए।

इमरान खान को बधाई देकर लौटे नवजोत सिंह सिद्धू को सुना तो मुझे उस दिन उन कलीग की बात याद आ गई।

सिद्धू का कहना है कि वो पाकिस्तान से प्यार मोहब्बत से मालामाल होकर लौटे हैं। तब से पाकिस्तान के साथ प्रेम पूर्ण संबंधों के कशीदे गढ़ रहे हैं। भाव विभोर इतने कि खुशी का ठिकाना ही न हो, जिंदगी में पहली बार किसी ने इतना प्यार दिया।

यदि ऐसा है तो लगे हाथों सिद्धू जी प्यार प्यार में पाक अधिकृत कश्मीर मांग लेते, सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर अंकुश मांग लेते, जेल में बंद फौजियों की रिहाई मांग लेते, सीमा पर सीज़ फायर का अनुपालन मांग लेते, नाभिकीय हथियारों का समर्पण मांग लेते।

यदि ये सब मांग लेते तो आपको बामुलाहिजा तोप के मुहाने पर बैठाकर बाकायदा भारत लॉन्च किया जाता। तब आपको व्यक्तिगत रिश्ते और दो देशों के रिश्ते का अंतर साफ हो जाता।

प्रश्न यही उठता है कि वहां आप गए किस हैसियत से थे, व्यक्तिगत या राजनैतिक?

वैसे जब आपकी हैसियत ही नहीं इन मुद्दों पर बात करने कि तो फिर वहां करने क्या गए थे? लंपट गिरी करने?

दो देशों के सैनिकों के बीच कौन सी व्यक्तिगत दुश्मनी है, लेकिन जब देश के लिए खड़े होते हैं तो दुश्मनी हो जाती है, जहां देश की आन बान शान पर बात आए, वहां दुश्मनी होनी चाहिए।

लेकिन ये बात इसके जैसे अर्धभाड़ेश्वर व्यक्ति के समझ के परे है। सेनाध्यक्ष से गले मिलकर इन्होंने देश एवं शहीदों का अपमान किया है। जिसे इतनी समझ न हो, वो नेतागिरी छोड़े, अपनी हैसियत मुताबिक काम करे।

‘मालकिन’ के आदेश के सामने देश का मान तो बहुत तुच्छ वस्तु

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