‘मालकिन’ के आदेश के सामने देश का मान तो बहुत तुच्छ वस्तु

नवजोत सिंह सिद्धू क्रीज़ पर बेहद आक्रामक खिलाड़ी हुआ करते थे।

इन्दौर के नेहरू स्टेडियम में उन्होंने ऐसा छक्का मारा कि गेंद रोड पार करती हुई मटकों की दुकान पर जा गिरी थी।

जब वह क्रीज पर होते थे तो भारत के दर्शक निश्चिन्त हो जाया करते थे।

आज सिद्धू फिर आक्रामक हो उठे हैं। कहते हैं कि पाकिस्तान जाकर ही रहेंगे। जबकि वे यह जानते हैं कि पाकिस्तान ने भारत के एक यात्री के इलाज के लिए मना कर दिया। क्या ये बात सिद्धू के दोस्त इमरान खान को मालूम नहीं होगी?

चुनाव जीतने के बाद इस आक्रामक खिलाड़ी ने एक दो कौड़ी का कॉमेडी शो नहीं छोड़ा। क्योंकि वह इनकी रोज़ी-रोटी थी। ठहाके लगाने के लिए लाखों का पेमेंट होता था, कैसे छोड़ा जा सकता था।

इनकी दो टके की कमेंटरी, इनकी खिजाने वाली हंसी, इनके ऊलजलूल बयान देश ने बर्दाश्त किये। लेकिन पाकिस्तान जाने की ज़िद इनका स्टंप ले उड़ेगी।

देश की जनता ही नहीं, अन्य राजनीतिक दल इनके विरुद्ध हो गए हैं। हमारे एक यात्री को मरने को छोड़ दिया गया और हमारा खिलाड़ी देश का ‘मान’ रखने के लिए तैयार ही नहीं। ‘मालकिन’ के आदेश के सामने देश का मान बहुत तुच्छ वस्तु है।

तर्क दिया जाएगा कि देश का प्रधान जा सकता है तो और कोई क्यों नहीं? मोदी तो और भी बहुत कुछ करता है, फिर उसकी नकल क्यों नहीं करते। नकल केवल पाकिस्तान जाने की ही करनी है।

खिलाड़ी नवजोत सिंह सिद्धू की जब अख़बार आलोचना करते तो वे अपने बेडरूम में अखबार की कटिंग लगाकर सोते थे, अपनी कमियों पर काम करते थे।

समय के रथ पर सवार सिद्धू कहाँ से कहाँ चए गए।

आज वह दिनभर न्यूज़ चैनल देखें। रात को अपनी कमियों पर काम करें तो सुबह तक समझ जाएंगे कि उन्होंने तो अपना ईमान ही ‘मालकिन’ के यहाँ गिरवी रख दिया है।

निष्पक्ष पत्रकारिता नाम की कोई चीज़ नहीं होती

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