बौद्धिक बेईमानी से भरी सस्ती सी फिल्म ‘मुल्क’

आज ‘मुल्क’ देखते हुए यही सोच रहा था कि, लगता है मानो विचारधारा की सारी लड़ाई अब सेल्यूलाइड पर ही लड़ा जाना है।

कभी रहा होगा फिल्म मनोरंजन का साधन लेकिन, अब यह विधा केवल एजेंडा सेट करने के लिए हारे-थके हुए लोगों का गिरोह ही है।

इससे पहले ऐसी ही फिल्म आई ‘राज़ी’ नाम से जिसमें काफी महीन तरीके से राष्ट्र को हर बेहतर चीज़ों का बनाम ठहरा देने, जो भी कुछ बेहतर है समाज में, राष्ट्रीयता को उसका विरोधी ठहरा देने की बेहूदी सी कोशिश की गयी थी उसमें।

‘मुल्क’ उसी तरह की बेईमान फिल्म लेकिन ज़रा ज्यादा बेहूदे तरीके से, वही घिसे-पिटे सवालों के साथ बनी है, जिन सवालों से देश सत्तर सालों से जूझ रहा है।

आप जो भी कहें, आगे भी इनके सवाल वही जारी रहना है। जैसे आतंक का कोई धर्म नहीं होता… फलाना ढिमकाना आदि।

हां… दिक्कत यह है कि हमारे पास जवाब भी वही घिसे-पिटे से होते हैं। हर वाहियात सवाल का माकूल बौद्धिक जवाब हो सकता है अपने पास लेकिन, सत्ता के मद में अभी मस्त हम राष्ट्रीय लोगों के पास भी फुर्सत कहाँ हैं उनसे बड़ा विमर्श खड़ा कर उसका जवाब देने की।

जैसा कि पहले ही कहा कि जब सवाल ही घिसे पिटे पुराने से हैं, तो बिना मतलब उसका जवाब हज़ार बार देने में समय क्या ख़राब किया जाय, फिर भी ‘लव ज़ेहाद’ की शिकार एक बेवकूफ किस्म की लड़की के कंधे पर रख कर फेंके गए कुछ सवालों की शिनाख्त ज़रूरी है।

ऐसी लड़की जो खुद ही होने वाले बच्चे का धर्म अपने मालिक यानि पति के मज़हब पर रखने को विवश की जा रही हो, जो उसी की मुखालफत में भाग आयी हो पति के पास से, उसके द्वारा कुछ मूर्खों जैसे सवाल पुछवा कर ताली बटोर लेने की वाहियात सी कोशिश वाली फिल्म का नाम है मुल्क। बहरहाल।

सबसे बड़ा विषय। आप बंटवारे के समय पाकिस्तान नहीं गए, ऐसा कर आपने भारत राष्ट्र पर महानतम उपकार कर दिया, इस नैरेटिव से पता नहीं कब मुक्ति मिलेगी इस मुल्क को।

भाई मेरे… सीधी बात है, आपको मज़हब के आधार अपना हिस्सा मिल गया था, उसे भी ले लिया और दूसरे भाई के हिस्से आये मुल्क पर भी कब्ज़ा जमा कर बैठे रहे जबकि सीधे तौर पर आपको ‘अपने’ मुल्क जाना था, या यहां रहते तो कम से कम इस्लाम का अनुयायी बन कर नहीं रहना था। अजीब सी दाढी, बड़े भाई का कुर्ता और छोटे भाई का पजामा पहन कर अरबी पहचान की मूंग मुल्क के छाती पर तो नहीं दलनी थी।

इस सवाल का जवाब नयी तरह से हमने पहले भी देने की कोशिश की है। हमारा घर तब के हिन्दू राष्ट्र रहे ‘नेपाल’ से बमुश्किल बीस किलोमीटर होगा। सीमायें भी खुली हुई थी। आज भी हैं। कोई पासपोर्ट वीजा नहीं चाहिए था। फिर भी हमने अगर भारत में ही रहना चुना तो ऐसा कर हमने कौन सा अहसान कर दिया देश पर?

या अपनी बेहतरी के लिए, इन्सान की तरह रहा जा सके, इसलिए अपने मतलब के लिए अपने ही राष्ट्र में रहना तय किया होगा न? क्या हम इस पर अहसान जताएं देश से?

अगर नहीं, तो किसी मुसलमान को क्यूं अहसान जताना चाहिए इस बात का? या उसके बड़प्पन में कसीदे पढ़ते हुए हम क्यूं बिछ-बिछ जायें कि मौलाना साहब कितने महान हैं ए. के. हंगल की तरह कि उन्होंने भारत में रह कर इतना बड़ा उपकार किया हम पर, ये कहें?

फिल्म में एक जगह कहा गया है कि whatsapp सन्देश की जगह अगर हमने इतिहास पढ़ा होता, तो हम बेहतर सोचते। अब कहिये आप ही… कौन सा इतिहास हमें पढना चाहिए था। वही इरफ़ान हबीब वाला?

उन उचक्कों के गिरोह द्वारा लिखा औपन्यासिक इतिहास हमें पढना चाहिए था, जिनमें से एक हबीब के अनुसार संघ और आईएसआईएस में कोई फर्क नहीं है? फिल्म में बार-बार पूर्वाग्रह की बात कही गयी है, तो क्या ऐसा दुराग्रह रख कर लिखे गए कथित इतिहास को पढ़ कर आप whatsapp से ज्यादा ज्ञान पा सकते हैं?

आप सोचिये… ऐसे कथित इतिहासकारों का जवाब तो यह हो सकता है न, कि संघ की आज समूचे देश-प्रदेशों में भारी जनमत की सरकार है। ऐसे में हबीब जैसे लोग राजधानी दिल्ली के सत्ता के सबसे करीब रफ़ी अहमद मार्ग से ऐसा बोल कर शान से निकल जाते हों, और उनकी जुबान अगर आज भी उनके हलक में ही सलामत हो, किसी ने दस-बीस जूते भी उन्हें नहीं मारे हों, तो कैसे यह साबित हो सकता है कि संघ और आइएस एक जैसे ही हैं?

और अगर यह साबित नहीं होता है तो ऐसे अभागों-नमकहरामों के लिखे ‘उपन्यासों’ को पढने से अच्छा क्या फेसबुक / whatsapp पढना नहीं हो सकता है?

फिल्म में समूचे मुक़दमे की कार्यवाही, ख़ास कर प्रोसिक्यूशन को जिस भौंडे तरीके से प्रस्तुत किया गया है, कहीं भी किसी वकील द्वारा कोर्ट में ऐसा नहीं होता। कभी भी कोई वकील यह नहीं कह सकता कि ‘कम कुरआन पढ़ा तो इतना बड़ा आतंकी हुआ, ज्यादा पढ़ लेता तो कितना बड़ा होता।’

मोटे तौर पर यहां यही दिखाने की बे-ईमान सी कोशिश हुई है कि आतंक के मामले में अभियोजक से लेकर अनुसंधान अधिकारी तक सभी दुराग्रही होते हैं, और सभी मुसलमानों के दुश्मन!

मोटे तौर पर कोई भी ढंग का डिस्कोर्स पैदा नहीं करते हुए, तय एजेंडे पर चलती यह फिल्म इतनी स्तरहीन है कि क्या कहें? समूची फिल्म रवीश कुमार के प्राइम टाइम की तरह है जहां एक भी मुस्लिम आतंकी आरोपित व्यक्ति जेल से छूट जाता है, तो घंटे भर का विमर्श तान दिया जाय, हिन्दू आरोपी छूटते रहें बाइज्ज़त तो कोई बात नहीं।

आखिर एक आतंकी के परिवार की चिंता में पूरी फिल्म निकाल दी गयी लेकिन, उसी कथित हमले में मरे सोलह लोगों के परिवारों के बारे में कौन सोचेगा भला?

भौंडे तर्कों की श्रृंखला में फिल्म में धमकी भरे अंदाज़ में कहा जाता है कि पांच सौ साल पहले जायेंगे आप, तो आपको पांच हज़ार वर्ष पहले भी जाना होगा। मतलब यह कि अगर मुगलों को आप आक्रान्ता कहेंगे तो कथित तौर पर पांच हज़ार वर्ष पहले बाहर (शायद किसी अज़रबैजान या कुस्तुन्तुनिया) से आये हिन्दू भी हमलावर ही करार दिए जायेंगे।

अब वही हबीब गिरोहों को कौन समझाए कि पचास हज़ार वर्ष पहले भी हम यहीं के थे और हमेशा रहेंगे। हरियाणा के बागपत – जिसे पांडवों द्वारा मांगे गए पांच गांव में से एक के रूप में हम जानते रहे हैं- से हाल ही में निकले पांच हज़ार वर्ष से ज्यादा पुराने महाभारत कालीन साक्ष्यों को देख कर भी अगर इन अल हबीबियों की आंख नहीं खुले तो क्या इनमें गंगाजल डाल कर इन्हें शुद्ध किया जाय?

और एक मिनट के लिए मान भी लें कि पांच हज़ार वर्ष पहले किसी टिम्बकटू से हम आ भी गए थे, तो आज तो कम से कम वहां से पंद्रह सौ डॉलर हमारे पास नहीं आते न? आज भी वहां की अजीब सी वेशभूषा, अज़ीब से आसमानी किताब के लिए लहू की दरिया तो नहीं पार करते न हम? यह फर्क तो हमें समझना होगा न?

फिल्म के अंत में अजीब से तर्कों के साथ न केवल तक़रीर दे देते हैं जज साहब कि, सारा इस्लामी समुदाय अब्दुल कलाम जैसे ही हैं, बल्कि केस से इतर यह भाषण ही सुना देते, यह फतवा भी दे देते हैं कि मंदिरों में भाषण नहीं होना चाहिए। (अलबत्ता सड़कों पर ट्रैफिक रोक कर नमाज़ ज़रूर पढ़ते रहना चाहिए।) बेवकूफ कहीं के।

भाई मेरे, कोई आतंकी हमला होगा, परिवार के भीतर उसकी प्लानिंग होगी। पाकिस्तान से तीन सौ फोन कॉल्स आयेंगे। संयोग से ही सही लेकिन हमले वाले दिन ही वहां से हवाला से डॉलर आयेंगे, ऐसे में क्या संदिग्धों की पड़ताल नहीं होगी? ऐसा होना मज़हब के नाम पर तकलीफ देना होगा?

अजीब-अजीब सी दलील। छूआछूत का लोग जिक्र करेंगे अगर आप आतंक की बात करेंगे तो? बिना मतलब छत्तीसगढ़ के बारे में अनर्गल बात, जिसकी भर्त्सना करता हूं यहां के शासन और पार्टी से जुड़े होने की बिना पर।

सीधे तौर पर यह कह कर आतंक को जस्टिफाई करने की कोशिश कि ‘आदिवासियों पर हुए अत्याचार पर’ भी बोलना चाहिए। फिल्मकार कैसे इस नतीजे पर कूद कर पहुंच गया कि आदिवासियों पर भारी अत्याचार हो रहे हैं। इस ग़लतबयानी के लिए उस पर न्यायिक जवाबतलब होना चाहिए।

इसी तरह इशारों में यह पूछा जाना कि अगर भारत में आतंक इस्लाम के नाम पर हो रहे हैं, तो नक्सल आतंक क्या है? सीधे तौर पर इसका जवाब यह है कि सारा आतंक मज़हबी ही है भारत में। अल्लाह या मुहम्मद यानी एक मज़हब के नाम पर इस्लामी आतंक, तो दूसरे कम्युनिस्ट मज़हब के नाम पर नक्सल क़त्ल-ए-आम हो रहा है।

निश्चय ही वर्तमान युग के दो मज़हब (इस्लाम और कम्युनिज्म) के नाम पर ही आतंक है देश भर में। यह चिल्ला-चिल्ला कर कहते रहने की ज़रूरत है। फिल्म या अन्य प्रोपगंडा माध्यमों को जो कहना है, कहते रहें।

फिल्म के अंत में एक भद्दी सी तस्वीर बनायी गयी है। काफी शातिराना ढंग से रूपकों में काफी कुछ कह दिया गया है। जब आरोपी को रिहा कर दिया जाता है तब उनके हिन्दू पड़ोसी, जो आतंकी हमले के बाद उनके खिलाफ हो गए थे, वे गले मिलने को आते हैं।

आरोपी ऋषि कपूर उसे हिकारत से देखते हुए गले मिलने के लिए उसके फैलाए बाजुओं को खुला ही छोड़, अपनी हिन्दू बहू से मिलने चला जाता है। गोया… वह यह कहने की कोशिश हो कि, भले हमले होता रहे लेकिन, अगर आप इस्लामियों पर शक करेंगे तो आपको माफ़ नहीं किया जाएगा, जबकि लव ज़ेहाद की शिकार हो, कोई लड़की इस्लाम स्वीकार करे, मुहम्मद हो जाय कोई आरती, तो उसका इस्तकबाल होगा। जैसे कश्मीर में कभी नारे लगते थे- हिन्दुओं, अपनी बेटी और संपत्ति को यहीं छोड़ कर जाओ। बहरहाल।

एक वाहियात सी बौद्धिक बे-ईमानी से भरी सस्ती सी फिल्म है मुल्क। फिल्म विधा को भी राष्ट्रवाद के खिलाफ एक खतरनाक टूल के रूप में उपयोग किया जा रहा है। इस पर ध्यान दिए जाने की ज़रुरत है।

आरती मल्होत्रा से बनी आरती मोहम्मद बनाम आरती कपूर

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY