अगर संख्याबल में हार जाओगे तो कुछ भी न बच सकेगा

सवर्ण हिंदुओं के खाये-पिये अघाये एक वर्ग को भारतीय (विकृत) लोकतंत्र में संख्याबल का महत्व नहीं समझ में आ रहा है।

यही लोग हैं जो एस सी/ एस टी एट्रोसिटी एक्ट पर सरकार के स्टैंड को पानी पी-पीकर कोसते जा रहे हैं।

संख्याबल कितना आवश्यक है, यह कभी पाकिस्तान के विस्थापितों से पूछिये… ज्यादा पीछे न जाते हुए 1990 के कश्मीर से खदेड़े गए पंडितों से ही पूछ लें।

कश्मीर में पंडित सर्वाधिक शिक्षित, ऊँचे सरकारी पदों पर बैठे हुए लोग थे, बड़े-बड़े बागानों के मालिक थे।

संख्या साथ न रही तो खदेड़ कर मार दिए गए, स्त्रियां और बच्चे तक नहीं बख्शे गए।

हाँ, कश्मीर में न एट्रोसिटी एक्ट था और न ही दलितों/ पिछड़ों को आरक्षण ही मिला हुआ था।

पंडितों की योग्यता हो या भारतीय राष्ट्र-राज्य संविधान, लोकतंत्र… कोई भी उन्हें बचा नहीं पाया, बचा सकता भी नहीं था क्योंकि संख्याबल नहीं था।

कैराना… मल्लापुरम… मुर्शिदाबाद… किशनगंज… जैसी जगहों पर लोहा लेने वाले बहुतायत लोग वह दलित/ पिछड़े ही हैं जिन्होंने आज भी इन जगहों को भारतीय नक़्शे में बनाये रखा है।

मालदा/ मुर्शिदाबाद/ झारग्राम/ धुबड़ी/ करीमगंज/ सिलचर/ चतरा जैसी जगहों की डेमोग्राफी को स्टडी करिये और देखिये कि जनसांख्यकीय आक्रमण से जूझते यहाँ के जनजातीय/ दलित योद्धाओं को इस्लामवाद से बचाने के लिये क्यों एट्रोसिटी एक्ट जैसे कड़े क़ानूनों की ज़रूरत है।

अगर संख्याबल में हार जाओगे तो आईआईटी/ आईआईएम की डिग्रियाँ, उच्च सरकारी पद, और कथित योग्यता से पाई हुए संपत्ति… कुछ भी न बच सकेगा।

बचने का मार्ग एक ही है, साथ के अन्य हिंदुओं को भी इंसान समझिए, बराबरी का व्यवहार करिये, सवर्ण या अवर्ण होने के फर्ज़ी जातिवादी दम्भ से बाहर आइये।

हिन्दू ही अन्य हिंदुओं की रक्षा कर सकते हैं। 1947 हो, 1983 हो, 1989 हो, 2002 हो या 2013 का मुज्जफरनगर हो, हर जगह यह बात ध्रुव सत्य रही है।

संख्याबल हारोगे तो सुप्रीम कोर्ट, संसद, और सेना बैठ कर सिर्फ़ तमाशा देखेगी।

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