स्वतंत्रता आन्दोलन में संघ का योगदान

काँग्रेसियों और वामपंथियों द्वारा अक्सर ये आरोप लगाया जाता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका आज़ादी के आंदोलन में नकारात्मक थी।

इसके उत्तर में प्रस्तुत है संघ के विचारक प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा का स्वतंत्रता आंदोलन में संघ की भूमिका को तथ्यों के साथ रेखांकित करता हुआ लेख। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद मैंने किया है।

यह लेख टाइम्स ऑफ़ इंडिया के 9 अगस्त 2017 के अंक में प्रकाशित हुआ था और इसका शीर्षक था – 75 साल पहले आज ही के दिन : दुराग्रह के विरुद्ध

अपनी हालिया मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में अगस्त के महीने के महत्त्व को रेखांकित किया। उदाहरण के लिए आज भारत छोड़ो आन्दोलन के आह्वान की 75वी वर्षगांठ है। अपनी मन:स्थिति के अनुसार कांग्रेस और वामपंथियों ने तुरंत उस आन्दोलन में भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के योगदान पर फिकरे कस दिए।

यह स्वाभाविक था। उपनिवेशवाद के खिलाफ संघर्ष के दौरान राजनैतिक विमर्श व अकादमिक लेखन में और ज्यादातर इतिहास की पुस्तकों में संघ को सांप्रदायिक और ब्रिटिश राज्य का समर्थक कहकर लगातार बदनाम किया गया है। इतिहास को वैचारिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत किया जाता रहा है। जबकि तथ्य, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकारों की संघ पर गढ़ी कल्प-कथाओं से एक पूरी तरह अलग ही वास्तविकता को उजागर करते हैं।

गृह मंत्रालय की 1939-40 की स्वयंसेवी संगठनों पर एक रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न आयु वर्गों में संघ के स्वयंसेवकों की देश भर में संख्या करीब डेढ़ लाख आंकी गई थी।

जब द्वितीय विश्व युद्ध हुआ था तब अंग्रेज सरकार ने सेना, ARP और नागरिक सुरक्षा दस्ते के लिए नई भर्तियां निकालीं थीं। हिन्दू महासभा और कई अन्य हिन्दू संगठनों – जिसमें नाथूराम गोडसे की हिन्दू राष्ट्र सेना भी शामिल थी – ने इसे अपने कार्यकर्ताओं को सैनिक प्रशिक्षण देने के सुनहरे अवसर के रूप में देखा। ताकि वो अनुकूल समय आने पर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध छेड़ सकें। उन्होंने भर्ती एजेंट के रूप में कार्य किया और इन भर्ती केन्द्रों को व्यवस्थित और संयोजित करने में पूरा सहयोग किया।

हालाँकि संघ ने इस दृष्टिकोण का प्रत्यक्ष विरोध किया, ये एक ऐसा तथ्य है जिसे शासन के द्वारा नकारा या नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जून 1939 में गृह विभाग ने सेंट्रल प्रोविंस सरकार को अपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (1908) की धारा 16 के अंतर्गत संघ पर प्रतिबन्ध लगाने का सुझाव दिया जो कि तब तक राज्य में सबसे मजबूत संगठन था। तब प्रान्त के मुख्य सचिव जी एम त्रिवेदी ने 22 मई 1940 को केंद्र सरकार को लिखा कि यह बिलकुल उचित नहीं होगा क्योंकि इससे राज्य के अन्दर बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं।

1930 के दशक में संघ पर अंकुश लगाने की अपेक्षाकृत नरम कोशिशें करने पर सरकार को जनता के क्रोध और अपमान का सामना करना पड़ा था। संघ के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के निर्णय ने, संघ के हिन्दू महासभा के पिछलग्गू संगठन होने के सरकारी भ्रम को मिटा दिया था।

सेंट्रल प्रोविंस और बरार पुलिस की पाक्षिक रिपोर्ट में ये कहा गया है कि संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के भाग लेने से आन्दोलन को मजबूती और स्फूर्ति मिली। उन्होंने हजारों सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया और एक साल के सश्रम कारावास का सामना किया।

संघ के ब्रिटिश सरकार विरोधी रुख से क्रुद्ध सरकार ने दमन की नीति अपनाई। गृह विभाग की रिपोर्ट कहती है “अब संघ देश के राजनैतिक आंदोलनों में रूचि लेने लगा है, जिसके परिणामस्वरूप सेन्ट्रल प्रोविंस सरकार अपने परिपत्र संख्या 2352-2158 दिनांक 15/16 दिसंबर 1932 में सरकारी कर्मचारियों को संघ की सांप्रदायिक और राजनीतिक प्रवृत्तियों के बारे में चेतावनी देने, साथ ही संघ के सदस्य बनने और संघ की गतिविधियों से दूर रहने का आदेश देने को बाध्य हुई।”

7/8 मार्च 1934 को संघ की भूमिका, संगठन और विचारधारा पर 2 दिन के गहन विचार विमर्श के बाद अंग्रेज सरकार सांप्रदायिक गतिविधियों में संघ की भागीदारी सिद्ध करने में पूरी तरह से असफल रही। संघ के खिलाफ किसी भी मुस्लिम नेता या संगठन के प्रतिनिधित्व के सवाल पर और सरकार के पास संघ के सांप्रदायिक गतिविधियों में शामिल होने के सबूतों के एम एस रहमान के सवाल पर सदन के नेता राघवेन्द्र राव जवाब देने में असफल रहे। रहमान और अन्य लोगों ने संघ की प्रशंसा की और सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा।

5 अगस्त 1940 को भारतीय राज्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत केन्द्रीय सरकार ने एक अध्यादेश जारी किया। जिसमें गणवेश के प्रयोग, अभ्यास और ड्रिल आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। सरकार का यह सोचना कि यह संघ की गतिविधियों में अवरोध उत्पन्न करेगा, व्यर्थ सिद्ध हुआ। संघ के सैकड़ों स्वयंसेवकों ने इस अध्यादेश के विरोध में अपनी गिरफ्तारियां दीं।

संघ की अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी अंग्रेज शासन के लिए बर्दाश्त से बाहर थी। चिमूर और अश्ती में संघ के स्वयंसेवकों का कांग्रेस के जुलूस में बोलबाला था। उन्होंने पुलिस थानों पर हमला किया। परिणामस्वरूप इन तालुकों की पुलिस जनता के क्रूर और कठोरतम दमन में आगे रही। फांसी और आजीवन कारावास पाने वालों में ज्यादातर संघ के स्वयंसेवक थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में संघ की निरंतर बढ़ती गतिविधियों ने सनसनी मचा दी। सरकार को संघ और एनआइए की ओर से सशस्त्र विद्रोह का डर था क्योंकि इन दोनों की विचारधारा एक समान थी।

अंग्रेजों की चिंता के कई कारण थे। एक रिपोर्ट ने चेतावनी दी थी “संघ के स्वयंसेवक कई विभागों जैसे थलसेना, जलसेना, डाक और तार विभाग, रेलवे, यहाँ तक कि प्रशासनिक सेवाओं में घुसपैठ कर चुके हैं। ताकि सही समय आने पर इन सभी विभागों को अपने हित में प्रयोग करने में उन्हें कोई कठिनाई न हो।” इसमें आगे कहा गया है – “संघ ब्रिटिश शासन का अत्यधिक विरोधी है और इनके स्वरों में तेजी से अलगाववाद बढ़ रहा है।”

गृह विभाग के आधिकारिक नोटिंग अफसर जी ए अहमद ने 13 दिसंबर 1943 को सरकार के असली इरादे जाहिर किये। “भारतीय राज्य सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी भी संगठन द्वारा किसी भी तरह के शिविर लगाने को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। ये निर्णय सबसे ज्यादा संघ को प्रभावित करेगा। क्योंकि संघ की मुख्य गतिविधि ही शिविर लगाकर अपनी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना है।” इसी क्रम में संघ के संगठनकर्ताओं की गिरफ़्तारी के अलावा संघ प्रशिक्षण शिविरों पर छापे मारे गए और संघ साहित्य व हथियारों को ज़ब्त किया गया।

गाँधीवादी आंदोलनों में संघ की भागीदारी ने औपनिवेशिक शासन को सशस्त्र क्रांति से उखाड़ फेंकने की संघ की महत्वाकांक्षा और प्रवृत्ति को नष्ट नहीं किया। स्वतंत्रता आंदोलनों में संघ की अनुपस्थिति की बार संघ की कमज़ोरी नहीं है, बल्कि अपने शिक्षाविदों में बौद्धिक तपस्वियों की कमी का होना है।

इसके विपरीत वामपंथियों का इतिहास में प्रशस्ति गान उनके किसी स्वतंत्रता आंदोलनों में भागीदारी की वजह से नहीं है (स्वतंत्रता आन्दोलन में उनकी विश्वासघाती भूमिका विख्यात है), बल्कि प्रतिबद्ध शिक्षाविदों के उनके मजबूत जत्थे की वजह से है। ये हमारा दायित्व है कि अब हम देश के इतिहास को इन वैचारिक हठधर्मिताओं और दुराग्रहों से पुन: न घिरने दें।

संघ की पोल खोल भाग-7 : स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

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