याद रखो, तुम जीतोगे, क्योंकि तुम उन हरामज़ादों से बेहतर इंसान हो…

2002 जनवरी… ऑपरेशन पराक्रम…

हमारी रेजिमेंट स्ट्राइक कोर की आर्मर्ड रेजिमेंट थी जो पाकिस्तान सीमा पार करने की तैयारी कर रही थी।

मुझे याद है, उस शाम हमारे कर्नल ऑफ द रेजिमेंट, जनरल सिंह हमारे मेस में आये थे (नाम असली नहीं है, स्वाभाविक कारणों से)।

(एक प्रश्न उठेगा, पहले ही दूर कर देता हूँ। ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट’ कर्नल रैंक का ऑफिसर नहीं होता। उस रेजिमेंट में जिस किसी ने भी कमीशन लिया हो उनमें जो भी सबसे सीनियर रैंक पर सेवारत ऑफिसर हो वह ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट’ कहलाता है। थल सेनाध्यक्ष भी किसी रेजिमेंट के ‘कर्नल ऑफ द रेजिमेंट कहलाते’ होंगे जिसमें उन्होंने सेकंड लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन लेकर सैन्य जीवन की शुरुआत की होगी)।

मेजर जनरल रैंक के किसी ऑफिसर से आमने सामने की मेरी पहली मुलाकात थी। उन्होंने उस शाम हम सभी युवा ऑफिसर्स को संबोधित करके जो कुछ कहा था, उसका एक एक शब्द आज भी याद है…

उन्होंने कहा – बहुत साल हो गए, रेजिमेंट ने खून नहीं बहाया है। रेजिमेंट को कुछ युवा खून चाहिए। यह आखिरी बार है जब हम सब एक साथ बैठे ड्रिंक ले रहे हैं। यह तय है कि तुममें से कुछ लोग नहीं लौटोगे।

युद्ध कोई सैंड मॉडल एक्सरसाइज़ नहीं है। अंधेरा होगा, धूल होगी, रेत तुम्हारे हर छेद में घुस जाएगी… तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देगा, किधर जा रहे हो समझ में नहीं आएगा, भरपूर कन्फ्यूज़न होगी। कोई रास्ता भूलेगा, किसी की गाड़ी खराब हो जाएगी, किसी को राशन नहीं मिलेगा…

पर उधर तुम्हारा दुश्मन भी इसी कन्फ्यूज़न से गुजर रहा होगा। ये सारी प्रॉबलम्स उसे भी होंगी। तुम्हें अपना दिमाग ठंडा रखना है, फोकस बनाये रखना है… याद रखो, तुम जीतोगे… क्योंकि तुम उन हरामज़ादों से बेहतर इंसान हो… (Remember, You will win, because you are a better man than those bastards!!!)

खैर, वह लड़ाई तो नहीं हुई। लेकिन ये शब्द मेरी चेतना में आज भी गूँजते हैं।

2019 भी एक और लड़ाई है। हमारी ओर ढेरों समस्याएँ हैं। पर शत्रु की ओर इससे बड़ी समस्याएँ हैं।

आपको बहुत कुछ पसंद नहीं आया होगा। किसी को मनपसंद हथियार नहीं मिले, किसी का राशन नहीं पहुँचा। पर हम लड़ेंगे, लड़ते रहेंगे।

हो सकता है, किसी को अपना जनरल भी नहीं पसंद हो। पर सैनिक की निष्ठा जनरल से व्यक्तिगत तौर पर नहीं होती।

उस लड़ाई में हमारा एक GOC ऐसा भी था जो बाद में भ्रष्टाचार के मामले में नेशनल हैडलाइन बना, और उसकी सच्चाई हम तब भी जानते थे। पर सैनिक अपना जनरल नहीं चुनता। उसकी निष्ठा लोकल स्तर पर अपनी रेजिमेंट के साथ और वृहत्तर स्तर पर अपने देश के साथ होती है।

हम जीतेंगे, क्योंकि हमारी निष्ठा ज्यादा सच्ची है… क्योंकि हम बेहतर इंसान हैं… और यह नोटा-फोटा आंखों में पड़ती धूल से ज्यादा कुछ और नहीं है।

पहचानिए, आपके सर पर मँडरा रहा है कौन सा खतरा

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