क्या सिर्फ़ खाकी पैंट ही कैमरा फ्रैंडली है?

मेरे पिता ने मुझे बारह-तेरह वर्ष की उम्र में ही पूर्ण युवा मान मुझ पर खुद मेरी और छोटी-मोटी अन्य अनेक जिम्मेदारियाँ लाद दी थी। जैसे नितांत भिन्न संस्कृति, वातावरण और परिवेश में खुद का नवीं कक्षा में एडमिशन, बैंक-पोस्टआफिस, राशन-गैस, सब्जी-दूध इत्यादि कार्य। छोटे भाई का चौथी कक्षा में एडमिशन करवाने एक बार साथ गए अवश्य पर उसके बाद तमाम कार्यक्रमों में बतौर अभिभावक मुझे ही जाना पड़ता।

अजीब विद्यालय था उसका। मेरा नास्तिक और विद्रोही मन ढेरों श्लोकों और मंत्रों से चिढ़ सा जाता। मुझे ठीक से याद नहीं, कोई छह महीने या साल भर में एक कोई कार्यक्रम होता जिसमें अभिभावकों को बुलाया जाता। छोटी सी जगह होती और तीन तस्वीरें लगी होतीं, जिनके आगे पुष्प बिखरे होते थे।

अगल-बगल दो दढ़ियल लोगों की तस्वीरें और बीच में भारत माता के रूप में एक स्त्री-काया। फिर एक भगवा झंडा होता जिसे सब बड़ी श्रद्धा से प्रणाम करते। प्रणाम करने का तरीका भी विचित्र सा ही था। कोहनी को मोड़ते हुए, हथेली पूरी फैला कर, खुली हथेली को जमीन के समानांतर रखते हुए सीने से लगाना। मैं हँसता रहता इस नौटँकी को देखकर।

पर जो भी हो, मेरे भाई के उदण्ड स्वभाव को अनुशासित करने में उस विद्यालय ने महती भूमिका निभाई थी। मेरा दुर्वासा से भी अधिक क्रोधित भाई, मेरे सामने जब सिर झुकाए विनीत भाव से खड़ा रह जाता है तो लगता है कि उस विद्यालय में जरूर कोई बात रही होगी।

वह विद्यालय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक शाखा विद्याभारती द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर था। इन शिशु मंदिरों के बारे में खूब कहा जाता है कि इनमें साम्प्रदायिकता पढ़ाई जाती है। अपने भाई के उस स्कूल में कई बार उसके साथ बैठा, पर ऐसा तो कभी नहीं सुना।

माना कि खुद बहुत कच्ची उम्र थी, पर अभी भी यदा-कदा बगल से शिशुमन्दिर में बैठता हूँ और साम्प्रदायिकता का स नहीं सुनाई देता। हाँ, राष्ट्रप्रेम और बलिदान की बात बार-बार सुनाई देती है। जैसे देश के लिए भगतसिंह तैयार करना ही इनका लक्ष्य हो। गौरतलब है कि वामपंथी मित्र भगतसिंह को अपने ब्रांड-एम्बेसडर के तौर पर चित्रित करते रहते हैं।

मेरे विचारों से चिढ़ कर एक बार एक प्रौढ़ वामपंथी मित्र ने मुझे संघी कह कर सम्बोधित किया था। मैं कभी भी संघ की किसी मीटिंग में नहीं गया, संघ द्वारा संचालित किसी भी शाखा और साहित्य से मेरा कोई सम्पर्क नहीं है, बावजूद इसके उनका मुझे संघी कहा जाना थोड़ा अटपटा सा तो लगा पर एक तरह से गर्व भी हुआ कि मुझे इस विराट संघटन का सदस्य समझा गया।

इस संगठन का विरोध करने वाले हवाई बातें करते हैं कि यह समाज में जहर फैलाता है, पर कभी कोई जहरीला कार्य दिखा नहीं पाते। इनके जो कार्य दिखते हैं, जो इतिहास में दर्ज हैं, वह तो कहीं से भी अनुचित नहीं दिखते।

कश्मीर विलय के समय जब हवाईजहाज से सैनिक भेजे गए तो हवाईपट्टी को कामचलाऊ बनाने के लिए संघ के कार्यकर्ताओं ने ही अथक प्रयास किया था। सन बासठ की जंग में सीमा पर पहुंचे संघियों ने सरकारी कार्यों में मदद की थी। मार्गों की रक्षा करना, सैनिकों तक रसद पहुंचाना, शहीद सैनिकों के शवों का रखरखाव और उनके परिवारों की चिंता। यह कुछ ऐसे कार्य थे कि खुद नेहरू ने उनकी प्रशंसा की और 1963 में गणतंत्र दिवस परेड में हिस्सा लेने का निमंत्रण दिया।

1965 की जंग में जब दिल्ली के पुलिस वालों को सेना की सहायता के लिए लगा दिया गया तो लाल बहादुर शास्त्री ने दिल्ली की कानून-व्यवस्था और यातायात-नियंत्रण के लिए संघ को याद किया था। संघ ने दी गई जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।

21 जुलाई 1954 को दादरा और 28 जुलाई को नरोली, फिपरिया और राजधानी सिलवासा को पुर्तगाल से मुक्त कर 2 अगस्त को पूरे दादरा, नगर हवेली को भारत सरकार को सौंप दिया था संघ ने। गोवा की आजादी में संघ का ही हाथ है, जिसने लगातार आंदोलन कर वहाँ की जनता को प्रोत्साहित किया। अंततः भारत सरकार को 1961 में सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और गोवा आज़ाद हुआ। कौन कह सकता है कि यदि संघ इतना सक्रिय न होता तो आज विश्वप्रसिद्ध गोवा हमारा अंग होता या नहीं।

भोपाल गैस त्रासदी, 84 के सिख विरोधी दंगे, गुजरात का भूकम्प, सुनामी, उत्तराखण्ड की बाढ़, और अभी केरल की बाढ़, प्रत्येक आपदा में बढ़-चढ़ कर सेवाकार्य में भाग लेने वाले संघियों की तस्वीरें देखकर लगता है कि कोई मुझे संघी कहे तो यह गर्व की बात है।

मेरे उन्हीं प्रौढ़ वामपंथी मित्र का कहना है कि प्रत्येक विचारधारा के स्वयंसेवक होते हैं और वे प्राकृतिक आपदाओं में समान रूप से सेवा करते हैं। मैंने उनसे कहा भी था कि यदि ऐसा है तो इन जगहों पर क्यों कभी किसी अन्य संगठन के कार्यकर्ता नहीं दिखाई देते। क्या खाकी पैंट ही कैमरा फ्रैंडली है?

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