गए थे जिसे मिटाने, उसी को आबाद कर आये!

राजदीप सरदेसाई,

तुम्हें पता है, जैसे ही तुम्हारा नाम या चेहरा नज़रों के सामने आता है वैसे ही अनायास एक दृश्य स्मृति पटल पर उभरता है, जिसमें तुम अमेरिका की सड़कों पर अपना कोट उतार रहे हो और शर्ट की बाहें ऊपर कर मारापीटी पर उतारू हो चुके हो, और मैं आँखे बंद कर लेता हूँ।

फिर भी यह घटनाक्रम याद आते ही मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है। पता है, ऐसी हरकत करने वाले को शुद्ध हिंदी में क्या कहते हैं? ‘सड़कछाप’।

बुरा मत मानना, ये शब्द असंसदीय नहीं है, ना ही अपशब्द है, ये तो समाज का एक जाना-पहचाना वर्ग है जो सड़कों पर देखा जा सकता है, विशेषकर भारत की सड़कों पर, और इसी विशिष्ट अलंकार ने तुम्हारी पहचान बना रखी है, मेरे दिलो दिमाग पर।

वैसे तुम अकेले नहीं हो तुम्हारे कई साथी विशेष उपमाओं से जाने-पहचाने जाते हैं, जैसे कि एक ‘क्रांतिकारी’ पत्रकार हैं, वो आजकल सफाई देते फिर रहे हैं कि उन्हें क्यों निकाला गया, मगर लोग हैं कि उनकी एक ‘क्रांतिकारी क्रांतिकारी’ घटना को भूल ही नहीं पा रहे।

ऐसे ही तुम्हारा एक और मित्र है ‘कौन जात’, वैसे उनकी जाति आजतक किसी को नहीं पता।

अरे, तुम फिर गलत समझ बैठे, यहां मेरा जाति से संबंध वोट बैंक वाली जाति से नहीं है, जिसके चक्कर में तुम लोग दिन रात एक किये रहते हो। यहां जाति से मेरा मतलब है नोटबैंक वाली जाति।

अर्थात शुद्ध हिंदी में पूछें तो दलाल हो या अंग्रेजी में प्रेस्टीट्यूट या फिर शूटर या स्लीपर सेल। अरे… फिर तुम कन्फुज़िया गए, ये शूटर और स्लीपर सेल भी राजनीति और कॉरपोरेट के संबंध में है, किसी अंडरवर्ल्ड से इसे मत लिंक कर लेना।

वैसे आजकल कुछ अंदर-बाहर नहीं रह गया, सब खुला खेल है। इसलिए जनता से क्या शर्माना और दर्शकों से क्या छुपाना। ये पब्लिक है ये सब जानती है।

हां, तो मैं बात कर रहा था, सड़कछाप नाम की। लेकिन यह नाम देते ही अनेक सड़कछाप और आवारा लड़के मुझसे नाराज़ हो सकते हैं। क्योंकि इन सब का भी कोई ईमान होता है, उसूल होता है।

जैसे कि ये लोग अपने मोहल्ले के प्रति इतने अपनेपन का भाव रखते हैं कि कोई बाहरी आकर मोहल्ले की बुराई नहीं कर सकता, ना ये कहीं बाहर जाकर अपने मोहल्ले की शान से कोई समझौता करते हैं।

और आप लोग हो कि रोज शाम असहिष्णुता का पिटारा ले कर कहीं भी शुरू हो जाते हो। अब देखो ना, उस दिन न्यू यॉर्क में मोदी जी मैडिसन स्क्वायर गार्डन के अंदर भारत का नाम ऊंचा करने में लगे हुए थे और तुम बाहर उसे उतारने पर आमादा थे।

वैसे एक सच्चा सड़कछाप भी राष्ट्रवाद पर कभी बहस नहीं करेगा। कुछ चीजें ऐसी होती हैं कि उनपर किसी बहस की कोई गुंजाइश नहीं रहती। मगर तुम लोग तो “भारत तेरे टुकड़े होंगे” को कवर भी करते हो, फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उस पर बहस भी करते-करवाते हो।

इसलिए तुम्हारा पुराना नाम ही सही था, “2002”! लोग तुम्हें इस नाम से ज्यादा जानते और पहचानते हैं। पता है, तुमने ये शब्द अपने पूरे कैरियर में इतनी बार लिया है कि कंप्यूटर ने भी गिनने से मना कर दिया था।

अगर तुमने इसका दसवां भाग भी किसी असुर का नाम जपा होता तो वो भी सुन सुन कर इतना पक जाता कि स्वयं महादेव के पास पहुंच जाता। और माँ भवानी की सौगंध, महादेव इतने भोले हैं कि उस असुर पर दया करते और तुम्हे हमेशा के लिए गुजरात पुराण का अखंड पाठ जपने से मुक्त कर देते।

वैसे सुना है, तुमने अपने से गुजरात का अखंड पाठ नहीं रोका बल्कि तुम्हारे आका ने तुम्हे ऐसा करने के लिए कहा। वैसे ये तुम्हारे फाइनेंसर की अक्लअकल भी भैंस चरने चली गई थी क्या, जो इतनी देर से समझ आयी।

अब भैंस पर याद आया कि तुम्हें गौरक्षकों से बहुत घृणा है जबकि गौभक्षकों से विशेष प्रेम है। बीफ पार्टी का नाम लेते ही तुम्हारे मुँह में जो स्वाद उतरता प्रतीत होता है उसे तुम छुपाते भी नहीं, उलटा स्वयं को गोवा का बता बता कर अपने लार को टपका भी देते हो। और ऐसा करके तुम अपने को बड़ा एडवांस माने आधुनिक भी समझते हो।

जो तुम ये खाने की स्वतंत्रता की बात करते हो, उस पर तुम्हें एक ज्ञान की बात बताता हूँ, ध्यान से सुनना। हम सब के पूर्वज जब जंगल में रहते थे तो सब खाते थे, कुछ एक तो नरभक्षी भी होते थे।

मगर जैसे जैसे वे सभ्य हुए उन्होंने खाने में अपने आप को सबसे पहले नियंत्रित और नियमित किया। क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, क्या शरीर के लिए हितकर है और क्या नहीं, इस समझ ने ही उन्हें मानव बनाया।

जब उन्होंने देखा कि गाय के दूध से शरीर की हड्डी मजबूत होती है और शरीर मांसल होता है तो उन्होंने इसके मांस को खाने से मना किया। वैदिक ऋषियों ने तो गौ माता के दूध के अन्य अनेक फायदे बताये और इस तरह गाय को पूजनीय स्थान मिला।

बहरहाल विस्तार में ना जाते हुए, इस तरह से वो दानव से मानव बने और तुम हो कि अब तक जंगली ही बने हुए हो और बने रहना चाहते हो। वैसे तुम यह तो समझते ही होगे कि मुर्गी को तो एक बार ही काट कर खाया जा सकता है, ज़िंदा रहेगी तो कई दिन अंडे देगी। अब भी बात समझ नहीं आ रही तो आगे तुम्हारी मर्जी।

तुम्हें लग रहा होगा कि आज अचानक मैं तुम्हारे पीछे क्यों पड़ गया। नहीं नहीं, तुमने कोई गलत काम थोड़े ना कर रखा है कि पुलिस की तरह किसी चोर के पीछे लग जाऊं। वैसे भी मैं पुलिस नहीं आम जनता हूँ जो यूं ही किसी के पीछे नहीं पड़ती। तो फिर क्या मामला है?

हुआ यूं कि पिछले दो दिनों से एक अंग्रेजी का प्रकाशक तुम्हारी आने वाली किसी पुस्तक के प्रचार में ऐसा लगा हुआ है कि उसकी पोस्ट दिन में दस बार स्क्रीन पर सामने आ जाती। वो वैसे मेरा भी प्रकाशक रहा है, अन्यथा मैं उसे अनफॉलो जरूर कर देता।

अब तुम्हारा चेहरा बार बार फेसबुक पर सामने आ जाता, इस जबरन प्रदर्शन का हिसाब किताब तो करना पड़ेगा। ऐसे कैसे कोई एक तरफा विज्ञापन परोस सकता है। तो मैंने जब उस पोस्ट पर लोगों की प्रतिक्रिया पढ़ी तो मेरी हंसी निकल पड़ी। कितनी इज्जत करते हैं लोग तुम्हारी, देख कर हैरना हूँ। क्या तुमने देखी?

अब इन सब को भक्त मत कह देना। वैसे आजकल भक्तों को भी फुर्सत नहीं है। पता नहीं प्रकाशक ने देखी कि नहीं? ज़रूर देखी होगी। क्या सोचता होगा? कुछ तो ज़रूर सोचता होगा, सोचना चाहिए।

वैसे मैंने तो तुम्हे अच्छी उपमाओं और अलंकारों से सम्बोधित किया है मगर वहाँ तो शुद्ध हिंदी भी रोमन में लिखी जा रही थी। वैसे जितने विशेषण तुम्हारे लिए वहाँ लगाए गए हैं, उसके बाद क्या उस पुस्तक का नाम “न्यूज़मैन” हो सकता है? सेल्समैन तो हो सकता है न्यूज़मैन कहना थोड़ा ज्यादती नहीं हो जाएगी। झूठ भी तो लिमिट में बोला जाना चाहिए, वरना अपच होने का खतरा रहता है।

एड में कहा जा रहा है कि तुम्हारे द्वारा 2019 के चुनाव का विश्लेषण होगा। तुम्हारे माध्यम से तुम्हारे फाइनांसर को एक बात बताऊँ, कि तुम्हे कुछ दिनों के लिए सीन से हटा लें। तुम लोग घर पर आराम करो। तुम लोगो के सीन से हटते ही, जिन लोगों के लिए तुम लोग काम करते हो वे चुनाव के दंगल में कम से क़म मुकाबले में तो नजर आने लगेंगे। और फिर तुम लोगों को हटाते ही उनका पैसा भी बचेगा जो तुम लोगों पर बेवजह पर खर्च हो रहा है।

जहां तक रही तुम लोगों की रोज़ी-रोटी की बात, तो उसके लिए तुम लोगों के पास कोई कमी नहीं। क्या करोगे इतना पैसा। अब कोई नोट तो चबाओगे नहीं। वैसे भी बहुत पैसे कमा लिए, अब थोड़ा यश भी कमा लो। इसके लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं, सिर्फ सच के साथ खड़े हो जाओ। एक बार करके तो देखो। देखना कितना प्यार मिलता है।

पता है, ये देश बहुत सहिष्णु है, अन्यथा जिस तरह के तुम लोगों के कारनामे हैं, कोई और देश-समाज होता तो अब तक तुम लोगों के साथ भीड़ अपना न्याय कर देती। क्या तुम जानते हो, मोदी को किसने बनाया? तुम लोगों के विष-प्रहार ने। चाहते तो मोदी भी तुम्हारी तरह ही प्रतिक्रिया दे सकते थे, लेकिन उन्होंने सबकुछ सहा और वे नीलकंठ बन गए।

एक तरह से तुम लोगों ने अपने मालिक का पैसा खराब ही किया है… गए थे जिसे मिटाने, उसी को आबाद कर आये। यह है तुम्हारा कर्मफ़ल। तुम इस पर यकीन तो करोगे नहीं, क्योंकि इसमें हिन्दू विचारधारा आ गई है और तुम्हे भगवा रंग से नफरत है।

अब भी समय है मान जाओ, और पत्रकारिता को वातानुकूलित कमरे में बैठकर करना छोड़ दो। पत्रकारिता वैसे भी सड़कों पर उतर कर ही की जानी चाहिए लेकिन ध्यान रहे वो सड़कछाप नहीं होनी चाहिए।

अंत में एक बात और कहता हूँ, एक बार गोधरा का नाम ले लो, सिर्फ एक बार दिल से, वो सभी आत्माएं तुम्हे ऊपर से दुआ देंगी, जिन्हें ज़िंदा रहते जला दिया गया था। ऐसा करते ही तुम्हारा जीवन सफल हो जाएगा और तुम्हे वो पुण्य मिलेगा कि तुम गंगा नहा लोगे।

क्या हम बच पाएंगे?

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