द्रविड़-नाडु : विदेशी आकाओं के इशारे पर भारतीय कठपुतलियों का नया शिगूफा

केरल में आयी जलप्रलय में फंसे निवासियों और जीव-जन्तुओं को जहाँ सरकार, सेना, सामाजिक संगठन और एक आम व्यक्ति मदद पहुंचा रहे हैं, वही कुछ लोगों को इस प्राकृतिक विपदा में भी सरकार को घेरने का अवसर दिखाई दे रहा है।

यद्यपि मैं इस प्रकार की राजनीति से प्रेरित आलोचना से सहमत नहीं हूं, लेकिन फिर भी हर व्यक्ति को आलोचना का अधिकार होता है, समय चाहे अच्छा हो या बुरा।

लेकिन इस बाढ़ की आड़ में कुछ लोगों ने दक्षिण भारतीय प्रांतों को भारत से अलग होने के लिए उकसाना शुरू कर दिया, आर्टिकल लिखने शुरू कर दिए।

यह वही लोग हैं जो कांग्रेसियों द्वारा पोषित रहे हैं और विदेश में बैठे अपने आकाओं, और देश में बैठे विदेशियों से आदेश लेते रहते हैं।

इन लोगों ने एक लेख लिखा कि दक्षिण भारत के पांच राज्यों के लोग भारत की जनसँख्या का कुल 20 प्रतिशत है, जबकि राष्ट्र के टैक्स में उनका योगदान 30 प्रतिशत है। अगर एक दक्षिण भारतीय संयुक्त राज्य नामक राष्ट्र होता तो वे अपनी आपदाओं और विकास के लिए अधिक धन खर्च कर पाते।

अब ज़रा इस लेख को तर्क की कसौटी पर परखते हैं। अगर इनके कहे को धर्म पर आधारित संख्या पर लागू कर दिया जाए तो क्या वह पत्रकार या बुद्धिजीवी यह कहने का साहस करेंगे कि सनातन धर्म के अनुयायियों से मिलने वाला पैसा अन्य समुदायों पर खर्च ना किया जाए।

या फिर मुंबई जिसका भाग पूरे देश की आय में लगभग 18-19 प्रतिशत है उसका पैसा सिर्फ मुंबई में लगे। या फिर एक राज्य में बनने वाला उत्पाद बाकी राज्यों में क्यों बेचा जाए?

आखिरकार दक्षिण के राज्यों को टैक्स में इतनी आय कहां से मिलती है? क्या सारा का सारा टैक्स उन्होंने दक्षिण के उन 5 राज्यों से वसूला है?

प्रत्यक्ष करों के द्वारा ही सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि धन का ट्रांसफर अमीर लोगों से गरीब लोगों की तरफ किया जा सके और समाज में असमानता कम की जा सके। क्या आप इस नीति से सहमत नहीं है?

आखिरकार टाटा, बिड़ला, अम्बानी के टैक्स का पैसा उन्ही के मालिकों और कर्मचारियों पर क्यों नहीं व्यय किया जाए? आप टाटा, बिड़ला, अम्बानी के खिलाफ क्यों लिखते रहते है? क्या वह सबसे अधिक टैक्स नहीं दे रहे है?

राष्ट्रपति ट्रम्प की आलोचना क्यों करते है जब वह कहते हैं कि अमेरिका नाटो के द्वारा यूरोप की सुरक्षा करने का पैसा नहीं दे सकता।

आप अपने राज्यों के निर्धन वर्ग के लिए दो रुपये किलो चावल, या अम्मा कैंटीन या इंदिरा कैंटीन क्यों चलाते है? आखिरकार उनका उस 30 प्रतिशत टैक्स में कितना योगदान है?

लेकिन सबसे बड़ा विरोधाभास तो यह है कि आप उन लोगों को शरण देने की बात करते हैं जिन्होंने भारत या आपके खज़ाने में कोई टैक्स ही नहीं दिया। आखिर ऐसे लोगों से आपकी सहानुभूति का राज़ क्या है?

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