मॉरीशस में 11वां विश्व हिंदी सम्मेलन

11वां विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस में संपन्न हुआ।अपने यहां तो हम हिंदी को पूर्ण रूप से एक सम्मानजनक स्थान नहीं दिला सके, सम्भव है विदेश में इस भाषा की पैरवी कर कुछ संतोषजनक नतीजे निकलें होंगे।

वैसे, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अच्छे रोज़गार को पाने के लिए, उच्च ज्ञान को हासिल करने के लिए, विदेशों में नौकरी पाने के लिये या फिर निजी क्षेत्र की कंपनियों में अच्छी नौकरी पाने के लिए अभी भी अंग्रेज़ी का वर्चस्व बना हुआ है।

इस वर्चस्व को कैसे कम किया जाय, इस बात पर मनन होना चाहिए। पूरी सम्भावना है कि मारीशस सम्मेलन में इस मुद्दे पर चर्चा अवश्य हुयी होगी।

मैं ने अपनी तीनों संतानों को हिंदी माध्यम से ही शिक्षा दिलवाई। अब वे बड़े हो गए हैं, सयाने हो गए हैं। कभी कभी टोकते हैं।’ क्या आपने हमको हिंदी माध्यम से पढ़वाया? हमारे सहपाठी जो अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े, कहाँ से कहाँ पहुंच गए!’ मेरे पास उन्हें संतुष्ट करने के लिए कोई माकूल जवाब नहीं।

विज्ञान, तकनीकी, प्रबंधन, कम्प्यूटर आदि को लीजिए। अंग्रेज़ी का वर्चस्व कहाँ नहीं है? सच्चाई तो यह है कि जिस गति से हम हिंदी को बढ़ावा दे रहे हैं उससे तिगुनी/चौगुनी रफ्तार से अंग्रेज़ी हाथ-पैर पसार रही है।

दरअसल, जब तक हिंदी ज्ञान-विज्ञान की भाषा/संवाहिका नहीं बनेगी तबतक इसके वैश्विक स्वरुप की कल्पना नहीं की जा सकती है। मात्र कविता, कहानी, उपन्यास आदि के बल पर हिंदी को विश्व भाषा नहीं बनाया जा सकता।

अभियांत्रिकी, भौतिकी, रसायन विज्ञान, नृविज्ञान, समाजशास्त्र, पर्यटन, प्रबंधन, सोशल मीडिया, जनसंचार, भूगोल, मनोविज्ञान, मनोचिकित्सा, चिकित्साशास्त्र, शल्यक्रिया आदि ज्ञान–विज्ञान की इन विविध धाराओं पर स्तरीय पुस्तकें प्रकाशित कर हम हिंदी को विश्व पटल पर प्रतिष्ठित कर सकते हैं ।

कवियों, कहानीकारों अथवा नाटककारों की जमात तैयार करने से हिंदी का भला नहीं होने वाला। विज्ञान, तकनीकी, प्रबंधन, कम्प्यूटर आदि ज्ञान धाराओं को लेकर जिस दिन हिंदी में मौलिक पुस्तकें लिखी जाने लगेंगी, समझ लीजिये उस दिन हिंदी विश्वमंच पर अपना परचम फहराएगी।

हिंदी में लिखी ऐसी ज्ञान-गर्भित मौलिक पुस्तकों के जिस दिन विदेशी भाषाओँ मे अनुवाद होंगे, समझ लीजिये हिंदी के दिन फिर गए। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हमें अनुवाद रूपी जूठन से ही काम चलाना होगा। हिंदी भाषी क्षेत्रों के अलग-अलग विषयों के मेधावी स्कॉलर यह चुनौती स्वीकार कर सकते हैं।

सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपॉल को विनम्र श्रद्धांजलि

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