आंसू छलका रही होगी भारत माता

बचपन से ही मैंने सैकड़ों बार मनुस्मृति जलाई जाती देखी, सुनी, पढ़ी है।

जिस देश में बही/ पुस्तक को अनजाने में भी पैर लगने पर उससे माफी मांगने वाले ढंग से प्रणाम किया जाता है, उसमें प्रथमतः मुझे वह कृत्य बर्बर और हेतुतः आघात पहुंचाने वाला लगा।

लेकिन बाद में जब मेरी सोच कुछ बढ़ी, तब मैं इन घटनाओं को ‘भगवान, उन्हें माफ कर दो, उन्हें नहीं पता कि वे क्या कर रहे हैं!’ की नज़र से देखने लगा।

पढ़ने से अधिक जलाने के लिए यदि कोई पुस्तक प्रयोग की जाती हो तो वह मनुस्मृति ही होगी। सेटैनिक वर्सेज़, लज्जा, या उस अनपढ़ अँगरेजन की शिवाजी महाराज पर लिखी बकवास वगैरह पुस्तकों का भी नंबर कभी कभार लगता है, पर स्थायी रूप से जलाई जाने वाली पुस्तक तो मनुस्मृति ही रही है।

मनोवैज्ञानिक स्तर पर दबाव को कम करने के लिए इस तरह के कृत्यों को मैं जायज़ मानता हूं। किसी किताब को जलाने से उसके अंदर की बात जल नहीं जाती।

यदि कोई श्रीमद् भगवद्गीता से नाराज़ हो कर उसे जलाए, तो बस कागज़ के कुछ पन्नों के जल कर भूरी राख में तब्दील हो जाने के अलावा कुछ नहीं होगा। गीता का ज्ञान करोड़ों लोगों को मार्गदर्शन देता आया है, और देता रहेगा। किसी और ग्रंथ के बारे में भी यही तर्क दिया जा सकता है।

वैसै इस लेख का तात्कालिक कारण कुछ लोगों द्वारा भारतीय संविधान को जलाया जाना है।

भारतीय संविधान और अन्य धार्मिक, ऐतिहासिक, टीकात्मक पुस्तकों में एक बड़ा अंतर है। अन्य पुस्तकें उनके लेखकों के अपने विचारों की अभिव्यक्ति होती हैं। भारतीय संविधान एक जीवन्त पुस्तक है जो जनप्रतिनिधियों द्वारा लिखी, स्वीकारी, अंगीकृत, और अधिनियमित की गई है।

अब तक भारतीय संविधान में 100 से अधिक संशोधन किए गए हैं। यदि किसी व्यक्ति या समूह को इस में कोई कमी नज़र आ रही हो तो उसे दूर करने के लिए एक सुनिश्चित और सर्वमान्य व्यवस्था उसी संविधान में तय की गई है।

इस पृष्ठभूमि पर जब किसी को मुंह से झाग आने की अवस्था तक उत्तेजित हो कर संविधान या अन्य कोई पुस्तक जलाकर, या उसके बचाव में उतने ही उत्तेजित हो कर आंदोलन करते देखता हूँ तो उदास हो जाता हूँ।

बिलकुल वैसे ही उदास जैसे मेरा बेटा परीक्षा में फेल हो कर घर आया हो। बेटा जो चीज़ तुमने सीख कर आत्मसात करनी थी वह हुई नहीं, मेरे संसाधन, तुम्हारे कष्ट और समय, स्कूल के अध्यापकों की मेहनत… सब पानी में डूब गए! ऊपर से तुम्हारे मन पर जो फेल होने की चोट लगी है सो अलग!

अपने बच्चों को सड़कों पर ऐसे बेसिरपैर आंदोलनों में लगे देख भारत माता ऐसे ही उदास बैठी आंसू छलका रही होगी!

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