अपनों की आलोचना सही, सफाई भी दी, पर बचाए रखी देश की छवि

चीन के प्रीमियर चाऊ एन लाई 1954 में पहली बार भारत के दौरे पर आए थे। यह वह दौर था जब देश ने अपना पहला प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को चुना था और वह “हिन्दी-चीनी भाई-भाई” का नारा बुलंद किये हुये थे।

जब दिल्ली में नेहरू-चाऊ एन लाई समिट आयोजित की गई थी, तब चीन के पास अपना एयरक्राफ्ट तक नहीं था। उन्हें दिल्ली लाने के लिए भारत ने एयर इंडिया की फ्लाइट भेजी, जिससे वह भारत आये।

इस दौरे में चीनी प्रीमियर चाऊ एन लाई और जवाहर लाल नेहरू ने पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसमें शांतिपूर्ण सह अस्तित्व को लेकर 5 सिद्धांत दिए गए थे।

दरअसल, समझौते के अंतर्गत भारत ने तिब्बत को चीन का एक क्षेत्र स्वीकार कर लिया। भारत को 1904 की Anglo-Tibetan Treaty के तहत तिब्बत के सम्बन्ध में जो अधिकार मिले थे, भारत ने वे सारे अधिकार इस संधि के बाद छोड़ दिए।

इस पर नेहरु का जवाब था कि उन्होंने क्षेत्र में शान्ति को सबसे ज्यादा अहमियत दी और चीन के रूप में एक विश्वसनीय दोस्त देखा।

पंचशील समझौते (Panchsheel Treaty) के बाद भारत और चीन के बीच दुनिया भर की बातें हुईं पर सीमा के बारे में कोई बात नहीं हुई।

तिब्बत के सबसे बड़े धर्म गुरु दलाई लामा जोकि तिब्बत में चीन की नीतियों से परेशान थे, उन्होंने एक बड़ी पहल की। वह भारत में शरण लेने आये। पर प्रधानमंत्री नेहरु ने उन्हें शरण देने में असमर्थता जताई। उन्हें समझा-बुझा कर वापस भेज दिया गया।

नेहरु तिब्बत को लेकर चीन की परेशानियों को बढ़ाना नहीं चाहते थे। लेकिन दूसरी तरफ, 1957 के सितम्बर महीने में चीन की सरकारी अखबार ‘People’s Daily’ में एक खबर छपी कि चीन के सिंकियांग से तिब्बत तक जाने वाली सड़क पूरी तरह से बन चुकी है। यह भारत के लिए बहुत बड़ा झटका था।

सिंकियांग से तिब्बत तक जाने वाली सड़क अक्साई चिन से होकर जाती थी। यह वही इलाका था जिसे भारत अपना मानता था। चीन की अक्साई चिन को लेकर असली नीयत क्या है यह जानने के लिए प्रधानमंत्री ने सीधे चाऊ-एन-लाई को चिट्ठी लिखी।

चीन के प्रधानमंत्री ने नेहरु के इस ख़त का जवाब एक महीने बाद दिया। उन्होंने कहा था कि चीन और भारत की सीमा औपचारिक तौर पर तय नहीं हुई थी और चीन ने यह मसला इसलिए नहीं उठाया क्योंकि वह दूसरे कामों में व्यस्त था।

साफ़ था कि चीन का रवैया बदल रहा था। लेकिन बतौर प्रधानमंत्री नेहरु इस बदलाव को पढ़ पाने में असमर्थ थे। जबकि हाल ही में स्थापित हुआ जनसंघ इस पूरे मसले पर नेहरु का विरोध कर रहा था। लेकिन उसका वह विरोध नक्कारखाने में तूती जैसा था।

इस बीच 1957 में देश में दूसरे आम चुनाव हुये। वैसे तो इस चुनाव में कांग्रेस पूरे प्रचंड बहुमत से संसद में पहुंची लेकिन उसके साथ ही 32 साल का एक युवा भी उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीत कर सदन में पहुंचा जिसका नाम था अटल बिहारी वाजपेयी।

यह वह पूरा दौर था जिसमें विदेश नीति में चीन पूरी तरह से छाया हुआ था। तिब्बत, अक्साई चिन तथा पंचशील के मुद्दे पर जनसंघ विरोध करता तो नेहरु इसे एक विपक्ष का स्वाभाविक विरोध मानकर कान नहीं देते।

लेकिन सदन की कार्यवाही जब शुरू हुई और वाजपेयी जी ने इस मुद्दे पर सीधे तौर पर नेहरु जी को घेरना शुरू किया तब उन्हें इनकी वाक् पटुता और भाषण शैली के साथ ज्ञान का लोहा मानने पर मजबूर होना पड़ा।

संभवत: उनके भाषणों और चीन मुद्दे पर उनकी सरकार की आलोचना का ही असर था कि दलाई लामा कुछ दिनों बाद भारत में शरण पा गये।

इसके बाद 1960 में दिल्ली में दोनों देशों के बीच एक समिट फिर से आयोजित होना तय हुआ। संयोग से उस समय सदन की कार्यवाही चल रही थी और जिस दिन चाऊ-एन-लाई दिल्ली में रहते उस दिन सदन में अटल बिहारी वाजपेयी को चीन के मसले पर बोलना था।

निश्चित तौर पर वाजपेयी जी तिब्बत और अक्साई चिन का मुद्दा उठाते और दिल्ली में समिट के दौरान चीन के सामने नेहरु को शर्मिंदा होना पड़ता। आखिरकार देश ने विदेश नीति तय करने की जिम्मेदारी जनमत के रुप में प्रधानमंत्री बनाकर नेहरु को दी थी।

विपक्ष देश के अंदर इसका विरोध कर सकता है लेकिन सीधे तौर पर उसमें हस्तक्षेप करना सही नहीं कहलाता। जबकि सदन में वाजपेयी जी का प्रश्न पूछा जाना दिल्ली में ही बैठे चाऊ-एन-लाई के सामने नेहरु जी को असहज करता जिससे चीन के साथ रिश्ते बिगड़ने का खतरा था और जोकि सीधे तौर पर विदेश नीति में हस्तक्षेप माना जाता।

चूंकि वाजपेयी जी के लिये दल और व्यक्ति से पहले देश मायने रखता था। इसलिये अगले दिन जब सदन की कारवाई शुरू हुई तो वाजपेयी जी उसमें अनुपस्थित रहे और उन्होंने प्रश्न पूछने का मौका ही छोड़ दिया।

हालांकि जनसंघ के भीतर इस बात को लेकर वाजपेयी जी की खूब आलोचना हुई और इसके लिये उन्हें पार्टी फोरम पर स्पष्टीकरण भी देना पड़ा। लेकिन एक प्रश्न न पूछने से ही देश के विदेशी रिश्ते प्रगाढ़ होने की उम्मीद की जा रही थी तो उसे न पूछकर वाजपेयी जी ने देश और तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु को भी विदेशी मेहमान के सामने असहज होने से बचा लिया।

आज यह वाकया मुझे उस वक्त याद आ गया जब टीवी पर स्मृतिशेष वाजपेयी जी की अस्थियों को हरिद्वार के ब्रह्मकुंड से विसर्जित होते हुये देखने के साथ फेसबुक पर कल नवजोत सिंह सिद्धू के पक्ष में बैटिंग होते हुये देख-पढ़ रहा था।

चूंकि वह अटल जी का दौर था जब विपक्ष सरकार को विदेशी मेहमान के सामने असहज होने से बचाने की कोशिश करता था जिससे देश की छवि को आघात न पहुंचे और आज विपक्ष ऐसे मौके खोजता है कि विदेशों में जाकर सरकार और देश की छवि को कैसे धूमिल किया जा सकता है।

एक आडम्बर से बचने के लिये दूसरे आडम्बर को गले लगा लेना तो हास्यास्पद

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