जज होना काबिलियत नहीं, खानदानी रवायत है

कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने एक प्रेस कांफ्रेंस की थी, जिसका विषय था भारत में लोकतंत्र खतरे में है।

और ऐसा भला क्यों है, इस प्रश्न के उत्तर में जजों ने बताया कि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा चुने हुए संवेदनशील केसेज़ चुने हुए जजों को दे रहे हैं।

इन चार जजों ने जिनके हृदय में भारत के लोकतंत्र की रक्षा करने की महान भावनाएं कूट कूट कर भरी हुई थीं, चीफ जस्टिस को लिखे एक खत को जारी किया जिसका मुख्य आधार ये लाइने थीं –

“It is too well settled in the jurisprudence of this country that the chief justice is only first amongst the equals – nothing more or nothing less.”

यानी आप मुख्य न्यायाधीश नाम के हैं। हममे और आपमें कोई अंतर नहीं। किस जज को कौन सा केस दिया जायेगा इसका फैसला आप अकेले नहीं करेंगे , जजों की टीम मिलकर करेगी।

सभी जज समान हैं। कोई सीनियर जूनियर नहीं। चीफ जस्टिस सभी समान जजों में पहले नंबर पर हैं।

अच्छी बात है, समझ में आयी। संविधान भी कहता है सभी नागरिक बराबर हैं।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति कॉलेजियम करता है। कॉलेजियम में पांच सदस्य होते हैं। चीफ जस्टिस और 4 सीनियर मोस्ट जजेज़।

वैसे तो सभी जज समान हैं। लेकिन जब कॉलेजियम की बात आती है तो उसके मेंबर कोई भी पांच जज नहीं होते, पांच सीनियर मोस्ट जज होते हैं।

इक्वलिटी… हाहाहा!

खैर, पिछले दिनों कॉलेजियम ने 4 जज चुने। जस्टिस इंदिरा बनर्जी, विनीत सरन, इंदु मल्होत्रा और बहुत ही खास, उत्तराखंड के चीफ जस्टिस के एम जोसफ। पहले तीन जज की अनुशंसा सरकार ने मान ली, लेकिन जोसफ साहब का नाम सरकार ने तभी क्लियर किया जब कॉलेजियम ने दुबारा उनका नाम भेजा।

सरकार की मंजूरी मिली लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसे नहीं बन सकते। उसके पहले एक समारोह होता है उसमें जज बनने की शपथ दिलाई जाती है।

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति भी तभी बना जा सकता है, जब पहले आप उस पद की शपथ लें। यही हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती है।

तो कुछ दिनों पहले शपथ समारोह हुआ। तीन जजों को शपथ लेनी थी।

बनर्जी, सरन और जोसफ साहब।

सरकार ने शपथ लेने की लाइन तय कर दी। पहले बनर्जी साहब, फिर सरन जी, और अंत में जोसफ साहब।

हाहाकार मच गया।

कई सुप्रीम कोर्ट के जज गुमनाम होकर अखबारों तक पहुंचे और मीडिया में रिपोर्ट आनी शुरू हुई कि सुप्रीम कोर्ट के जज, जोसफ साहब को तीसरे नंबर पर शपथ दिलाने से नाराज़ हैं।

रिटायर्ड जजों ने बाकायदा अपने नाम से अखबारों में फोन करके खबर छपवाई कि वो जोसफ साहब को तीसरे नंबर पर शपथ दिलाये जाने से नाराज़ हैं।

वैसे तो हाई कोर्ट के जजों की सीनियरिटी लिस्ट में जोसफ साहब 42वें नंबर पर थे, और कॉलेजियम ने उनको सीनियरिटी के आधार पर नहीं चुना था। वो कथित जीनियस जज होने के आधार पर चुने गए थे।

अब वो जीनियस कैसे थे, क्योंकि उनके पिता भी सुप्रीम कोर्ट के जज थे। दीपक मिश्रा रंगनाथ मिश्र जी के रिश्तेदार हैं। गोगोई जी भी ऐसे परिवार से रिश्ता रखते हैं। 90% जनता को मूर्ख बताने वाले जज के पिताजी भी जज ही थे।

तो जज होना काबिलियत नहीं, खानदानी रवायत है। अधिकांश जज सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज कोई परीक्षा पास करके नहीं आते। वो चुने जाते हैं। और चुनाव का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं। कभी भी नहीं था। 1993 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने खुद पक्का कर दिया कि चुनाव पांच जजों की मनमर्जी से हो।

और ये पांच जज, पांच सीनियर जज मुट्ठी में रहें तो?

इसीलिए जोसफ साहब के शपथ ग्रहण पर हल्ला मच गया।

तीसरे नंबर पर शपथ ग्रहण का अर्थ बनर्जी और सरन, जोसफ से सीनियर हो गए। जोसफ जी से पहले कॉलेजियम में वो पहुंचेंगे।

सभी जज बराबर हैं। चीफ जस्टिस उन बराबर जजों में पहले हैं। ये चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस लोकतंत्र पर खतरा का मूल आधार था।

सालों से चली आ रही सीनियरिटी परिपाटी फिर लोकतंत्र पर खतरा क्यों नहीं मानी गयी?

1947 में सो कॉल्ड आज़ादी आयी थी, डेमोक्रेसी नहीं। वोट देना, सवाल पूछ लेना डेमोक्रेसी नहीं हो जाती।

बहरहाल 15 अगस्त की शुभकामनाएं!

आखिर नोटबंदी पर यूँ ही नहीं तड़पी थीं ममता

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY