उच्च-शिक्षा का चीरहरण, बिहार के राज्यपाल के दामन पर भी छींटे!

सचमुच, यह राज्य अभिशप्त है। कुएं में ही भांग पड़ी है। प्रशासन के उच्चतम स्तर से लेकर नागरिक व्यवस्था के निम्नतम पायदान तक एक सी विकृति, एक सी अहमन्यता और एक सा विराग है।

शिक्षा को लेकर नीतीश कुमार ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अपने अभिनव प्रयासों से पूरी शिक्षा व्यवस्था को बैठा देने में कोई धतकर्म बाकी नहीं रखा है।

जब माननीय नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने खूब छांटकर समाजवादी सतपाल मलिक को (जिनका भाजपा से कहीं भी लेन-देन नहीं था। वह चौधरी चरण सिंह के आदमी हैं, जिनको भाजपाइयों ने किसान चेहरे के तौर पर या किसानों के मसले को समझने के लिए आगे किया) बिहार का राज्यपाल बनाकर भेजा, तो कुछ मासूमों को उम्मीद थी कि कम से कम चांसलर के तौर पर वह बिहार की उच्च-शिक्षा का चीरहरण रोकेंगे, लेकिन वह तो जो कुछ चीथड़े बचे थे, उसको भी नोंचने लगे। देखिए, कैसे…

उच्च शिक्षा पर अपनी मर्जी थोपने और सिवाय थोथी बातों के राज्यपाल सतपाल मलिक ने यही किया है कि गर्त में गिरी व्यवस्था को और गिरा दिया है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

1. हालिया बी.एड. परीक्षा का संचालन और एडमिशन विवादों में घिर गया है। राज्य के माइनॉरिटी संस्थानों को हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद राहत दी औऱ अब राज्यपाल महोदय की लड़ाई सरकार सुप्रीम कोर्ट में लड़ रही है। सोचने की बात यह है कि जिस नालंदा खुला विश्वविद्यालय के पास खुद का इंफ्रास्ट्रक्टर नहीं है, जिसकी खुद की मान्यता रद्द होने वाली थी, जैसे-तैसे बची, उसे इतना बड़ी परीक्षा आयोजित कराने का ठेका किस मुहूर्त में क्या सोच कर दिया गया।

2. मगध महिला कॉलेज की प्राचार्या शशि शर्मा का भी मामला खूब है। उन्हें पटना विश्वविद्यालय ने प्रोफेसर से रीडर पर डिमोट (पदावनत) कर दिया, और इसी वजह से उनको प्राचार्या का पद भी छोड़ना पड़ा, लेकिन महामहिम मलिक ने उनको फिर से प्राचार्या बना दिया। बिना वी.सी. का पक्ष जाने। है न कमाल की बात…

3. मगध विश्वविद्यालय के वीसी ने कुलसचिव बनाने के लिए चार नामों की अनुशंसा मलिक साहब को की। विधान यह है कि यदि वे चार नाम राज्यपाल को पसंद नहीं तो फिर से नए नाम मांगे जाएं। महामहिम मलिक ने ऐसा कुछ नहीं किया, उन चार नामों से अलग एक पांचवां नाम भेज दिया।

4. इसी तरह, नवस्थापित पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय का रजिस्ट्रार राज्यपाल ने अपने बिहारी एडीसी के निकट संबंधी को बना दिया। फिलहाल, वहां के वीसी ने रजिस्ट्रार को हटा दिया है (जो उनके अधिकार-क्षेत्र में नहीं है)। अब वीसी पर दबाव बनाया जा रहा है कि यदि उनको रिस्टोर नहीं किया गया, तो राजभवन चिट्ठी निकाल कर उनको रिस्टोर करेगा। इन सब में नुकसान किसका? पढ़ाई का… छात्रों का… बिहार का।

कुलाधिपति की इस नाराजगी का सबब – नवस्थापित पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के वीसी ने स्थापना दिवस में मुख्यमंत्री और उप-मुख्यमंत्री को तो आमंत्रित किया, लेकिन कुलाधिपति को ही नहीं। क्यों?

5. राज्यपाल महोदय ने एक सहायक मीडिया प्रभारी की भी नियुक्ति की और उतनी ही तेज़ी से उसे हटा भी दिया। क्यों?

ये टिप ऑफ द आइसबर्ग है। जितने मामले खुलेंगे, कूड़ा उतना ही अधिक दिखेगा। हालांकि, महामहिम राज्यपाल क्या कर रहे हैं?

वह रोहतास घूम रहे हैं, शेरशाह के मकबरे की अफगानिस्तान तक मार्केटिंग करने की बात कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों को ऑटोनॉमी देने और ऑक्सफोर्ड बनाने की बातें कर रहे हैं, लेकिन उसका गला भी घोंट दे रहे हैं।

एक बात तो तय है। भाजपा की पसंद अद्भुत है। बातें महामहिम से जितनी लीजिए, काम धेले भर का नहीं…।

कॉमरेड, तुम्हारी अलमीरा में लाशों का ढेर है, तुम्हारे घर में बदबू का बसेरा है

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