उत्तम शासक वही जो काम दे, ना कि भीख

लोहार – जो लोहे का काम करता है। थोड़ा विस्तार में कहना हो तो जो लोहे का उपयोग करते हुए घर व खेती के लिए बर्तन व औजार और साथ ही हथियार आदि बनाता रहा है।

लोहार के संदर्भ में क्या बस इतना ही? नहीं, यह उन व्यक्तियों का समूह है जिनके नाम पर एक युग है – लौह युग। जिस धातु के नाम पर मानव इतिहास का पूरा एक युग हो तो उससे जुड़ा लोहार कितना महत्वपूर्ण हो सकता है, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

यूं तो वर्तमान युग के ठीक पहले कांस्य युग था, जिसमें मानव ने लोहा छोड़ कर कई अन्य धातु को अपने उपयोग में लाना प्रारम्भ कर दिया था, मगर उन धातुओं पर प्रयोग करने वाले विशिष्टजन पर चर्चा यहां विषयांतर होगा और मेरा उद्देश्य वैसे भी दो धातुओं के बीच तुलना करना नहीं है।

यह सच है कि लोहे और उसके अन्य यौगिक रूपों (इस्पात आदि) का हमारे सामाजिक व दैनिक जीवन पर जितना अधिक प्रभाव पड़ा और जितनी इसकी उपयोगिता हुई उतना किसी और की कभी नहीं रही। जिस अतिमहत्वपूर्ण धातु, जिसके नाम पर एक पूरा युग है, उसका उपयोग करने वाला लोहार कितना महत्वपूर्ण होगा, इसे कहने से अधिक समझने की आवश्यकता है। जो फिर आसानी से समझा भी जा सकता है।

जिस युग में लोहे की, टिस्को और सेल जैसी बड़ी बड़ी फैक्ट्रियां नहीं थीं, ना ही लोहे का उपयोग कर कील से लेकर तलवार बनाने के कारखाने थे, ना ही इन्हें बेचने वाली दुकानें और मॉल थे, उन दिनों किसी लोहार का गांव और नगर में क्या महत्व रहता होगा, इसकी कल्पना सहज की जा सकती है।

ऐसे में आज आप लोहार जाति को जो कुछ भी समझिये लेकिन तब वे समाज में वही हैसियत रखते थे जो आज स्टील का फर्नीचर बनाने वाले गोदरेज या सरिया बनाने वाले कारखाने के किसी मालिक की हो सकती है। और इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं, यह स्वाभाविक रूप से होगी।

अब सवाल उठता है कि जब लोहे की खोज हुई होगी और इसके उपयोग का विकास किया जा रहा होगा तब ये लोहार जाति अचानक कहाँ से आयी होगी? इसके जवाब और उसके विस्तार में ही आज मुझे कुछ ढूंढना है।

जवाब में सीधे सीधे कहा जा सकता है कि लोहार और लोहार जाति लौह युग के पूर्व में नहीं रहीं होंगी। तो फिर इतने बड़े राष्ट्र के हर गांव-नगर में ये लोहार कहाँ से आये होंगे? आसमान से तो आ नहीं सकते।

स्पष्ट है कि ये सभी पूर्व में कुछ और काम करते होंगे, अर्थात अन्य जाति से संबंधित होंगे। चूंकि वे फिर धीरे धीरे लोहे का काम करने लगे होंगे तो फिर कालांतर में लोहार जाति के नाम से पहचाने जाने लगे होंगे। तो फिर इससे एक बात स्पष्ट हुई कि कोई भी किसी भी जाति से आता जाता रहा है।

कोई कह सकता है कि इनमें अधिकांश ताम्रकार या सुनार या इसी तरह से अन्य धातु का काम करने वाले लोग होंगे। मान लिया, मगर इससे यह तो प्रमाणित हो ही गया कि जाति में परिवर्तन होता रहा है। क्योंकि काम में परिवर्तन होता रहा है।

बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। अब इन सभी धातु के इतिहास में पीछे जाएँ, जब जब इनकी खोज और विकास हुआ होगा तब तब इस काम को करने के लिए आगे आने वाले लोग पूर्व में कोई अन्य काम कर रहे होंगे। और पीछे जाएँ तो यह पाएंगे कि सभी वर्णों की सभी जातियां अपने अपने कार्य के साथ जन्म लेती रही हैं।

पीछे जाते जाते जब हम प्रारंभिक बिंदु पर पहुंचते हैं तो पाते हैं कि हमारी सभ्यता का पहला काम अन्न उत्पादन अर्थात कृषि से प्रारम्भ हुआ। जब मानव और उसका समूह जंगल से निकल कर, शिकार और कंद-मूल के साथ साथ कृषि कर्म की और मुड़ा, वो हमारी सभ्यता का प्रारम्भिक बिंदु था। उस वक्त वो सिर्फ अन्न का उत्पादन करने के प्रयास में जुटा था अर्थात कर्म व्यवस्था के हिसाब से वो सर्वप्रथम शूद्र हुआ।

जैसे जैसे अन्न का उत्पादन बढ़ा होगा वैसे वैसे उसकी सुरक्षा और फिर अतिरिक्त अन्न के उत्पादन पर उस का व्यवसाय और फिर अन्य सामाजिक कर्मकांड आदि जुड़ते चले गए। यह भी एक दृष्टिकोण है, वेद में कहे उस महाकथन का, जिसके अनुसार हम सब जन्म से शूद्र होते हैं। क्योंकि यहां भी प्रारम्भ में सिर्फ एक कृषिकर्म है, और जैसे जैसे कृषि का विकास होता चला गया समाज में व्यवस्था के नाम पर वर्ण और जातियों का निर्माण होता चला गया।

लोहार तो मात्र यहां एक उदाहरण है, मगर इसके माध्यम से दो बात तय हो गयीं, एक-हम सब मूल रूप से शूद्र थे, दूसरा – हमारी जातियां-वर्ण बदलते रहे हैं। अनेक ऐतिहासिक महान लोगों के वर्ण बदलने के प्रमाण हमारे इतिहास में हैं भी।

तो फिर हम सब क्यों अपनी अपनी वर्तमान की जातियों को लेकर इतिहास में जाकर अकारण एक-दूसरे से उलझे रहते हैं? बहरहाल, हम एक बार फिर वापस आते हैं उस कालखंड में जब वैदिक समाज विकसित हो चुका था। और उसमें भी एक उदाहरण के तौर पर लोहार पर ही बात करते हैं।

यूं तो हम कह चुके हैं कि लोहार कितना महत्वपूर्ण रहा होगा और वो पूर्व में किसी भी जाति का रहा हो सकता है। मगर तत्कालीन समाज में उसके महत्व को थोड़ा विस्तार में देखते हैं। लोहार, जो आज की तारीख की परिभाषा के हिसाब से एक धातु विशेषज्ञ था प्रोडक्शन इंजीनियर था और क़्वालिटी कंट्रोलर भी, जब वो एक उत्पादक होता होगा तो वो शूद्र वर्ण में आता होगा और जब वही लोहे का व्यापार करे तो वैश्य हो जाता होगा।

यहां शूद्र को लेकर ही हमारे मन में अनेक भ्रांतियां हैं, आइये थोड़ा उसे दूर कर लें, वो भी व्यवहारिक रूप में। कृपया कोई यहां दास से भ्रमित ना हो, वो एक अलग वर्ग था और उसकी अलग कहानी है जिसके विस्तार में जाने पर विषयांतर होगा। बस एक उदाहरण से समझ सकते हैं कि पांडव जुए में पहली बार हारने पर दुर्योधन के दास ही बने थे।

हाँ तो हम बात कर रहे थे एक लोहार की, उदाहरण के तौर पर। काल और समाज कोई भी हो, एक क्षत्रिय को अपने कर्म-धर्म निर्वहन के लिए एक अच्छी तलवार और मजबूत ढाल चाहिए, ऐसे में उसके लिए एक लोहार कितना महत्व रखता होगा कोई भी अनुमान लगा सकता हैं। इस तरह से एक आम सैनिक ही नहीं किसी भी राजा के लिए लोहार कितना महत्वपूर्ण होता होगा, कोई भी समझ सकता है।

यही नहीं, जब तक लोहार, एक अच्छा प्रोडक्ट नहीं बनाएगा, तब तक कोई व्यापारी अच्छा व्यवसाय नहीं कर सकता। किसान को भी कृषि के औजार लोहार और बढ़ई से उत्तम मिलेंगे तभी वो अच्छी खेती कर पायेगा। और अच्छी खेती होने पर लोहार को बदले में उतना ही अधिक अनाज मिलेगा। तेली को तेल निकालने के औजार-उपकरण बेहतर मिलेंगे तो वो आसानी से अधिक तेल निकाल पायेगा और बदले में लोहार को उपयोग के लिए तेल दे पायेगा।

इस तरह से सभी वर्ण-जातियां एक दूसरे पर निर्भर थीं। जो निर्भर होते हैं वे उच्च या निम्न या फिर अगड़े-पिछड़े कैसे हो सकते हैं? संभव ही नहीं। और अगर मान लीजिये कोई राज्य अपने इन तकनीकी उत्पादक विशिष्ट समूह को निम्न माने या पिछड़ा बनाये रखे, क्या वो लम्बे समय तक ऐसा कर पायेगा? नहीं, यकीनन समय के साथ उसका पतन हो जाएगा।

वैदिक काल में अगर हम समृद्ध और सम्पन्न थे और दूर दूर तक सफलतापूर्वक व्यापार कर रहे थे तो इसका मतलब ही है कि समाज का उत्पादक वर्ग अपना श्रेष्ठ दे रहा था। और अन्य सभी वर्ण अपनी अपनी भूमिका निभा रहे थे और बराबर से महत्वपूर्ण थे। इतना कि एक लोहार (उदाहरण के रूप में) भी सोमरस पीने के लिए जाता था। यज्ञ में भाग लेता था। राज्य के सभाघर में इकठ्ठा होता था।

सिर्फ वही नहीं, सभी जातियों के लोग इसमें शामिल होते थे। इसके वर्णन वेदों में अलग अलग संदर्भ में मिल जाते हैं। चौंकिए मत, यहां तक उल्लेख किया गया है कि ब्राह्मण इन उत्पादकों (शूद्रों) के घर से भी दान में स्वर्ण मुद्रा की अपेक्षा करते थे। और किसी राज्य के अधिक समृद्ध होने का यह भी एक पैमाना होता कि कहाँ अधिक स्वर्ण मुद्राएं या अधिक गाय दान में मिलती हैं।

जिन्हें इन बातों पर यकीन नहीं हो रहा हो तो, एक लोहार की आर्थिक हैसियत उस युग में क्या होगी, इसका अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि आज के युग में लोहे के व्यापारी और उत्पादक का क्या आर्थिक स्तर है। संक्षिप्त में कहना हो तो शूद्र धनी होते थे और अपने काम के कारण समाज में विशिष्ट सम्मान भी पाते थे। यूं ही नहीं विश्वकर्मा भगवान का स्थान विशिष्ट रहा है।

संक्षिप्त में कहना चाहूंगा कि वैदिक समाज की इतनी उत्तम व्यवस्था थी, इसलिए यह हजारों-हजार साल चली। सभ्य समाज के इसी ज्ञान के कारण हमारा प्रभाव दुनिया पर था और हम आर्य कहलाये। यहां आर्य सभी थे, जो अपने अपने वर्ण में अपना अपना श्रेष्ठ दे रहे थे।

इस व्यवस्था में भी राजा के पास प्रशासन का अधिकार जरूर था मगर कानून बनाने का अधिकार ब्राह्मण के पास था। राजा कोई भी बन सकता था और बनते रहे हैं, चन्द्रगुप्त मौर्य इसका एक उदाहरण हो सकता है। कोई लोहार भी राजा जरूर बना होगा। राजा के पास सत्ता थी, ब्राह्मण के पास ज्ञान था तो पैसा नहीं था और वो दान और भिक्षा के लिए अन्य पर निर्भर करता, जबकि वैश्य और शूद्र आर्थिक रूप से सम्पन्न थे।

इस तरह से चारों वर्ण एक दूसरे से जुड़े भी थे और निर्भर भी थे। सभी ग्राम-नगर-राज्य आत्मनिर्भर होते। ये चारों वर्ण नगर के सामाजिक चक्र का एक हिस्सा होते। किसी एक के बिना चक्र पूरा नहीं हो सकता था। अब चक्र में भला कोई ऊपर नीचे होता है क्या? नहीं, संभव ही नहीं। आज अगर कोई यह कहता है तो वो गलत कहता है। असल में वो बाद के काल का उदाहरण देता है, जब हम गुलाम बने।

विदेशी राजा ने इस व्यवस्था पर चोट की। चक्र की निरंतरता को तोड़ा। जिस किसी ने उसकी बात नहीं मानी उस पर अतिरिक्त कर लगाया गया। उस पर अत्याचार किया गया। कइयों के काम छीन लिए गए। कइयों के काम महत्वहीन कर दिए गए।

काम का महत्व खत्म होते ही सम्बंधित समाज महत्वहीन हो गया। कईयों के काम षड्यंत्रपूर्वक किसी और को दे दिए गए, ऐसा करते ही वे बेरोजगार हो गए। गुलामी में क्षत्रियों का शासन गया तो वैश्य का व्यापार और शूद्र का काम गया और ब्राह्मणों के अस्तित्व को हिलाया गया।

शोषण करने का मुगलों का अपना तरीका था तो अंग्रेजों का अपना। कच्चा माल इंग्लैंड जाने लगा और वहाँ से माल बनकर आने लगा। परिणामस्वरूप अनेक कुटीर उद्योग बंद हो गए और लोग बेरोजगार हो गए। इनमें स्वाभविक रूप से शूद्र ही अधिक थे। गुलामी में हर वर्ग ने कुछ ना कुछ खोया मगर शूद्रों ने अपना पैतृक व्यवसाय खोया और वे गरीब और कमजोर होते चले गए।

रही सही कसर पूंजीवाद ने पूरी कर दी। जैसे ही बड़े कारखाने आये कुटीर उद्योग वाले कारीगर मालिक से मजदूर बन गए। जिसका शोषण फिर वामपंथ ने किया, समानता के नाम पर, वो भी बिना समस्या की जड़ में गए। यही कारण है जो वो जल्द ही अप्रासंगिक हो गए।

आज जब हम जाति की बात करते हैं तो उपरोक्त पृष्ठभूमि में जाए बिना प्रतिक्रिया देते हैं। कुछ लोग इसी बात पर अटके रहते हैं जब वे कहते हैं कि जातिप्रथा जन्म आधारित है, अगर ऐसी हुई तो क्यों हुई, वे इसके मूल को नहीं समझते।

आज भी एक डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और वकील का बेटा वकील क्यों बनता है? क्योंकि उसे घर में ही उस तरह का वातावरण और मुफ्त में ट्रेनिंग मिल जाती है। ठीक इसी तरह पूर्व में एक लोहार के बेटे को घर में ही कार्य की अनुभव आधारित ट्रेनिंग मिल जाती। वो बचपन से ही कार्य को होते हुए देखता, ऐसे में उसके एक सफल लोहार होने की संभावना अधिक होती और वो अपने पिता का व्यापार सँभालने में अधिक सक्षम होता।

किसी भी परिवार में घर के काम को बच्चा बचपन से जाने अनजाने सीखता और दक्ष होता चला जाता है। इस तरह से यह एक परम्परा बन गई। जो फिर जाति आधारित समाज में परिवर्तित हुई। लेकिन इसमें भी अपवाद हुए। जो सनातन में स्वीकार्य रहे हैं।

जैसे ही किसी भी जाति से सम्बंधित काम नहीं बचेगा समस्या तब शुरू होती है, परिणामस्वरूप संतुलन बिगड़ता है और समाज में तनाव उत्पन्न होता है। आज भी अगर सब के पास काम व आर्थिक स्वतंत्रता हो और अधिकारों में समानता हो, जैसा वैदिक काल में था तो किसी को क्या दिक्कत हो सकती है।

उन दिनों, राजा वही सफल और लोकप्रिय होता था, जो यह संतुलन बनाये रखता। समझदार राजा, उन जाति-समूह के लिए कोई नया काम तलाश कर देता जिनके पास काम किसी भी कारणवश नहीं बचा हो। सिर्फ विदेशी और तानशाह ही ऐसा नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें गुलाम बनाये रखना होता है। कमजोर और भूखे का शोषण आसान होता है। यह दीगर बात है कि वे भूल जाते हैं कि यह लम्बे समय तक नहीं चल सकता। क्योकिं जनता विद्रोह कर देती है।

यह सब जानते हुए भी प्रजातंत्र में भी कुछ एक यह खेल खेलते रहे हैं, विशेषकर हिन्दुस्तान में इस रूप के अनेक राजनेता मिल जाएंगे। कई जातियां, जिनके काम गुलामी में महत्वहीन कर दिए गए या छीन लिए गए थे, उन्हें आजादी के बाद भी बिना काम के रखा गया। सरकारी नौकरी कभी इसका समाधान नहीं हो सकती, मगर इस के चक्कर में सबको उलझाए रखा गया।

शासनतंत्र चाहे जो हो, शासक वही उत्तम है जो काम दे, ना कि आप को भीख दे। जो भी आप को बैठाकर खिलाने का प्रयास कर रहा है, जो भी आप को कुछ मुफ्त दे रहा है या आप को बिना काम के पैसा बाँट रहा है या सब्सिडी दे रहा है, वो आप का नुकसान कर रहा है। वो आप को दास बना रहा है, स्थाई रूप से। और दास सनातन की वर्ण-व्यवस्था में नहीं होता। यह पश्चिम के पूंजीवाद की देन है जिसे वामपंथ पालता है।

मनु ने हजारों वर्ष पूर्व एक व्यवस्था दी थी। जो इतनी सफल रही कि हजारों साल बाद उसको संकलित कर उसकी स्मृति बनाई गई। लेकिन दुर्भाग्यवश हम मनुस्मृति को बिना पढ़े जला देते हैं।

क्या हम जानते हैं कि आज भी उनकी बताई व्यवस्था ही किसी भी विकसित सभ्य देश-समाज के लिए जरूरी है। जबकि पूंजीवाद पूरे समाज को दो वर्गों में बाँट देता है, मालिक और नौकर, अंग्रेजी में have और have-not. वामपंथ इन have-not को सिर्फ भड़काता है, वर्ग संघर्ष करवाता है, मगर समाधान नहीं देता।

जबकि मनु एक संतुलित व्यवस्था देते हैं समस्या नहीं। समाज को चार वर्ग में बांटकर, इन चार पैरों की मदद से मजबूती से चलने का मार्ग सुझाते हैं।

आज की तारीख में भी हर सफल समाज में एक वर्ग होगा जो उत्पादन कर रहा होगा, सेवा के क्षेत्र में होगा आदि। किसी भी सम्पन्न समाज को सुरक्षा चाहिए अतः एक वर्ग सुरक्षा से जुड़ा हुआ होगा फिर चाहे वो सेना में हो या पुलिस आदि में। एक व्यवसाय में होगा, जो फिर दुकानदार हो या मिल मालिक।

एक वर्ग बौद्धिक क्षेत्र में काम कर रहा होगा वो प्रोफेसर-लेखक हो सकता है, पत्रकार हो सकता है, धर्मगुरु हो सकता है। इस तरह से आज के भी सभी काम, किसी ना किसी रूप में इन्हीं चारों वर्णों में से परिभाषित किये जा सकते हैं।

जिस भी देश या समाज में इन चारों समूहों में एक दूसरे पर निर्भरता होगी और जबतक वे एक चक्र में बंधे हुए रहेंगे तब तक वो समाज एक विकसित राष्ट्र और संतुलित समाज बना रहेगा। इन में से किसी में भी असुंतलन होते ही अराजकता पैदा होगी और समाज पिछड़ा और अविकसित होता चला जाएगा।

हम स्वयं को समाज में कहाँ पाते हैं उसके लिए अपने आप को वर्तमान के कर्म के आधार पर उसका मूल्यांकन करें, ना कि किस उपनाम या जातिसूचक शब्द को लेकर आप पैदा हुए हो उसके आधार पर।

जन्म का आधार महत्वहीन है अगर वो आप के वर्तमान में उपयोग में नहीं आ रहा। वो आप का भूत है। और आप उससे इसलिए जुड़े हुए रहते हो क्योंकि आप को लगता है कि सिर्फ आप का ही इतिहास विशिष्ट है।

ऐसा करते रहना तब तक स्वीकार्य हो सकता है जब तक यह आप के मन में किसी और के लिए हेय भावना जाग्रत नहीं करता। क्योंकि ऐसा करते ही आप उस व्यवस्था के मूल भाव से दूर हो जाते हैं जिस वैदिक सनातन व्यवस्था के कंधे पर पैर रखकर आप अपने आप को श्रेष्ठ मान रहे होते हैं।

अगर आप स्वयं को वैदिक समाज का हिस्सा मानते हैं और फिर भी अपने आप को किसी उच्च जाति में रखकर ही देखते हैं तो आप आर्यों की वास्तविकता से अनजान हैं। और जो लोग अपने आप को अब भी निम्न सोच रहे हैं उन्हें उपरोक्त जमीनी हकीकत जानने के बाद ऐसा सोचने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।

(आजकल लिखी जा रही अपनी पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ‘ के कुछ अंश से प्रेरित)

बाहर से आए नहीं, भारत से शेष विश्व में गए थे आर्य

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