लेकिन आप को तो स्वयं को सक्षम और समर्थ नहीं करना, बस नोटा दबाना है!

क्या आप ने यह गणित कभी कर के देखा है?

130 का 15% = 19.5
19.5 / 4 = 4.875
4.875 x 5 x 365 = 8896.875

अगर आप केवल आंकड़े देखकर सोच रहे हैं कि इनका अर्थ क्या होता है तो लीजिये स्पष्टीकरण दे रहा हूँ।

130 करोड़ जनसंख्या का 15% होता है 19.5 करोड़।

19.5 करोड़ में चार का भाग इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि एक चतुर्थांश (प्रत्येक चार में से एक) को ही कमानेवाला व्यक्ति मान रहा हूँ। ये होते हैं 4.875 करोड़।

अगर ये 4.875 करोड़ लोग हर दिन केवल पाँच रुपये एक अलग गुल्लक में जमा करेंगे तो वर्ष के 365 दिनों के हिसाब से 4.875 x 5 x 365 = 8896.875 करोड़ रुपये एक साल में जमा होंगे। और केवल नकद जमा की बात कर रहा हूँ। आगे देखते हैं ये सब क्या है।

19.5 करोड़ हुई 15% सवर्णों की जनसंख्या, जिसका आजकल सोशल मीडिया में पता नहीं कितने लोग हवाला दे रहे हैं। तो यह आप का ही दिया आंकड़ा है जिसपर यह गणित आधारित है।

अब यह बात तो प्रमाणित है कि आप के बीच असामान्य प्रतिभा के धनी बैठे हैं जिनमें से कई लोग MNC के लिए फाइनान्स मैनेज करते हैं। उनको मार्केट रेट से सैलरी देकर इस राशि की वृद्धि करने को भी कहा जा सकता है।

इससे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय तक खोले जा सकते हैं जहां आप वामी विचारधारा के लोगों को बाहर रखकर सही विद्वानों को निर्भय होकर अपना काम करने को आश्वस्त कर सकते हैं।

बाकी सिलैबस सर्व स्वीकार्य और उत्तम दर्जे का हो तो विद्यार्थियों को नौकरियाँ भी मिल सकती हैं। जो सवर्ण उद्यमी हैं, वे इन्हें पात्रता अनुसार अपने उद्यमों में नौकरी दे सकते हैं। यह राशि का अपना सामर्थ्य है जो समाज को साथ बांध सकता है तथा संघर्ष के लिए संबल दे सकता है।

मुकदमे के डर से जो आज victim होने का विलाप सुनाई देता है वो नहीं होगा। आदमी अपमानजनक समझौता तब ही कर लेता है क्योंकि जब खुद को हर तरह से अकेला पाता है। अगर सहायता उपलब्ध की जाये तो अन्याय से लड़ने के लिए लोग खड़े होंगे जो कि अतिशय आवश्यक है।

कई उद्यम उपक्रम भी शुरू किए जा सकते हैं जिनसे बेरोजगारी की समस्या का हल सामाजिक तौर पर ही निकल सकता है, सरकार के पास उतनी नौकरियाँ होती ही नहीं। चंद मुट्ठीभरों के भी मोहताज नहीं रहेंगे।

करने को तो बहुत कुछ है और किया जा सकता है। सब कुछ लिखना आवश्यक नहीं है और लोग अपना दिमाग भी लगा सकते हैं, लगाने चाहिए भी। और रोज के केवल पाँच रुपये कोई बोझ नहीं है।

लेकिन आप को स्वयं को सक्षम और समर्थ नहीं करना, बस नोटा दबाना है।

और हाँ, यहाँ बस सवर्णों की अनुमानित संख्या की बात की है तो केवल सवर्ण संख्या का सकारात्मक पोटेन्शियल समझाने के लिए। लेकिन जिस योजना की मैं कई बार बात करते रहता हूँ वो वृहत हिन्दू के लिए ही है।

वैसे आप अगर इस आंकड़े से चकित हुए हैं तो यह सोचिए यह आंकड़ा बस दिन के पाँच रुपये बचाकर निकल आया है। मुसलमान जो सालाना ज़कात देते हैं वो उनकी संपत्ति का 2.5% कम से कम देना होता है, और वे दे सकते हैं तो अक्सर उससे ज़्यादा ही देना चाहते हैं। हर कमाता हुआ मुसलमान ज़कात देता है, देना चाहता है। उनकी मस्जिदें, मदरसे और मज़ारों को पैसे कहाँ से आते हैं, समझ तो गए ही होंगे अब ?

फिर भी, आप को स्वयं को सक्षम और समर्थ नहीं करना, बस नोटा दबाना है।

बात समाप्त। सहमत हैं तो अधिकाधिक शेयर करें। मैं तो कुछ और सालों में चला जाऊंगा लेकिन कोई तो इस काम को अंजाम दे तो समाज के ही काम आयेगा।

जहां मौका मिले, प्रकट हो ही जाता है उनके भीतर का पशु

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