जब ‘सहारा, Zee, आजतक’ से निकले या निकाले गए, तब किस सरकार का दबाव था!

पुण्य प्रसून बाजपेई ने उपन्यास टाइप सफाई प्रस्तुत की है, जिसमें सिर्फ मोदी ही मोदी हैं।

वहाँ कमैंट्स में एक सज्जन श्री शरत सांकृत्यायन का कमेंट मिला जो पठनीय लगा, आप भी पढिये :

पुण्यप्रसून जी, आपको ‘सहारा’ से बेइज्ज़त कर के निकाला गया था, तब किस सरकार का दबाव था?

फिर आप ‘ज़ी’ से निकले या निकाले गये, तब किसका दबाव था?

अभी दो महीने पहले ही ‘आजतक’ से आपको निकाला गया, किसके दबाव पर?

मेरा कहना बस यही है कि जब आप नौकरी करने जाते हो तो आपको मालिक के एजेंडे पर चलना पड़ेगा, अपनी विचारधारा जेब में रखनी पड़ेगी।

यदि आप बड़े पत्रकार हो और आपको लगता है कि आपके कहे का असर सरकार के स्वास्थ्य पर भी होता है, लेकिन आपको बोलने नहीं दिया जा रहा है तो आप नौकरी मांगने जाते ही क्यों हो?

अपना चैनल चलाओ, अपना अखबार निकालो… वहां आपको कौन रोकेगा सरकार की आलोचना करने या किसी के भी गुणगान करने से!

रजत शर्मा की प्रतिबद्धता बीजेपी के प्रति जगज़ाहिर है और वो खुलकर अपना एजेंडा चला रहे हैं।

प्रणव राय की सरकार के प्रति नफरत भी लोगों को पता है, फिर भी वो अपनी मर्जी से चैनल चला रहे हैं। रवीश उनके एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं और आपसे दस गुणा ज्यादा बेरहमी से मोदी की आलोचना कर रहे हैं।

यदि सरकार का ही दबाव चलता तो सबसे पहले रवीश रोड पर होते, या एनडीटीवी कब का बंद हो गया रहता… लेकिन वो बेधड़क चल रहा है बगैर किसी टीआरपी के…

अरणव गोस्वामी की ट्यूनिंग मालिकों से नहीं बैठी, तो आज वो अपना चैनल अपने मनमुताबिक चला रहे हैं।

काँग्रेसी नेता नवीन जिंदल ने ‘ज़ी’ से लड़ने के लिए चैनल शुरू किया और दिन रात ‘ज़ी’ के खिलाफ अभियान चलाया… न किसी ने रोका, न वो ‘ज़ी’ का कुछ उखाड़ पाया।

आखिरकार थक हार कर उन्होंने चैनल बंद कर दिया और सैकड़ों लोग एक झटके में सड़क पर आ गये… तब किसका दबाव था जिंदल पर?

आज खेमों में बंटी पत्रकारिता मालिकों के रहमोकरम पर जी रही है… किसी की औकात नहीं है कि तन के खड़ा हो सके…

मालिक चाहेगा मोदी का गुणगान करो, तो करना होगा… मोदी को गाली दो, तो देना होगा… आप संपादकों की औकात ही क्या है कि आप खुद को शहीद बनाए फिर रहे हैं!

  • Sarat Sankrityayan

अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ आपकी नहीं, सबसे पहले है यह आम आदमी का हक़

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