एक जश्न ए आज़ादी की बरसी

कल 14 अगस्त थी और आज 15 अगस्त है। यह एक वह दिन है, जिस दिन हमारी नस्ल शताब्दियों की दासता के बाद स्वतन्त्र हुई थी।

मैंने 14 अगस्त 1947 की रात की बेचैनी की कहानी, अपने पिताजी और अन्य बुजुर्गों से बराबर सुनी है और उन क्षणों की जीवंतता को अनुभव करने की भी कोशिश की है।

उस दिन लोग एक नई आशा, एक नई उमंग और एक बिलकुल ही अपरिचित सी खुशी को आलिंगनबद्ध किये, आधी रात का इंतज़ार कर रहे थे। ठीक, जैसे ही रात को 12 बजे, हर घर से सभी लोग बाहर निकल आये और एक अपार जनसमूह महासागर बन कर हिलोरें लेने लग गया था। वे सब अपने स्वतन्त्र होने की अनुभूति से हर्षित, गौरवान्वित महसूस कर रहे थे।

लेकिन क्या ऐसा ही हर भारतीय ने महसूस किया था? बिल्कुल नहीं, मुझे ऐसा नहीं लगता है। जवाहरलाल नेहरू द्वारा समझौते में ली गई स्वतंत्रता के शोर ने, उन लोगों के चीत्कार को दबा दिया था जिनका 14 अगस्त की रात को अपनी नस्ल की नपुंसकता से साक्षात्कार हुआ था।

उनकी माँ भारती के काटे जाने की शर्मिंदगी को जलते दीये और आतिशबाज़ी के शोर ने छुपा दिया था। लोग स्वतंत्रता के उन्माद में गांधी बाबा की जय-जयकार कर रहे थे और जवाहरलाल नेहरू द्वारा अंग्रेज़ी में दिये गये एक झूठे भाषण को सुन रहे थे।

नेहरू ने कहा था –

इस मध्य रात्रि में जब पूरा विश्व सो रहा है, भारत जाग रहा है। भारत इस वक्त एक स्वच्छंद आजादी को महसूस कर रहा है और इस तरह के पल इतिहास में बहुत कम ही आते हैं। ये वह वक्त है, जब हम पुरातन से नए युग की ओर प्रवेश कर रहे हैं। राष्ट्र की आत्मा स्वतंत्रता की महक को महसूस कर रही है। अब हम भारत और भारत के लोगों की सेवा करेंगे। मानवता की सेवा हमारा प्रमुख लक्ष्य है। भारत को इस ऐतिहासिक क्षण के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा है।

यह पूरा भाषण इतना निष्ठाहीन था कि इसमें, नेहरू ने न बंटवारे का कोई उल्लेख किया था और न ही इस बंटवारे से लहूलुहान हुयी आत्माओं के लिए संवेदना ही प्रगट की थी।

इसका परिणाम यह हुआ की जिन लोगों ने 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान बनने पर जश्न ए आज़ादी मनाया था, उन्ही लोगों ने 15 अगस्त 1947 को, मुस्लिम लीगी टोपी को अपनी लोहे की सन्दूकों में दफन करके, नेहरू की सफेद टोपी पहन ली थी और झण्डारोहण की भीड़ में शामिल हो गये थे।

आज इस वाकये को हुए भले ही 71 वर्ष बीत चुके हैं लेकिन आज भी लोगों के दिल में, भारत को टुकड़ो में बांटे जाने की टीस है। यही वह टीस है, जो लोगों को भारत के फिर से अखण्ड हो जाने का सपना दिखाती है। यह वह सपना है जो मैं नही देखता हूँ लेकिन यह जरूर है कि मैं उन लोगों से बेहद सहानभूति रखता हूँ, जो अखण्ड भारत का सपना देखते है।

मैं जानता हूँ कि लोगों को मेरी बात समझ में नहीं आयेगी लेकिन, यह अखण्ड भारत का सपना, वह सपना है, जो कि एक समय में मेरे जीवन का भी हिस्सा था, पर वह अब सिर्फ सपना ही रहेगा। आज इस सपने के पास वास्तविकता का कोई धरातल नहीं है।

इन वर्षो में बहुत कुछ बदल गया है। इन 71 वर्षो में देश बदला है, विदेश बदला है, देश की जनता बदली है और राजनीति भी बदली है। यह एक कटु सत्य है कि आज का भारत, पाकिस्तान व बंगलादेश का वापस भारत में विलय हो जाना बर्दाश्त ही नही कर सकता है।

जिस भारत को, पाकिस्तान के अवैध रूप से कब्जे वाले जम्मू कश्मीर के भूभाग को अपना स्वीकार करने में 69 वर्ष लग गये हैं, उस भारत से आप उम्मीद करते हैं कि वह अखण्ड भारत के लिए तैयार है?

जिस भारत ने अपने ही लोकतान्त्रिक ढांचे में, कश्मीर की घाटी, बंगाल, केरल में इस्लामिक राज्य की परिकल्पना को धरातल दिया है, उस भारत को फिर से, अखण्ड भारत बनाये जाने को सत्य मानते है?

आज से तीन वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने जब बलूचिस्तान को लेकर बयान दिया था तब मैंने कई लोगों को इस अखण्ड भारत के सपने को सच मानते हुए देखा था और उन लोगों ने उम्मीद जताई थी कि यह हो जायेगा, लेकिन मेरे लिये यह एक असम्भव आशा है।

आज भारत मे हिंदूवादी और राष्ट्रवादी, इस सपने को लेकर ही एक नहीं है। वास्तविकता यह है कि भारत में एक बड़ा हिन्दू वर्ग, आपस में ही लड़ रहा है और उसको इससे बिलकुल भी फर्क नहीं पड़ता है कि भारत का क्या होगा। उनको अपने अपने हिस्से चाहिये।

कोई दलित के नाम पर चाहता है, कोई जाट के नाम पर चाहता है, कोई यादव के नाम पर चाहता है और कोई कोई तो सवर्ण के नाम पर चाहता है! इस तुच्छ मानसिकता को लेकर जी रही भारत की जनता, भारत के भाग्य को रचने का सपना देख रही है, यह मेरे लिए हास्यास्पद है।

मेरा अपना आंकलन है कि यह अखण्ड भारत और हिन्दू राष्ट्र दोनों ही सपने कभी भी नही पूरे होने वाले, क्योंकि 1947 से लेकर बहुत कुछ बदल चुका है। जितने प्रतिशत मुसलमान 1947 में भारत में रह गये थे, आज उससे दुगने से ज्यादा भारत में है।

1947 में जितने ईसाई (एंग्लो इंडियन) भारत में थे, उससे कई गुना ईसाई आज भारत मे है। वहीं 1947 में जितने हिन्दू थे, उससे कम प्रतिशत में हिन्दू आज रह गया है। इतना ही नही, उस हिन्दू में से, हिन्दू की बात न करने वाला हिन्दू, शून्य से निकल कर, आज सारे तन्त्र में छाया हुआ है।

आज हिन्दू स्वयं उस हिन्दू से घायल है जो मुस्लिमों और ईसाइयों के साथ, उनके विरुद्ध खड़ा हुआ है। इस वास्तविकता को देखते हुये मेरा अपना आंकलन यही है कि अखण्ड भारत की मृग मरीचिका से हमें निकलना चाहिये।

हम को तो आज, जो हमारे पास बचा हुआ भारत है, उसको ही सुरक्षित करने का सोचना चाहिये और उसके लिये यह आवश्यक है कि हम सबसे पहले उन हिन्दुओं के प्राणवायु का श्वासरोधन करें जो अपनी सेक्युलर या जातिगत विचारधारा व स्वार्थ पूर्ति के लिये हिंदुत्व की जड़ खोद, हिन्दू के विरुद्ध खड़े हुये हैं।

हमारे भारत का जो हिस्सा 1947 में काट दिया गया था, उसको उस दशा तक पहुंचाने वालों को आज हमको ही काटना है और इस अमन की आशा और शांति की अभिलाषाओं से दूर रहना है।

मैं समझता हूँ कि जिस दिशा में वैश्विक समीकरण अपने ताने बाने बुन रहा है, वह अगले दशक में भारतीय उपमहाद्वीप में रक्तपात लायेगा जिसको हमें अपनी आगामी पीढ़ियों के लिये स्वीकार करना ही होगा।

15 अगस्त 1947 : कैसी स्वतंत्रता, कैसा जश्न

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