क्या आप को पता है डॉ एस के महाजन कौन हैं?

उपरोक्त शीर्षक पर आप कह सकते हैं कि आप नहीं जानते और प्रतिप्रश्न कर सकते हैं कि आप को उनके बारे में क्यों जानना चाहिए?

तो कृपया धीरज रखिए, शीघ्र ही आप की जिज्ञासा संतुष्ट होगी। इस लेख को कुछ चरणों में बांटते हैं।

प्रथम चरण

ज़रा थोड़ा सा और घूमते हैं। सरकारी फार्मेसी कॉलेज कराड़ – महाराष्ट्र में स्टोरकीपर के पद पर कार्यरत एक अनुसूचित जाति (SC) के कर्मचारी की वार्षिक कोंफिडेंशियल रिपोर्ट में उसके दो सीनियर डॉक्टरों ने adverse रिमार्क्स दिये, यह बात उसे नागवार गुज़री।

कार्यालयीन नियमों के तहत उसने उनकी शिकायत उच्चाधिकारियों से की और इन दोनों नॉन-SC डॉक्टरों पर – जो क्लास 1 अफसर भी थे – SC/ ST एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करने की अनुमति मांगी।

यह अनुमति डॉ महाजन से मांगी गयी जो डिपार्टमेन्ट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन के डायरेक्टर इन चार्ज थे।

डॉ महाजन ने यह अनुमति नकार दी, तब उक्त SC कर्मचारी ने उन पर ही केस कर दिया, कि डायरेक्टर इन चार्ज को अनुमति देने या नकारने का अधिकार नहीं है।

कानूनी भाषा जिन्हें समझ में आती है वे केस के डीटेल यहाँ पढ़ सकते हैं – Dr. Subhash Kashinath Mahajan vs The State Of Maharashtra on 20 March, 2018

उम्मीद है इस कहानी से आप अब तक बोर नहीं हुए हैं।

यह केस 2009 को दर्ज हुआ और लड़ते लड़ते लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गयी। यह केस उक्त कर्मचारी विरुद्ध डॉ महाजन न रहकर, महाराष्ट्र सरकार विरुद्ध डॉ महाजन बन गया।

SC/ ST एक्ट में कई केसेज़ होते हैं, यह केस भी उनमें से एक, और क्या? कानून अपना काम करते रहता है, यह भी ऐसा ही एक केस था, कोई ऐसा केस तो था नहीं जो पूरा देश उसे सांस रोक कर, दिल थामकर देखता रहे।

लेकिन कहानी में ट्विस्ट यहाँ है। इस केस का फैसला दिया गया 20 मार्च 2018 को।

क्या इस तारीख से आप को कुछ याद आया? जी हाँ, यह वही केस है जिसके निर्णय को लेकर दंगे हुए फिर उसे उलट गया और फिलहाल सोशल मीडिया पर एक दूसरे की कॉलर पकड़ी जा रही है।

इस लेख के छह घंटे पहले मैंने एक पहेलीनुमा पोस्ट डाली थी – पहेली : क्या आप S K Mahajan के बारे में जानते हैं? अगर जानते हैं तो कमेन्ट में विस्तार से और निष्पक्ष लिखें, वरना रहने दें।

केवल तीन लोगों ने उत्तर दिया। लाइक्स भी बहुत कम है, लेकिन पढ़ा तो सब ने होगा जितने भी नियमित पढ़ते हैं। वैसे भी, इतना झगड़ा हो रहा है लेकिन किसी को केस के बारे में यह नहीं पता था कि यह केस एक नॉर्मल केस था, जिस पर इस तरह का निर्णय आयेगा यह किसी ने सोचा नहीं होगा।

आज भी, इस मुद्दे पर फूत्कारते या चिल्लाते सब को अधिक से अधिक ’20 मार्च 2018 का निर्णय’ से परे इस केस की कोई मालूमात होगी यह मानना मुश्किल है। और हो भी क्यों वैसे तो?

सिंहगढ़ फतह करने के लिए मराठे खाई से अमावस की रात में ऊपर चढ़े थे, जहां से आज भी कोई चढ़ने की सोचता नहीं। किले अक्सर ऐसे ही अनपेक्षित जीते जाते हैं।

द्वितीय चरण

यहाँ ये देखना रोचक होगा कि कितने झट से इस निर्णय को राष्ट्रव्यापी और बिलकुल आग फैलाती पब्लिसिटी मिल गयी। हैरान हूँ क्योंकि यह केस बिलकुल सामान्य केस की तरह ही था।

और आज भी इसके निर्णय से उद्वेलित लोगों को इस केस का तथा इनके पात्रों के बारे में मालूम नहीं, जबकि सोशल मीडिया में आजकल कुछ छुपता नहीं। जो है ही नहीं वैसी भी बातें गढ़ी जाती हैं, फिर यहाँ तो फ़ैक्टस हैं।

फिर भी केस के डिटेल्स तो छोड़िए, पात्रों के नाम भी किसी धुरंधर की वॉल पर नहीं देखें। मीडिया में भी अधिकतर चर्चा निर्णय की है, केस की नहीं। मतलब केस साधारण और सामान्य था, निर्णय अचानक इतना कैसे हाइलाइट हुआ?

देखने लायक बात यह भी है कि कोर्ट को हमेशा मोदी सरकार के विरोधी फैसलों के कारण लोकतन्त्र का मज़बूत खंभा कहने वाले मीडिया और विपक्ष ने कोर्ट के इस फैसले को मोदी सरकार का दलित विरोधी फैसला घोषित कर दिया। लगातार प्रेस कांफ्रेंस कर के सरकार को कोसा और कोर्ट के निर्णय को सरकार का दलित विरोधी निर्णय बताया।

दलितों में यही आग लगाई गयी कि मोदी सरकार ने उनका संरक्षण करने वाली काँग्रेस निर्मित कानून का कवच तोड़ दिया है, ये दलित विरोधी है।

और इसके पहले कि जवाब मिले, दंगे शुरू हुए, करोड़ों का नुकसान हुआ और लोग मारे भी गए।

चुनावी साल में ऐसे यशस्वी हमले के सामने सहसा वही होता है जो मोदी सरकार ने किया। टाइमिंग बहुत मायने रखती है और विपक्षी यहाँ टाइमिंग में स्कोर कर गए।

तृतीय चरण

क्रिकेट में सही गुगली बॉल वही होती है जब बैट्समैन को बॉलर की इच्छानुसार शॉट खेलना पड़े। चुनावी साल में दलितों में लगाई आग का परिणाम क्या होगा यह तो आग लगाने वालों को पता ही था, इसलिए उनकी अगली चाल सोशल मीडिया पर अपने गुर्गे तथा फेक आईडीयों द्वारा भड़काऊ पोस्ट्स डालना रही। नोटा का जोरदार प्रचार हो रहा है। इतना ही नहीं, ‘काँग्रेस अच्छी थी यार’ नाम का फेसबुक पेज भी दिख रहा है।

यह बस फैक्ट्स रखे हैं, जो अब तक किसी ने इस तरह रखे नहीं। निर्णय पर कोई टिप्पणी नहीं, बस इतना ही कहूँगा कि निजी जीवन में मुझे आरक्षण से फर्क नहीं पड़ा। नंबर इतने कम थे कि ऐसी कोई नौकरी ही नहीं थी जो आरक्षण ने मुझसे छीन ली। और वैसे मुझे सरकारी नौकरी करनी भी नहीं थी। इसलिए इस मुद्दे पर टिप्पणी करने में खुद को योग्य नहीं समझता।

वैसे एक चतुर्थ चरण का सुझाव ज़रूर है। लीजिये।

इस कानून को पूरी तरह हटा नहीं सकते, यह होगा नहीं; लेकिन गिरफ्तारी के नियमों में बदलाव के लिए कानून की समीक्षा की जा सकती है। महंगी प्रक्रिया है। समय भी लेगी और बहुत धन भी। बड़े वकीलों को लगाना होगा, और सौ करोड़ तक खर्चा भी हो सकता है अगले दस सालों में।

कोई पार्टी समर्थन नहीं करेगी। एक भी पार्टी, लिख लीजिये। लेकिन अगर जनता ने सौ करोड़ तक रकम जमा कर ली तो कोई पार्टी विरोध भी नहीं करेगी। कोर्ट की लड़ाई में जो होता है, होने देगी। अपने बीच में से विश्वसनीय लोग चुनिये और उनको यह लड़ाई की ज़िम्मेदारी सौंपिए।

हाल ही में सुना था कहीं किसी मंदिर के लिए 3 घंटों में 130 करोड़ रुपये जमा हुए। इस मुद्दे को लेकर जमा कीजिये। बाकी यह भी लड़ाई ही होगी जिसमें हार जीत दोनों संभव हैं। वकील तो अपनी फीस करोड़ों में ले लेंगे, उनसे नि:स्वार्थ नि:शुल्क सेवा की अपेक्षा न करें।

वाकई इतनी परेशानी हो रही थी तो तीस सालों में ही यह काम अब तक पूरा हो जाना चाहिए था, जो अब एकदम असह्य हो रहा है। कहीं यह असह्यता भी डॉ महाजन की अप्रसिद्ध केस के महाप्रसिद्ध हुए निर्णय जैसी ही तो नहीं? वह निर्णय कैसे इतने तपाक से फैल गया यह भी मेरे लिए हैरानी की बात है।

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