श्रद्धांजलि अटलजी : ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया

नष्ट होने का तरीका सभी का लगभग एक जैसा ही है। देर सवेर सभी काल कवलित हो मिट्टी के ढेर में तब्दील हो ही जाते हैं। पर इन सबके बीच एक बात है जो विशिष्ट बनाती है कि आप किस निर्माण प्रक्रिया से गुजर कर नष्ट होने के कगार पर पहुँचे।

जब नियति दाँत गड़ा कर तुम्हे परख रही थी, तब तुम किस भाव-भंगिमा से एक आकार में ढल रहे थे। नियति निर्मम हो तुम्हें हर बार एक मुश्किल परिस्थिति के बाहुपाश में कसे जा रही थी, तब तुम कैसे अपनी साँसों के अभ्यास से सुलझने का प्रयास कर रहे थे। नियति चीख चीख कर तुम्हें मुश्किल प्रश्न दे रही थी और तुम कैसे एक निष्णात लुहार की तरह उन सभी प्रश्न चिह्नों को हथौड़ी की चोट से पूर्णविराम में बदलने में लगे थे।

ऐसा ही एक व्यक्तित्त्व जमाने में आया। जिसने सबसे दूषित क्षेत्र कह कर सभ्रांत लोगों द्वारा एक सिरे से नकार दिये जाने वाले क्षेत्र को ही अपना कर्म क्षेत्र बनाया और उसे पूरे एक युग तक जी कर अपने ‘कर्म-दंड’ को आक्षेपहीन ही ज्यों की त्यों धर चलता बना। जब हम शोक मग्न थे तब एक कहावत कि काजल की कोठरी मां कैसो ही सयानो जाय, नेक लीप काजर की लगी हैं तो लगी हैं को वह सौम्य व्यक्तित्व का धनी अपनी स्मित मुस्कान से मिटाने में लगा था।

19 वीं सदी के मध्यांतर में जब यू. के. प्रधानमंत्री के रूप में बेंजामिन डिजरैली को चुना गया तो किसी ने कहा कि लोकतंत्र का सबसे सौभाग्यशाली दिन होता है, जब एक साहित्यकार इसके शीर्ष पर पहुँचे। क्योंकि कलमकार समाज का संवेदनशील प्राणी होता है, उसे समाज के हर तबके का दर्द मालूम होता है। इसी प्रक्रिया में भारत के लिए यह घड़ी 1996 में आई, जब लोकतंत्र अपने 46वें वर्ष में चल रहा था। 1996 के आम चुनावों के बाद जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आई तो अटल बिहारी वाजपेयी का प्रधानमंत्री बनना तय हो चुका था।

16 मई 1996 का दिन शायद मेरे राजनीतिक पटल पर कुछ अंकित कर जाने वाला था। जब पहली और आखिरी बार किसी प्रधानमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह देखा। गांव में ही बाबोसा की गोद में बैठ टेक्सला के टीवी पर जब वो समारोह देख रहा था तो मस्तिष्क पटल पर एक इबारत लिखी जा रही थी। सभी दर्शकों के चेहरों की मुस्कान देखने लायक थी। उनके विमर्श से एक बात समझ आई कि एक ऐसा व्यक्तित्व चुन कर आया है जो पद की गरिमा के अनुरूप है।

खैर, ये ज्यादा दिनों तक नहीं चला 13 दिन में ही सियासत की घृणित चालों ने अपना रंग दिखाया, नियति ने क्रूर अट्टहास किया। पर वो अभी भी निरपेक्ष और निर्विकार बने रहे। जाने कितने ही लोगों ने इस घटनाक्रम के बाद सियासत को गाली दी होगी, पर उनको तो वहीं बने रहना था, अपने आप को पुनः सिद्ध करने के लिए। एक बार फिर वो चुन कर आए, पर अभी भी वक़्त ने बस अपने आप को दिन से महीने भर में बदला। वो केवल 13 माह प्रधानमंत्री रह पाए।

1998 में देश ने अटल जी को एक मौका और दिया। कयास तय हो चुके थे कि अबकी बार 13 साल रहेंगे। वो जब प्रधानमंत्री बने तो उनकी दृष्टि में पूरे देश को सड़कों से जोड़ने, आपस में नदियों को जोड़ने, इनकम टैक्स प्रणाली को खत्म करने, पाक समस्या को वार्ता और शांति से सुलझाने, भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने, सरकारी कोष को समृद्ध करने का एक अत्यंत विस्तृत विज़न था। जिसमें वो कुछ में सफल हुए और कुछ योजनाएं समयाभाव और कारगिल वार की वजह से पूरी नहीं भी हो पाई। लेकिन इन सब के बीच उन्होंने एक उदाहरण भी पेश किया कि गठबंधन से भी बहुत साफ सुथरी सरकार चलाई जा सकती है और एक दम संयत रह कर भी सियासत की जा सकती है।
पोखरण परीक्षण और कारगिल विजय जैसी उपलब्धि भी अटल जी के खाते में दर्ज तो हुई लेकिन इन सब के बावजूद भी जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। (इसका कोई ठोस कारण मिले तो जरूर बताना) पर वो अभी भी निरपेक्ष और निर्विकार बने रहे। पद पे बने रहने की अभिलिप्सा के लिए जहाँ उस समय भी कुचक्र रचे जाते थे, वहीं वो फिर एक साधक की तरह मनो विश्लेषण की ओर लौट गए। वो गिरे, सम्हले, उठे, फिर चल पड़े लेकिन उड़े नहीं। अपने आप को जमीन से जोड़ कर रखा। और यही वजह थी विरोधी भी उनके प्रशंसक रहे।

इतना सब होने के बाद प्रश्न ये उभरता है कि क्या ‘कुशल राजनीतिज्ञ’ उनके लिए उपयुक्त विशेषण है। दुनिया पूरी एक यात्रा कर 21वीं सदी में भले ही प्रवेश कर गई हो, लेकिन किसी भी कालखंड के व्यक्ति को इतिहास ने ये कह कर सम्मान कदापि नहीं दिया कि वो एक कुशल राजनीतिज्ञ था। क्योंकि राजनीतिज्ञ होना कोई उपलब्धि रहा ही नहीं। कुशल शब्द के आगे जुड़ा राजनीतिज्ञ शब्द किसी लड्डू पर चिपके कलौंजी के बीज जैसा प्रतीत होता है। अगर वो राजनीतिज्ञ ही होते तो कभी एक वोट से सरकार गिर जाने की यंत्रणा के शिकार नहीं हुए होते।

मृत्यु जब अपना बही खाता खोल कर बैठती है तो अंत में केवल एक तथ्य शेष रह जाता है कि सब कुछ होते हुए भी आदमी कितने सही बने रहे। शायद इसी आदमियत की वजह से अटल जी के लिए हर दिल क्रन्दन और हर आंख अश्रु प्रवाहित कर रही है। भले ही उनके पास कोई वारिस नहीं हो लेकिन एक पूरा देश उनका बन के उमड़ पड़ा है। सौभाग्यशाली हैं हम जिन्होंने उनका नेतृत्व देखा। भारी मन से उनको विदाई देते हुए, एक आह्वान निकलता है कि अभी बहुत काम शेष हैं, हो सके तो लौट के आना। यथा,
“मैं जी भर जिया मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं।”

वो सही मायनों में ‘अजातशत्रु’ थे।
सादर नमन उनके विशाल व्यक्ति को और श्रंद्धाजलि उनकी पार्थिव देह को।

– शिरीष चौहान

अपनी ही अदालत में मुकदमा हारते खड़े अटल! – 2

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