केवल कथा नहीं है रामकथा

रामकथा को लोकोत्तर काव्य कहा जाता है। इसमें और भी कुछ है जो अनुभव गम्य है उस शक्ति को, रस भाव को- कहा ही नहीं जा सकता।

किसी काँग्रेसी मुस्लिम नेता ने तीन तलाक की तुलना माता सीता के परित्याग से कर दी। उसने गलत बयानी के लिए माफी भी माँग ली।

सवाल उठता है कि सीता परित्याग क्या वास्तविक प्रसंग है? इसका निर्णय कैसे होगा?

अनेक विद्वान यह नहीं मानते कि सीता माता का श्रीराम ने परित्याग किया था।

वाल्मीकीय रामायण के उस उत्तर काण्ड को प्रक्षिप्त अंश माना जाता है जिसमें सीता माता के परित्याग का प्रसंग है।

रामायण में बाद में जोड़े हुए कुछ और प्रसंग भी हैं जैसे चार्वाक जाबालि का प्रसंग। इन्हीं प्रक्षिप्त प्रसंगों की तरह उत्तरकाण्ड में वर्णित सीता के परित्याग का प्रसंग भी है।

रामायण का वास्तविक अंतिम काण्ड लंका काण्ड ही है। इसकी स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में भी की है। तुलसी कृत रामचरित मानस में सीता परित्याग का प्रसंग नहीं है।

वस्तुतः रामायण के हजारों वर्ष प्राचीन कथा प्रवाह में अनेक चढ़ाव उतार आए हैं। रामायण के कथा प्रवाह में नास्तिक चार्वाकों ने अपना विचार जोड़ा, जैनों और बौद्धों ने भी हस्तक्षेप किया।

जैन रामायण में उनके हस्तक्षेप के नमूने मिल जाएँगे। बौद्धों के जातक में भी दशरथ जातक का टोंटा मिल जाएगा।

बौद्ध करुणा से प्रभावित 12वीं शताब्दी के महाकवि भवमूति की संस्कृत रचना उत्तर रामचरितम् में सीता परित्याग का करुण प्रलाप मिल जाएगा।

सीता परित्याग प्रसंग क्यों प्रायोजित किया गया?

त्रिवर्ग की वैदिक स्थापना के विरोध के लिए, जिससे राज्य सत्ता का संचालन होता है और निर्वाण बाधित होता है। राज्य व्यवस्था के विरोध में मोक्ष-मुक्ति-निर्वाण के पक्षधरों ने यह काण्ड कर दिया, इसके दुष्परिणाम भी भोगा।

आधुनिक युग में भी रामायण की कथा में हस्तक्षेप हुए- कोई शूर्पणखा का चरित्र गाने लगा, कोई मेघनाद का, किसी ने लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के त्याग गुणगान गाया, कैकेयी को पछतावे की आँच में पकाया, किसी ने रावण को पलकों पर बैठा लिया। आज भी इस तरह के हस्तक्षेप जारी है।

फिर भी मूल कथा का अस्तित्व अक्षय है। तुलसी का प्रमाण यह है कि कैलास के शिखर पर अक्षय वट की छाया में बैठ कर महादेव रामकथा कह रहे हैं और माता पार्वती सुन रही हैं। यह निरंतरमान है, शाश्वत है। यह प्रमाण योगगम्य और सिद्ध है।

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि रामकथा में कोई भी युगीन हस्तक्षेप मूल कथा को प्रभावित नहीं कर सकता। कोई भी गड़बड़ झाला स्वयं छँटकर अलग हो जाता है, क्योंकि रामायण केवल कथा नहीं है, यह वेद का उपबृंहण है।

वेद के विचारों को लोकमानस तक ले जाने के लिए आदिकवि वाल्मीकि ने श्रीराम के चरित को माध्यम बनाया है। अवतार का चरित वेद धर्म को चरितार्थ करने के लिए ही होता है।

रामायण की कथा के विषय में बताया गया है कि यह वेद का उपबृंहण है यह इतिहास और पुराण भी है। रामायण आदिकवि का लोकोत्तर साहित्य है। लोकोत्तर का आशय ही यह है कि जो लोकव्याप्त होकर भी लोक से ऊपर उठा हुआ, जो कथा लोक तक सीमित नहीं हो। इस कथा के साथ मनमाना नहीं किया जा सकता।

रामायण मंत्र प्रसूत है और मंत्र से छंदित भी।

कथा की शक्ति उसकी अंतर्संरचना में है। यह शिल्प संरचना अर्थात छंद शाश्वत दिक्काल में निहित है।

रामायण कथा रूप में सबके लिए उपलब्ध है लेकिन इसका नियामक तत्त्व वेदज्ञ की जानकारी में है, वेद जाने बिना रामायण का अधिकारी प्रवक्ता नहीं हुआ जा सकता।

जैसे सूर्य अपने प्रचण्ड ताप और प्रकाश को त्याग कर अस्तित्व में नहीं रह सकता, वैसे ही राम भी सीता का परित्याग कर के अस्तित्व में नहीं रह सकते।

जिन त्रिवर्ग विरोधी, राज्य ध्वंसी, वेद विरोधी मोक्षगामी अतिवादी षड्यंत्रकारियों ने सीता परित्याग की कथा प्रायोजित की, उन्हें इतिहास ने दण्डित किया।

यदि उन्हें मलेच्छ शासन में सहस्राब्दी तक नरक भोगने के बाद भी प्रायश्चित करने का होश नहीं है तब तो हमें चिन्तित होना ही चाहिए और उन्हें अज्ञानान्धकार से खींचकर निकालने का यत्न करना चाहिए।

ध्यान रहे कि रामायण केवल कथा नहीं है। रामायण के शक्ति तंत्र में प्रवेश करते ही कथा पीछे छूट जाती है। कथा लोक रंजन के लिए है जो वेद की धर्म धारणा को लोक मानस तक पहुँचाती है और लोक को वेद की भावभूमि से जोड़ देती है।

‘सीता-राम की जोड़ी’ यूँ ही लाखों साल से ‘दाम्पत्य के सबसे सुखद जोड़े’ का पर्याय नहीं

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