इस एक्ट से दलितों के लिये चुनौतीपूर्ण होगा प्राइवेट सेक्टर में प्रवेश

कुछ दिन पहले मेरे पड़ोस का एक लड़के ने तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने के बाद प्राइवेट सेक्टर नौकरी के लिये आवेदन करना शुरू किया।

इस दौरान वह प्राथमिक परीक्षा को पास करके साक्षात्कार तक पहुंचा। साक्षात्कार के दौरान उसे एक कागज़ दिया गया जिस पर उसे अपने निकट संबंधियों का नाम तथा उनसे संबंध लिखना था।

दुर्भाग्य से जब वह मात्र चार साल का था, उसके पिताजी की असामयिक मृत्यु हो चुकी है। बहुत दिक्कतों का सामना करते हुये उसकी मां ने उसका पालन-पोषण किया और उसे पढ़ा लिखा कर इस काबिल बनाया कि आज वह नौकरी की तलाश कर रहा है।

लिहाजा उसने कागज पर सिर्फ अपनी मां का नाम लिखा और जमा कर दिया। साक्षात्कार के दौरान उससे पूछा गया कि नौकरी के दौरान अगर उसे सूचना मिले कि उसकी मां की तबीयत खराब है तब वह क्या करेगा?

उसने सहजता से उत्तर दे दिया कि वह कुछ दिन का अवकाश लेकर मां की सेवा में जुट जायेगा। इसके बाद जब रिजल्ट घोषित हुआ तो उसमें उसका नाम नहीं था।

फिर अभी महीने भर पहले वह देश की एक ख्यातिप्राप्त कंपनी में नौकरी के लिये साक्षात्कार देने गुजरात के अहमदाबाद गया था। वहां भी कंपनी के एचआर ने उससे यही प्रश्न पूछा कि अगर उसे अहमदाबाद में नौकरी मिल गयी तो उसकी मां की सेवा कैसे होगी?

उसने जवाब दिया कि मां अभी स्वस्थ है और तत्काल उसे किसी प्रकार की सेवा की आवश्यकता नहीं। बाकी जब वह नौकरी करने लगेगा तो अपनी मां को भी अपने साथ अहमदाबाद ही बुला लेगा। संभवत: तब तक शादी भी हो चुकी होगी और मां की सेवा करने के लिये घर पर एक महिला उपलब्ध होगी।

इस बार भी उसे नौकरी नहीं मिली। हां, एचआर ने चलते समय उसे समझाया ज़रूर कि बेटा, कोई भी कंपनी यह नहीं चाहेगी कि जिसे वह पैसा दे रही है वह काम छोड़कर कभी छुट्टी पर जाय। लेकिन तुम्हारी परिस्थितियां ऐसी हैं कि तुम्हें कभी भी छुट्टी की आवश्यकता पड़ सकती है। लिहाज़ा हम चाहकर भी तुम्हें यह नौकरी नहीं दे सकते क्योंकि कंपनी ने हमें ऐसे कर्मचारी चुनने की जिम्मेदारी दी है जो उसके लिये हमेशा काम करते रहें।

घर आकर उसने जब यह बात मुझे बतायी तो मैंने उससे कहा कि अब वह जब भी किसी साक्षात्कार में जाये और वहां उससे उसकी पारिवारिक पृष्टभूमि से संबंधित प्रश्न पूछे जायें तो वह उन्हें सच न बताये। वह उनसे झूठ बोले और बताये कि उसके बाद भी उसकी मां की सेवा करने के लिये परिवार के सदस्य मौजूद हैं।

प्राइवेट सेक्टर में किसी भी इमोशनल मुद्दे की कोई जगह नहीं होती। बहुत निष्ठुर है वहां की दुनिया। तुम वहां अपनी और मां की दिक्कतों के साथ अपने बीते कल तथा भविष्य की परेशानियों को गिनाकर कुछ हासिल नहीं कर पाओगे। उन्हें एक ऐसा कर्मचारी चाहिये जो दिन-रात उनके आदेश पर काम करने के लिये तैयार हो। उसके पास अवकाश लेने के कारण कम से कम हों।

अब जरा इस घटना को सदन में कल पास हुये एससी/ एसटी एक्ट के नये संशोधनों से जोड़कर देखते हैं।

बहुत सारे लोग बता रहे हैं कि इस एक्ट का दुरुपयोग होगा जोकि तय भी है। क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि इसका पहले भी दुरुपयोग होता रहा है लिहाजा आगे भी निश्चित तौर पर होगा।

एक तथ्य यह भी है कि देश में कुल नौकरियों में से लगभग पांच प्रतिशत पब्लिक सेक्टर से आती हैं तो 95% नौकरियां प्राइवेट सेक्टर उपलब्ध कराता है।

प्राइवेट सेक्टर… जहां तमाम कवायदों के बावजूद भी आजतक आरक्षण नहीं लागू हो सका है। चूंकि प्राइवेट कंपनियां ऐसे कर्मचारी रखना चाहती हैं जिनके कारण उन्हें किसी प्रकार की परेशानी न उठानी पड़े।

उपरोक्त घटना को ध्यान में रखकर सोचें तो जो कंपनी किसी ऐसे लड़के को भी छोड़ सकती है जिसके पास तमाम हुनर के बावजूद मात्र उसकी मां के कारण अवकाश लेने की नौबत आ सकती है, वह कंपनी किसी ऐसे कर्मचारी को कैसे लेगी जिसके चलते उसे भविष्य में थाने और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ जायें।

कहने का मतलब यह है कि इस एक्ट से दलितों के लिये प्राइवेट सेक्टर में प्रवेश चुनौतीपूर्ण होगा। बाकी उसका फायदा किसे होगा वह आप अंदाजा लगाते रहिये।

कब तक ज़ीरो और दशमलव के गाने बनाकर थपथपाते रहेंगे अपनी पीठ

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