The Devil’s Advocate के बहाने : गीता उपदेश

The Devil’s Advocate में किआनू रीव्स है, इसमें अल पचीनो भी है। वकील बने किआनू रीव्स जहाँ नायक की भूमिका में हैं, वहीँ अल पचीनो एक लॉ फर्म के मालिक, खलनायक (शैतान) की भूमिका में हैं।

पोप के चुनाव के वक्त एक पादरी ये ढूंढता है कि पोप बनाये जा रहे व्यक्ति के चरित्र में क्या क्या दोष हैं। जो ये बताता है कि इस व्यक्ति को क्यों पोप नहीं बनाया जाना चाहिए उसे डेविल्स एडवोकेट कहते हैं।

फिल्म डेविल्स एडवोकेट नाम की ही एक किताब पर आधारित है। इसके खलनायक का नाम जॉन मिल्टन (पैराडाइस लॉस्ट के लेखक) के नाम पर है। फिल्म की कहानी और निर्देशन पर इतालवी कवि दांते (इन्फर्नो) का भी प्रभाव है, लेकिन वो सब बाद में। पहले फिल्म की कहानी जो कि केविन नाम के कोई मुकदमा नहीं हारने वाले वकील से शुरू होती है।

केविन एक ऐसे शिक्षक का मुकदमा लड़ रहा है जो एक बच्चे के यौन शोषण का आरोपी है। केविन को पता चल जाता है कि उसका मुवक्किल दोषी है, स्थानीय पत्रकार लेर्री उसे मुकदमा हारने की चेतावनी भी देता है। इसके वाबजूद केविन अदालत में पीड़ित-पक्ष से ऐसे सवाल करता है कि उनकी विश्वसनीयता जाती रहती है और अपराधी शिक्षक छूट जाता है।

उसकी जीत के बाद न्यू यॉर्क की एक बड़ी कंपनी से उसे अच्छी तनख्वाह और मकान का प्रस्ताव मिलता है। तरक्की के लिए केविन अपनी पत्नी के साथ मेनहट्टन चला जाता है, काम में व्यस्त रहने लगता है, अपनी पत्नी मैरी एन्न पर कम ध्यान देता है। केविन की माँ उसे घर वापस लौट आने और लालच छोड़ने की सलाह भी देती है, केविन मानता नहीं। उसकी पत्नी को अजीब अजीब से दृश्य दिखाई देने लगते हैं।

उसी वक्त एलेक्स नाम के एक अमीर आदमी पर अपनी बीवी के क़त्ल का इल्जाम आता है तो वो सनसनीखेज़ मुकदमा भी केविन को मिल जाता है। ऑफिस में व्यस्त केविन एक सहकर्मी क्रिसाबेल्ला के सपने भी देखने लगता है।

उधर उसकी पत्नी मैरी एन्न को और डरावने सपने आते रहते हैं। एक डॉक्टर जब मैरी एन्न को बच्चे पैदा करने में असमर्थ बता देता है तो वो केविन से फिर से वापस अपने छोटे शहर लौट चलने को कहने लगती है, लेकिन केविन अब भी नहीं मानता।

लॉ फर्म का मालिक मिल्टन (अल पचीनो) केविन से एलेक्स का हाई प्रोफाइल केस छोड़ देने के लिए भी पूछता है, लेकिन वो मुकदमा छोड़ने से इनकार कर देता है। लॉ फर्म के एक पार्टनर एड्डी को लगने लगता है कि तेजी से तरक्की कर रहा केविन उसकी जगह हड़पना चाहता है।

केविन और एड्डी में खींच तान भी होती है और केविन, मिल्टन को इस बारे में बताता है। मिल्टन कहता है कि लॉ फर्म के काम करने के तरीकों की शिकायत वाली एड्डी की धमकी पर ध्यान देने कि ज़रूरत नहीं। थोड़े ही वक्त बाद कुछ राक्षसों जैसे दिखने वाले, एड्डी को पीट-पीट कर मार डालते हैं और मैरी एन्न ये देख लेती है।

एलेक्स के मुक़दमे की तैयारी के दौरान केविन को पता चल जाता है कि उसकी नौकरानी झूठ बोल रही है, क़त्ल एलेक्स ने ही किया है। वो मिल्टन को तो ये बात बता देता है, मगर मुकदमा एलेक्स के पक्ष में ही लड़ता है।

मुकदमा ख़त्म होने के थोड़ी ही देर बाद केविन को उसकी पत्नी एक चर्च में मिलती है। वो कहती है कि उसका बलात्कार हुआ है। उसके पूरे शरीर पर कटे के निशान होते हैं और वो कहती है कि उसका बलात्कार मिल्टन ने किया है!

केविन उस वक्त मिल्टन के साथ ही अदालत में था इसलिए मान लेता है कि मैरी एन्न का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है। वो मैरी एन्न को पागलखाने में भर्ती करवा देता है। केविन की माँ, पागलखाने में केविन और उसके एक सहकर्मी के साथ मैरी एन्न से मिलने जाती है मगर मैरी को केविन की साथी भी शैतान जैसी दिखने लगती है। उसपर एक आईने से वार करके मैरी एन्न खुद को कमरे में बंद कर लेती है। जबतक केविन दरवाजा तोड़ता वो कांच के टुकड़े से अपना गला काट लेती है।

अब केविन की माँ उसे बताती है कि मिल्टन उसका पिता है। जब केविन इस सब के बारे में मिल्टन से पूछताछ करने पहुँचता है तो बाकी बातों के साथ मिल्टन ये भी कबूलता है कि उसी ने मैरी एन्न का बलात्कार किया था।

गुस्से में केविन पिस्तौल से कई गोलियां मिल्टन के सीने में उतार देता है। गोलियों का मिल्टन पर कोई असर नहीं होता और वो दिखाता है कि वही शैतान है! जब केविन शैतान पर अपने हालात का दोष लगाता है तो वो कहता है उसने तो बस मंच सजाया था, किया तो सबकुछ केविन ने खुद ही है!

शैतान चाहता था कि केविन और उसकी सौतेली बहन क्रिसाबेल्ला से एंटीक्राइस्ट संतान उत्पन्न हो। अपनी हालत समझकर केविन को होश आया कि वो शैतान की कठपुतली बना हुआ है। अचानक उसे याद आता है कि हालात पैदा करना ज़रूर किसी और के हाथ है, लेकिन प्रतिक्रिया का चुनाव उसके खुद के विवेक पर निर्भर है। शैतान की कठपुतली बनने के बदले केविन पिस्तौल से खुद के ही सर में गोली मार लेता है।

दृश्य अचानक बदल जाता है और केविन अब अचानक वापस उसी शिक्षक के मुक़दमे में है, जिसे उसने शुरू के दृश्य में यौन शोषण के आरोप से बचा लिया था। इस बार केविन पिछली बार की तरह पीड़ित पक्ष से जिरह नहीं करता। वो मुकदमों के लिए अयोग्य घोषित किये जाने की धमकी के बाद भी अपराधी शिक्षक का मुकदमा लड़ने से साफ़ इनकार कर देता है।

फिल्म ख़त्म होती है तो एक पत्रकार उसका साक्षात्कार लेने आता है, वो कहता है कि वो केविन को प्रसिद्ध बना देगा। मैरी एन्न के कहने पर केविन साक्षात्कार के लिए हामी भर देता है। जैसे ही मैरी और केविन जाते हैं, इंटरव्यू लेने आया लेर्री धीरे से मिल्टन में बदल जाता है।

फिल्म की कहानी पूरी तरह से मिल्टन के पैराडाइस लॉस्ट पर आधारित कही जा सकती है और ‘स्वर्ग में चाकरी से बेहतर है नरक में राज करना’ जैसे डायलॉग देता नायक केविन, मिल्टन को ही उद्धृत कर रहा होता है।

इसाई शैतान की अवधारणा यही है कि एक देवदूत मानता था कि उसके गुणों को तिरस्कृत किया जा रहा है और इसलिए वो स्वर्ग का त्याग करके अपने लिए नरक बनाने को को तैयार हो जाता है। नायक केविन उसी तरह अपने लिए एक नरक का निर्माण करता है।

गेटे के लिखे जैसा शैतान हमेशा लोभ और मोह से जुड़ा हुआ दिखाया गया है। महंगे सूट पहने, अमीर, बड़ी कंपनी के मलिक के रूप में शैतान को दर्शाना भी आम है। क्रिसाबेल्ला (या इसाबेल्ला) ऐसी फिल्मों में इस्तेमाल होने वाला आम नाम है जिसका मोटे तौर पर मतलब होगा खूबसूरत क्राइस्ट (ईसा)।

बार बार एक ही क्रिसाबेल्ला के बारे में सोचते केविन का जो हो रहा होता है, उसके लिए भगवद्गीता में कहा गया है कि विषय के बारे में लगातार सोचने से मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति पैदा हो जाती है।

आसक्ति से पाने की कामना पैदा होती है। कामना के पूरे ना होने से क्रोध पैदा होता है। क्रोध होने पर सम्मोह (मूर्खता का भाव) पैदा हो जाता है। सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।2.63

विवाहित होने पर भी अनैतिक संबंधों में नष्ट होते परिवार सबने देखे होते हैं, लेकिन फिल्म का केविन बार बार क्रिसाबेल्ला के बारे में सोचता हुआ क्रिसाबेल्ला में आसक्त होकर ये भूल जाता है।

स्थितियां अपने हाथ में हों ना हों, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया का चुनाव हमेशा मनुष्य के अपने हाथ में होता है। यथेच्छसि तथा कुरु (18.63) में श्री कृष्ण यही कहते हैं। अंतिम दृश्यों में से एक में अपने सर में गोली मारता केविन करीब करीब इसी सिद्धांत के मिल्टन वाले फ्री विल को दर्शाता है।

ईसाइयों में जो सात बड़े पाप गिने जाते हैं उनमें से एक वैनिटी यानि अहंकार (आत्ममुग्धता) भी है। एक अंतिम दृश्य ही नहीं, फिल्म के कई दृश्य इसी को दर्शा रहे होते हैं। ये अहंकार ही भगवद्गीता के अट्ठारहवें अध्याय के उनसठवें श्लोक का भी विषय है। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं :

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।18.59

यानी अहंकारवश तुम जो यह सोच रहे हो कि मैं युद्ध नहीं करूंगा, तुम्हारा ये निश्चय झूठा है। तुम्हारा स्वभाव ही तुम्हें जबरन इसमें लगा देगा।

अब जब आप ठीक-ठीक समझ चुके हैं कि हमने फिल्म की कहानी के धोखे से भगवद्गीता पढ़ा दी है तो ये देखते हैं कि ये अंतिम हिस्से से एक श्लोक क्यों?

भगवद्गीता के शुरुआत में (2.9) अर्जुन बड़ा साफ़ साफ़ कह रहे होते हैं कि “मैं” युद्ध नहीं करूँगा। भगवद्गीता में ‘मैं’ को भी दो रूपों में दिखाया गया है। भगवद्गीता के एक ही श्लोक में सिमट गए धृतराष्ट्र का एक ‘मैं’ है जो अपने पुत्रों और पांडुपुत्रों में स्पष्ट भेद पहचानता है।

ऐसा ही एक ‘मैं’ अर्जुन का भी है जो विपक्ष में खड़े योद्धाओं को “मेरे” श्वसुर, “मेरे” बन्धु, “मेरे” भाई, के रूप में पहचान रहा है। वो भगवान श्री कृष्ण से कहता तो है कि मैं आपकी शरण में हूँ (2.7) लेकिन कृष्ण की सलाह नहीं मानता!

अर्जुन के लिए “मेरा” कर्म की बाधा तभी होती जब उसने अपने कर्म कृष्ण को समर्पित नहीं किये होते (7.13), भगवान को समर्पित कर्म में तो प्रकृति उसे बांधती नहीं (7.14। जीव कई कर्म प्रकृति के वश में होकर ही करता है ऐसा तीसरे अध्याय के तैंतीसवें श्लोक में लिखा है।

जैसे किसी दक्षिण भारतीय को रोज चाउमीन खिलाना, जर्मन को शाकाहारी भोजन देना या किसी जैनी को मुर्गा खिलाने की कोशिश वैसी ही होगी जैसे भेड़ को मांसाहार या भेड़िये को घास खिलाने की कोशिश। आप एक-आध बार जबरदस्ती कर भी लें, तो वो मौका पाते ही अपने स्वाभाविक आहार पर आ जायेगा।

यहीं भगवद्गीता में एक दूसरा “मैं” दसवें अध्याय के भगवान का भी है। ये नदियों को भी मैं, हवा में भी मैं, ऋषियों में मैं, अग्नि में मैं, हर ओर मैं ही है। ये विश्वरुप का मैं है, जो हर ओर, हर जगह व्याप्त है, ये किसी को धृतराष्ट्र की तरह अपने और पराये में नहीं बांटता।

ये वो मैं हैं जो अट्ठारह अध्याय सिखाने के बाद तिरसठवें श्लोक में आराम से कह सकता है कि जो तुझे ठीक लगे वो कर। ये वो मैं है जो जानता है कि स्वभाव ही युद्ध में लगा देगा मगर फिर भी कर्म और उसके हिसाब से कर्मफल चुनने की जिम्मेदारी निश्चिन्त होकर किसी और को दे देता है, न आज्ञा थोपता है, न श्रेय लेना चाहता है।

बाकी ये जो हमने धोखे से पढ़ा डाला वो नर्सरी लेवल का है, और पीएचडी के लिए आपको खुद पढ़ना पड़ेगा ये तो याद ही होगा?

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