रफाल और राजनीति का पप्पू काल

माननीय कांग्रेस अध्यक्ष जी ने 10 अगस्त को जयपुर में कहा कि “हमने 540 करोड़ रुपए की दर से रफाल विमान का सौदा किया था। करार तैयार था, भईया… मोदी जी को बस इस पर साइन करने थे। लेकिन मोदी जी फ्रांस गए और अपने पूंजीपति दोस्त को फायदा पहुंचाने के लिए घोटाला कर दिया।”

शहज़ादे, तारीख है 31 जनवरी, 2012 जब रफाल को एल-1 बिडर घोषित किया गया। मई 2014 तक आपकी सरकार थी। करार तैयार था क्या कलम नहीं मिल रही थी दस्तखत करने के लिए।

चिदंबरम साहब ने 16 मई की शाम को नीरव मोदी को फायदा पहुंचाने के लिए गोल्ड इंपोर्ट स्कीम पर दस्तखत कर दिए थे। रफाल तो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बहुत अहम मुद्दा था, उस पर भी कर देते।

सच यह है कि रफाल सौदे पर बातचीत कहीं भी नहीं पहुंच रही थी। कुल 126 विमानों का सौदा लगभग 40 बिलियन डालर तक पहुंच रहा था जो किसी भी तरह संभव नहीं था।

यानी 126 रफाल खरीद लें तो फिर अगले दस साल तक जीप खरीदना मुश्किल हो जाता तीनों सेनाओं के लिए। क्योंकि जो 108 विमान एचएएल में बनने थे उसे रफाल की निर्माता कंपनी दस्सो तीन करोड़ कार्य घंटे में बनाने की मांग कर रही थी जबकि एचएएल लगभग नौ करोड़ कार्य घंटे मांग रहा था। कीमतें भी उसी रफ्तार से बढ़ रही थीं।

उन्होंने आगे कहा कि रफाल का अनुबंध एचएएल से छीन कर एक ऐसी कंपनी को दे दिया गया जिसके पास विमान बनाने का कोई अनुभव नहीं है। यही बात नाराज़ अरुण शौरी जी भी कह चुके हैं।

तो शहज़ादे, सरकार तो दो साल तक फिर भी आपकी ही थी। आप अपने ही प्रधानमंत्री का अध्यादेश फाड़ देते थे। तो क्या आपको इतना नहीं पता कि एचएएल मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर था, और रिलायंस डिफेंस ऑफ़सेट पार्टनर है। जब 108 विमानों की भारत में मैन्युफैक्चरिंग हुई ही नहीं तो फिर मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर किस बात का हुआ एचएएल।

अब विमान बनाने का अनुभव कहां से ले आएं। दुनिया में 12-15 से ज्यादा कंपनियां नहीं है जो युद्धक विमान बनाती हैं। और ऑफ़सेट पॉलिसी के तहत आपको एक भारतीय साझेदार रखना पड़ेगा। टाटा का लॉकहीड मार्टिन से समझौता है और महिंद्रा का बोइंग से।

ऐसी सैकड़ों कंपनियां है जिनकी बड़ी रक्षा कंपनियों से साझेदारी है। और ज़्यादातर कंपनियां कुछ न कुछ बनाती ही हैं। यह अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर जैसा मसला नहीं है जहां चंडीगढ़ की एक कागज़ी कंपनी कागज़ पर ही ऑफ़सेट की रकम लूट ले गई। कंपनी का मिजाज़ कांग्रेसी था।

शहज़ादे का कहना है कि रिलायंस को 1.30 लाख करोड़ का फायदा पहुंचाया गया। शहज़ादे, ऑफ़सेट और रखरखाव की सारी रकम सिर्फ रिलायंस डिफेंस के खाते में ही नहीं जाएगी। रिलायंस के अलावा 71 और ऑफ़सेट पार्टनर हैं इसी डील में, यानी कुल 72 हैं। स्नेक्मा, थेल्स जैसी 72 कंपनियां इस सौदे से जुड़ी हैं और 72 ऑफ़सेट पार्टनर हैं।

तो फिर इतनी बेहयाई से झूठ क्यों बोले जा रहे हैं अध्यक्ष जी? कोई गेमप्लान है?

कम लोगों को ही याद होगा वीपी सिंह के जनमोर्चा काल का समय। बोफोर्स की दलाली में रंगे हाथ पकड़े गए कांग्रेसियों को जब वीपी सिंह के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो उन्होंने एक टैक्स हेवन सेंट किट्स में उनके बेटे के नाम फर्जी खाता खुलवा दिया और जोर-जोर से हल्ला करना शुरू किया कि देखो-देखो, राजा का बेटा चोर है।

कांग्रेसी इस मामले में उस्ताद हैं। वो जानते हैं कि देश की जनता उनके बारे में क्या राय रखती है। इसलिए उनकी कोशिश रहती है कि किसी तरह बाकियों को भी चोर साबित कर दें।

और अगर विरोधी के खिलाफ कहीं से भी कुछ नहीं मिल रहा है तो एक घोटाला मैन्युफैक्चर ही कर लो और इसी को जपते रहो इस उम्मीद में कि कुछ अनपढ़ तो इसे सच मान ही लेंगे।

यह कृत्रिम घोटाला इस बार रफाल है। इसकी डुगडुगी पीट रहा है एक शहज़ादा जो यह माने बैठा है कि गद्दी पर उसका खानदानी हक है। यह राजनीति का पप्पू काल है जहां है सिर्फ झूठ, झूठ और झूठ।

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पप्पू निकला बोफोर्स ले के

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