जीवन के दो भाव : क्षमा और धन्यवाद

क्षमा

औरत जब क्षमा मांगती है
तो फलों से भरी एक डाली झुक जाती है
उन झुके हुए तनों को ताने नहीं लगते फिर
आंगन में खेलते भूखे बच्चे
हाथ बढ़ाकर तोड़ लेते हैं फल
यहीं से मजबूत होना शुरू होती है संस्कारों की जड़ें
और फैलाती है अपना वंश

औरत का क्षमाशील होना बहुत सुना होगा,
क्षमा मांगती औरत के मुंह से कभी सुनना लोरी
जन्मों के जागे कर्म भी सो जाते हैं,
उनका हिसाब नहीं लेता कोई सूदखोर ईश्वर
क्षमा मांगती औरत के आँचल में आ जाता है ढेर सारा प्रेम
वो अकेली नहीं संभाल सकती इतना सारा प्रेम
इसलिए बांटती चलती है क्षमा में चुपड़ी प्रेम की रोटी

इस जन्म में क्षमा मांग ली है मैंने
अपने पिछले सारे जन्मों के कर्मों के लिए
इसलिए मेरे हिस्से में आया है चूल्हे का सुख
मेरा जीवन एक सांझा-चूल्हा है
यहाँ सभी को आने की अनुमति है
अपना सुख-दुख पकाकर
जिसको जैसे जो बनाना आता हो बना जाता है
मेरे आँगन में रोज़ लंगर लगता है
ज़मीन से जुड़े लोग ज़मीन पर बैठकर
तृप्त होकर जाते हैं

इसलिए तृप्त कोख से जब भी कोई शिशु जन्म लेता है
मेरी छाती में उतर आता है दूध

सारे तूफानों को झेलकर
जब भी कोई फूल खिलता है
मेरी माटी महक जाती है धरती की तरह

जब भी कोई कुमारी पड़ती है पहले प्रेम में
मैं उसका प्रेमी हो जाती हूँ

जब भी किसी राज कुंवर को हो जाता है प्रेम
मैं उसकी प्रेमिका सी हो जाती हूँ

उम्र की चालीसवीं दहलीज़ पर
जब भी किसी स्त्री को होता है आभास
कि वो फिर कर सकती है प्रेम
तो मेरी धरती का कोई बंजर टुकड़ा
श्राप से मुक्त हो जाता है

मेरी मुक्ति की यात्रा से जुड़ी है
कइयों की यात्रा
इसलिए जब भी कोई योगी
समाधिस्थ होता है
मैं निर्वाण को प्राप्त होती हूँ…

धन्यवाद

औरत जब धन्यवाद देती है तो
धन्य हो जाता है समय का वो हिस्सा
जो उसकी उम्र जितना लंबा है,

उस धन्यवाद काल में
जब भी कोई उसके नज़दीक आता है
वो धन्य हो जाता है

धन्यवाद मुद्रा में जीती किसी औरत
को कभी गाली नहीं लगती
किसी कुंठित व्यक्ति की कुंठा भी
उसके पास आकर तरल हो जाती है

धन्यवाद एक तापमान है
जो ठोस से ठोस द्रव्य को भी द्रव में बदल सकता है

मैंने उन सारे लोगों को धन्यवाद दे दिया है
जिन्होंने मुझे दुत्कारा
और उस अपमान और कुंठा को
मैंने कीमिया बनाकर
एक नए तत्व की खोज की

धन्यवाद वही तत्व है
जो ठोस को द्रव
और द्रव को वाष्प में बदलकर
चेतना को वाष्पीभूत कर देता है

यदि कभी अस्तित्व से
जादू बरसता दिखाई दे
तो समझना धन्यवाद देती हुई किसी स्त्री का
तुमसे गुज़रना हुआ है

जो सिखा रही है कि
जो गुज़र चुका उसे धन्यवाद दे दो
वो यदि तुमसे न गुज़रा होता
तो तुम वह न होते जो आज हो

इसलिए मैं धन्य होती हूँ
जब कोई मुझे किसी वाद की तरफ खींचता है
और मैं हर बार अपवाद की तरह
उसमें से खुद को बचा ले आती हूँ

आप सभी को जीवन का धन्यवाद

तुमसे मिलने से पहले

जिनके लिए ये दुनिया आभासी नहीं, उनके लिए ‘आभा-सी’ ही रहने दो…

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