भ्रामक है अमेज़न-फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों को ‘दुकानदार’ के रूप में देखना

एक मित्र ने कुछ दिन पहले पूछा था कि Paytm, Amazon, Flipcart और दूसरी E-Commerce कंपनियां कैशबैक और सब्सिडी देती कहाँ से हैं और प्रॉफिट कहाँ से लाती हैं? जबकि इन्हें हजारों करोड़ का नुकसान भी होता है।

मुझे Paytm का व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। अतः इसके मॉडल पर टिप्पणी नहीं कर पाउँगा। अमेरिका में पेमेंट को सुविधाजनक बनाने वाली कम्पनिया – जैसे कि वीसा, मास्टरकार्ड, स्क्वायर, इत्यादि दूकानदार से 3 प्रतिशत कमीशन लेती है जिसमें से वे ग्राहक को 1-2 प्रतिशत वापिस कर देती है।

कई बार पेमेंट कंपनी और बड़े व्यवसाय जैसे कि पेट्रोल कंपनी, सेल फ़ोन, एयरलाइन्स, होटल, शॉपिंग मॉल इत्यादि एक दूसरे के बिज़नेस को बढ़ाने के लिए ग्राहक को मोटा डिस्काउंट देती है। जैसे कि किसी होटल में रुकने पर अगर आप वीसा से पेमेंट करे तो आपको 10 प्रतिशत डिस्काउंट।

लेकिन E-Commerce कम्पनियां जैसे कि अमेज़न और फ्लिपकार्ट को एक ‘दुकानदार’ के रूप में देखना आपको भ्रमित कर सकता है। इनकी ईट-गारे की ‘दुकान’ आपके मोहल्ले या मॉल में नहीं है। अतः ना तो इन्हे ग्राहकों के नजदीक होने का किराया देना होता है और ना ही शोरूम की सजावट इत्यादि में निवेश करना होता है।

बल्कि, इन कंपनियों को मॉल, मीडिया और सेवाओं के विनिमय और ट्रांसपोर्ट के एक नए लॉजिस्टिक (कई व्यक्तियों, उत्पाद, सुविधाओं या गोदाम, सप्लाई इत्यादि की जटिल प्रक्रिया का विस्तृत समन्वय) मॉडल के रूप में देख सकते है।

ग्राहक और उत्पाद के बारे में विशाल डाटा और कृत्रिम बुद्धि के जरिये इन्हें ‘पता’ होता है कि ग्राहक क्या खरीदने जा रहा है या 2-3 या 6 महीने बाद क्या खरीदेगा, क्या नया उत्पाद बाजार में आएगा, किस रंग के, किस कट के कपड़े का फैशन होगा, और उसी अनुपात में समयानुसार माल का ऑर्डर करते हैं, गोदाम में रखते हैं।

माल भी उतना रखेंगे और उसी समय रखेंगे, जितना बिक जाए, जिससे इनके गोदाम में आवश्यकता से अधिक माल नहीं होता क्योकि उस माल के लिए जगह भी पूँजी है और माल में फंसा पैसा भी पूँजी है।

इसके अलावा, सप्लायर को पेमेंट कई बार माल बिकने के सौ दिन बाद तक करते हैं जिससे इन कंपनियों को ह्यूज कैश फ्लो और ब्याज की सुविधा प्राप्त हो जाती है।

आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि विश्व में कलर एक्सपर्ट होते है जो इस बात के मोटे पैसे लेते हैं कि गर्मी और जाड़े में कौन से रंग के कपड़े का फैशन होगा और फिर फ़ैक्टरिया उसी रंग के कपड़े प्रोड्यूस करती हैं, उसी रंग के कपड़ो से विज्ञापन लद जाता है, और समझदार व्यवसायी एडवांस में ऑर्डर देकर अच्छा प्रॉफिट बना लेता है।

एक तरह से फैक्ट्री और ग्राहक या फिर विक्रेता और ग्राहक के मध्य E-Commerce सिर्फ एक प्लेटफॉर्म प्रदान करता है। आपने माल ऑर्डर किया। पैसा अमेज़न को दिया।

इसके बाद या तो विक्रेता आपको सीधे माल पोस्ट कर देगा, या अमेज़न के किसी गोदाम से आपको पोस्ट कर दिया जाएगा।

इस पूरी प्रक्रिया में बीच के 2-3 डिस्ट्रीब्यूटर और होलसेलर का नेटवर्क, उनका कमीशन, और उस चेन में लगाने वाला समय, अलग-अलग ट्रांसपोर्ट, सब समाप्त हो जाता है।

यहाँ तक कि फैक्ट्री से माल शिप और ट्रक से ट्रांसपोर्ट होने की प्रक्रिया को वे एक गोदाम के रूप में यूज़ करते है और माल लदने के समय से ही ग्राहकों से आर्डर लेना शुरू कर देते है। इस लॉजिस्टिक चेन को सबसे पहले जापानी कार कंपनियों ने प्रयोग किया था।

अब एक आम दुकानदार अपने बिज़नेस में इस तरह की दक्षता नहीं ला सकता। अतः उसे ग्राहक को उत्पाद की जगह एक ‘अनुभव’ बेचना होगा, जो ग्राहक के दुकान में घुसने के पहले शुरू हो जाता है।

उदहारण के लिए, दुकानदार की विनम्रता, उसका सेवा भाव, आस-पास की स्वच्छता, पार्किंग सुविधा इत्यादि ग्राहक को घर से निकलने ले लिए प्रेरित करते है। अगर आस-पास सिनेमा हॉल और रेस्टोरेंट हो, ग्राहक शॉपिंग के साथ-साथ मनोरंजन भी कर लेता है।

कभी सोचियेगा कि किसी भी मॉल में सिनेमा हाल क्यों टॉप फ्लोर पर होता है? क्यों ब्रेड और दूध-मक्खन किसी भी वॉक-इन दुकान में अलग-अलग छोर पर रखे होते हैं?

शॉपिंग करने नहीं, बाज़ार में अनुभव या मनोरंजन खरीदने निकलता है आज का उपभोक्ता

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