क्या कमी थी हमारे देश में? सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी जैसे दूरदर्शी नेतृत्व की

विश्व भ्रमण के पहले जब मैं ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम, इटली, स्विट्ज़रलैंड इत्यादि देशों के बारे में पढ़ता या सुनता था, तो मन में भारत जैसे देश की छवि उभरती थी। इन देशों की आर्थिक समृद्धि की बातें सुनकर आश्चर्य होता था।

फिर फ्रांस में रहने का अवसर मिला और इन सभी देशों को एक छोर से दूसरे छोर तक कई बार घूमने का अवसर मिला।

अगर इटली की ही बात करे, तो वेनिस से लेकर वेरोना, सिएना, पीज़ा, सैन जिमिग्यानो, फ्लोरेंस, बोलोग्ना, रोम, नेपल्स, अमाल्फी कोस्ट, सिसीली, बारी, अलबेरोबेल्लो घूम डाला।

फिर समझ में आया। ये सभी बहुत ही छोटे देश है। बेल्जियम हमारे दो जिले के बराबर होगा। ब्रिटेन हमारे राजस्थान और उत्तर प्रदेश से भी छोटा है। पूरे ब्रिटेन को हमारे काँवड़ पैदल नाप देंगे। फिर क्या बात है कि ये इतने समृद्ध हो गए?

माना कि ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और बेल्जियम ने अपने उपनिवेशों का दोहन किया। उन उपनिवेशों की स्वतंत्रता के बाद भी वहां के अभिजात्य वर्ग से मिलकर वह दोहन चालू रहा। लेकिन फिर भी उनकी अर्थव्यवस्था को भारत इसी वर्ष पार करने में सक्षम हुआ।

कहाँ से उनकी समृद्धि बनी रही, बढ़ती रही?

केवल ब्रिटेन का उदहारण लेना चाहूंगा। पूरे विश्व में लंदन वित्तीय, बैंकिंग, विदेशी मुद्रा, इन्श्योरेन्स, एकाउंटेंसी, क़ानूनी, व्यावसायिक मध्यस्थता और समझौते, शिपिंग के लिए शीर्ष पर है। इन सेवाओं से कई बिलियन डॉलर की आय होती है, जिससे अकेले लंदन की जीडीपी लगभग 830 बिलियन डॉलर है, जो स्वीडन या ईरान से अधिक है।

शिपिंग को ही ले लीजिये। कोई बड़ा बंदरगाह ब्रिटेन में नहीं है। लेकिन विश्व में शिपिंग इन्श्योरेन्स का हब लंदन है। अगर आपको अपना शिप समुद्री डाकुओं से बचाना है, तो लंदन से आपको जहाज की सुरक्षा के लिए हथियारबंद गार्ड मिलेंगे।

अगर आपका शिप डाकुओं ने हाईजैक कर लिया, तो उन डाकुओं से नेगोसिएशन या मोल-भाव के लिए विशेषज्ञ लंदन से मिलेंगे।

जब एक रकम पर समझौता हो जाता है, तो उस फिरौती को सोमालिया में डाकुओं के डेरे पर गिराने के लिए (आप वहां ड्राइव नहीं कर सकते, नहीं तो कोई और गिरोह फिरौती का पैसा लूट लेगा) हवाई जहाज लंदन उपलब्ध करवाएगा और उनके पायलट बोरे में भरा पैसा निश्चित जगह पर गिरा देंगे।

इस पूरे कार्य-कलाप पर वहां के वकील कॉन्ट्रैक्ट तैयार करेंगे और शिप के मालिक को इन्श्योरेन्स से कुछ पैसा दिलवाने में मदद करेंगे।

ऐसा कहा जाता है कि जितनी फिरौती – जो कुछ केस में सौ करोड़ रुपये से अधिक की हो सकती है – उतनी ही रकम इस पूरे कार्य कलाप से जुड़े वहां के कंसल्टैंट, वकील, और एक्सपर्ट, शिप के मालिक से फीस के रूप में वसूल लेते हैं।

इसी तरह बहुत बड़ा बिज़नेस लन्दन में स्थित लिबोर (LIBOR) का है जो बैंकों के द्वारा एक-दूसरे से लिए जाने वाले लोन की ब्याज की दर निर्धारित करता है।

इसी प्रकार अगर दो व्यावसयिक कंपनियों के मध्य विवाद हो जाता है, तो वे अपने झगड़े को कोर्ट में ना ले जाकर लंदन स्थित मध्यस्थता और समझौता करने वाली संस्थाओ में ले जाते हैं।

इस प्रकार झगड़े सुलझाने में उन्हें कई लाभ होते हैं। सर्वप्रथम, कोर्ट की कार्रवाई पब्लिक होती है और उन कंपनियों के काले कारनामे या गोपनीय व्यावसायिक जानकारी सार्वजनिक हो सकती है।

दोनों पार्टियाँ सहमति से अपने जज चुन सकती हैं। झगड़ों का निपटारा त्वरित होता है जिससे वे झगड़े को पीछे छोड़ सकते हैं और अपने बिज़नस में ध्यान लगा सकते हैं। फिर, कोर्ट की तुलना में खर्चा भी कम होता है।

विश्व बैंक के अनुसार व्यावसायिक अनुबंध को लागू करवाने के मामले में भारत 164वें स्थान पर है और विवाद को हल करने के लिए न्यायिक प्रक्रिया में अभी भी 1,445 दिन या लगभग 4 वर्ष लगते हैं। भारत में जितनी रकम का विवाद होता है, समाधान के लिए उस रकम का 31% इस प्रक्रिया में खर्च हो जाता है।

इससे निपटने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आते ही प्रयास शुरू कर दिया। नीति आयोग में विचार करवाया, सुप्रीम कोर्ट के जज की अध्यक्षता में समिति बनाई, उसकी रिपोर्ट के आधार पर लोक सभा ने इसी 10 अगस्त को मध्यस्थता और समझौता (संशोधन) विधेयक पास कर दिया है।

जब यह कानून बन जाएगा, तब व्यावसायिक मामलों में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता दोनों के लिए भारत विश्व में एक केंद्र बन कर उभरेगा और लंदन के प्रभुत्व को चुनौती देगा। यही इस बिल का प्रमुख लक्ष्य है।

भारत में विश्व विख्यात वकील हैं, जज हैं, मध्यथता के विशेषज्ञ हैं, टैक्स एक्सपर्ट हैं, ऑडिटर्स हैं, अंग्रेजी बोलने वालो का एक बड़ा वर्ग है। और अब हम फ्रांस और ब्रिटेन से बड़ी अर्थव्यवस्था है।

क्यों नहीं हम अपने देश को विश्व में व्यावसायिक मध्यस्थता और समझौतों का गढ़ बनाएं। क्यों नहीं पूरे विश्व की कम्पनियां हमारे यहाँ अपने झगड़े सुलझाने आएं? और बदले में, इस सेवा की मोटी रकम देश में छोड़ जाएं और लाखों लोगों को रोज़गार दे जाएं।

क्या कमी थी हमारे देश में?

सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी जैसे दूरदर्शी नेतृत्व की कमी थी।

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