कभी-कभी ‘क्या कहा’ से अधिक मायने रखता है ‘किसने कहा’

कागज़ में आसमान घोलकर एक मुट्ठी चांदनी छिड़क दी, इंद्रधनुष की ज़िल्द चढ़ाई… ऐसा मैं कहूँ तो लोग मुझे मूर्ख कहेंगे। वहीं ये सब अगर गुलज़ार कहें तो वाहवाही की बाढ़ आ जायेगी।

यानी सब ब्रांडिंग का खेल है भैया…

राहुल गांधी ने ऐसा कभी नहीं कहा कि वो एक ऐसी मशीन बनायेंगे जिसमें एक तरफ से आलू डालो तो दूसरी तरफ से सोना निकलेगा… ये उनका आरोप था कि मोदी जी ऐसा कहते हैं।

मोदी ने तो ऐसा कभी नहीं कहा… फिर भी मीडिया ने राहुल के इस तथ्यहीन आरोप एक हिस्सा छांटकर एक लाईन वायरल कर दी। लोगों ने इसे कुछ यूं लिया मानों राहुल गांधी ऐसी मशीन बनाने का वादा कर रहे हों…

मंच पर बोलते वक्त… जब आप लाखों निगाहों के निशाने पर हों… लाखों शातिर कान एक गलती सुनने की घात में खड़ें हों तो गलतियां हो जाया करती हैं।

लेकिन राहुल गलतियां कुछ ज़्यादा ही करते हैं। बड़ी मेहनत, लगन से राहुल एंड कंपनी ने उनकी जोकर की इमेज स्थापित की है।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘उन्होंने अखबार में एक ऐसे व्यक्ति के बारे में पढ़ा जो नाले से निकलने वाली गैस के इस्तेमाल से चाय बनाता है। उसने एक बर्तन को उल्टा कर उसमें छेद कर दिया और पाइप लगा दिया। अब गटर से जो गैस निकलती थी उससे वो चाय बनाने का काम करने लगा।’

तकनीकी तौर पर ऐसा असम्भव नहीं, थोड़ी जटिल मैकेनिकल कारीगरी से ऐसा सम्भव है। ज़ाहिर है मोदी का मतलब ये नहीं था कि नाले से डायरेक्ट पाईप लगाकर चाय बनाई जा सकती है। मंच पर पूरी प्रक्रिया एक्सपेलन नहीं की जा सकती।

मोदी का आत्मविश्वास संतुलित है… वहीं राहुल गांधी आत्मविश्वास की कमी और अतिआत्मविश्वास की बीमारी से ग्रस्त हैं।

मोदी एंड कंपनी इस बयान को एक क्रांतिकारी विचार की तरह वायरल करने का माद्दा रखती है। वहीं राहुल एंड कंपनी डिफेंसिव है। राहुल अपनी गलती स्वीकार कर डैमेज कंट्रोल करने लगते हैं।

राहुल को राजनैतिक दुकानदारी नहीं आती। अनुभवों का गोदाम विरासत में मिलने के बावजूद राहुल इसमें कच्चे हैं, और ये उनका अपराध है।

जबकि मोदी पक्के बनिया है। बीहड़ बियाबान को व्हाईट डेज़र्ट बोलकर बेचते हैं।

कभी कभी ये मायने नहीं रखता कि क्या कहा, ये मायने रखता है कि किसने कहा।

आज का नारीवाद बेहद सुकुमार है, धूप में कुम्हला जायेगा

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