बेटी के नाम दो पत्र

मेरी प्यारी बेटी!

कल तुम्हारा जन्मदिवस है। मैं इस अवसर पर उपस्थित रहने की हर संभव कोशिश करूँगा। पर अब जबकि तुम थोड़ा-बहुत अपने आस-पास के परिवेश और प्रकृति को समझने लगी हो तो मैं चाहूँगा कि तुम दुनिया के बारे में कुछ और भी जानो। यद्यपि मैं मानता हूँ कि सच्ची जानकारी अपने अनुभव से ही आती है, परंतु अच्छा व संवेदनशील इंसान दूसरों के तजुर्बे से भी सीखता है।

मेरी बेटी, मैंने एक पिता के रूप में कभी नहीं चाहा कि तुम अंकों और सफलता की अंधी दौड़ में शामिल होओ, इसीलिए मैंने कभी भी तुम पर कोई बात थोपने की कोशिश नहीं की। मैं चाहता हूँ कि तुम अपना बचपन स्वाभाविक व प्रसन्न होकर जियो।

मेरे लिए तुम्हारी उन बातों का भी विशेष अर्थ रहा है, जिसे प्रायः दुनिया निरर्थक मानती है। तुम जब छोटी थी तो घण्टों अपनी गुड़िया या किचेन-सेट आदि से खेलती रहती थी और हम चुपचाप तुम्हें निहारा करते थे, जब मैं स्कूल से थका-माँदा लौटता था तो तुम दौड़कर मेरी बाँहों में झूल जाया करती थी और मैं तरो-ताजा हो उठता था, मैं जब सुबह-सुबह आसन-प्राणायाम करता था तो तुम भी वहीं मेरे बगल में बैठकर अपने में मग्न रहा करती थी- तुम्हारे छुटपन की ये तमाम बातें हमारे जीवन की सबसे प्यारी व ऊर्जादायी स्मृतियों में शामिल हैं।

वक्त गुज़रता गया और किताबों का बोझ तुम पर न जाने कब और कैसे बढ़ता चला गया, मैं निरुपाय इसे देखता-समझता-सहता रहा हूँ। परंतु मेरे मन में हमेशा यह दबी इच्छा रही कि तुम आज भी रंग-बिरंगी तितलियों के पीछे भागो और उनके रंग चुराओ, फूलों का सौरभ अपनी साँसों में बसाओ, चिड़ियों से गप-शप करो, फूलों-पत्तों पर बिखरी ओस की बूँदों के साथ अठखेलियाँ करो, पेड़ों की शाख़ें तुम्हारी डोल बनें, धरती-चाँद-सितारे-सागर-पर्वत-नदी सब तुम्हारे सहचर हों, बारिश की रिमझिम फुहारें तुम्हारे अंतर्मन को आंदोलित करे; खिली धूप, खुली हवा, झूम के बरसने वाले बादल, सतरंगे इंद्रधनुष- सब तुम्हें सम्मोहित करें।

चारों ओर बढ़ते शोर के बीच भी तुम भीतर के संगीत को, चराचर में व्याप्त अंतर्लय को, समष्टिगत चेतना को महसूस करो! जीवन किताबों से कहीं ज्यादा बाहर फैला और पसरा है, उसे भरपूर जियो। हौसलों के पंखों पर सवार होकर अपना आसमान खुद चुनो और तय करो! और कभी हौसले पस्त होने लगे, अँधेरा छाने लगे तो इतना भर याद रखना कि हर रात की सुबह होती है!

हाँ, इतनी शिक्षा अवश्य ग्रहण करो कि तुम्हें सही-गलत का सम्यक बोध हो जाय! तुम समझदार बनो, पर इतने भी नहीं कि ज़िंदगी बोझिल बन जाए। वैसे भी हम ‘समझदारों’ ने भगवान की बनाई इस दुनिया की ख़ूबसूरती को बिगाड़ने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी है। इसलिए थोड़ी नासमझी, थोड़ा भोलापन, थोड़ी मासूमियत ताउम्र बचाए रखना।

गलतियों से डर-डरकर नहीं, बल्कि गलतियाँ कर ही कई बार जीवन के बेहतरीन पाठ सीखे जाते हैं। इसलिए मार्ग के कष्ट-कंटकों की परवाह किए बिना, जो सोचो, जो चाहो उस पथ पर दृढ़ता से आगे बढ़ो; बड़े सपने देखो और बड़ा सपना वही है जो अपने लिए नहीं औरों के लिए संजोए जाते हैं; जो दूसरों के दर्द बाँटता है, आँसू पोंछता है, पीछे छूट गए लोगों को हाथ बढ़ा आगे लाता है, वही सच्चा स्वप्नद्रष्टा है।

आँखों में स्वर्ग हों, तब भी पाँव ज़मीं पर टिकाए रखने में ही असली सफलता है, आनंद है। खुशियाँ अकेले नहीं पाई जा सकती, इसलिए सर्वसाधारण के साथ घुलो-मिलो; जीवन है तो संघर्ष तो होगा ही होगा, पर नायकत्व तो इसी में है कि प्रतिकूल परिस्थितियों और विरोधी वृत्तियों के बीच भी समन्वय और संतुलन साधकर आगे बढ़ा जाय।

मेरी बच्ची, भले ही हम खूब परिश्रमी-प्रतिभाशाली क्यों न हों, पर याद रखना -जो भी सफलता या उपलब्धियाँ हम अर्जित करते हैं, वह हमारे अकेले के प्रयत्नों का सुफल नहीं होता, बल्कि उसके पीछे अनेक जाने-अनजाने-अनाम चेहरों की भूमिका होती है।

इसीलिए कृतज्ञ रहो- ईश्वर की बनाई इस दुनिया और उन तमाम लोगों के प्रति जिनका तुम्हारे जीवन में रंच मात्र भी योगदान रहा है! इससे तुम पाओगी कि तुम्हारे जीवन में आनंद ही आनंद होगा, खुशियाँ ही खुशियाँ होंगी, सहयोग ही सहयोग होगा।

बड़ों के समक्ष विनम्र और छोटों के प्रति सहृदय रहो! एक ऐसे दौर में जबकि उपहारों की कीमत से ही स्नेह-संबंधों का आकलन किया जाने लगा है, मेरे विचार ही तुम्हारे जीवन के बहुमूल्य उपहार बनें, इन्हीं भावों के साथ- जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! हमेशा खुश रहो,जीती रहो!


मेरी प्यारी बेटी,

पिछले दिनों अपनी कार्यालयी व्यस्तता और जिम्मेदारियों के कारण मैं तुम्हें पर्याप्त वक्त नहीं दे पाया और इन दिनों भी मैं तुमसे दूर हूँ, इसका मुझे खेद है।

मेरी बेटी, तुम मेरे लिए कितना मायने रखती हो या किसी भी माता-पिता के लिए उनकी संतानें कितना मायने रखती हैं, यह शायद तुम्हें या संसार को बताने की आवश्यकता नहीं है। पर मैं अपनी कुछ भावनाएँ स्वयं की व्यग्रता को शांत करने के लिए लिख रहा हूँ, बड़ी होकर जब तुम इसे पढ़ोगी तो शायद तुम्हें यह राह दिखाए या रोमांचित करे!

मेरी बेटी, तुम मेरे जीवन में ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ वरदान-सदृश हो, तुम्हारी माँ मुझे इससे सुंदर उपहार नहीं दे सकती थी।

मेरी बेटी, इन दिनों मेरा मन तुम्हारे कल को लेकर थोड़ा चिंतित, आशंकित और व्यग्र है। मैंने अपनी ओर से तुम्हारी परवरिश में कोई कसर बाकी नहीं रखी है और संभवतः कोई माता-पिता नहीं रखता होगा।

मेरी बेटी,तुम्हें बताऊँ जब तुम बार-बार मुझसे अपने आस-पास की दुनिया और चीजों के बारे में पूछती रहती हो तो एक-आध बार झुंझला उठता हूँ, पर वह झुंझलाहट ऊपरी होती है, भीतर-भीतर मुझे प्रसन्नता होती है कि दुनिया और चीजों को जानने की तुममें तीव्र उत्कंठा व जिज्ञासा है। और मेरे लिए यह और खुशी की बात है कि तुम आज के तथाकथित प्रगतिशीलों की तरह हर बात जानकर ही नहीं मानती हो, बल्कि कुछ बातें मानकर भी जानती हो।

हम अपनी संस्कृति, संस्कार, परंपरा, विश्वास और मूल्यों को मानकर भी जान सकते हैं। मेरी बेटी, मैं नहीं जानता कल बड़े होकर तुम क्या करोगी, क्या बनोगी, कैसे विचारों को आत्मसात कर आगे बढ़ोगी?

तुम्हारी ज़िन्दगी है, उसे अपनी मर्ज़ी व तरीके से जीने का तुम्हें पूरा हक है, विचार और विश्लेषण की भी तुम्हें पूरी आज़ादी है, अन्याय व अत्याचार का प्रतिकार भी तुम्हारा धर्म है, पर मेरी बच्ची, हो सके तो मेरी इतनी बात ज़रूर मानना कि जिस माटी, जिस देश में तुम्हारा जन्म हुआ है, कभी उसके विरुद्ध काम करने वालों के साथ मत खड़ी होना, जिस शहर, जिस गली, जिस गाँव और गोद ने तुम्हें पाला-पोसा उन सबके प्रति कृतज्ञ रहना।

इतनी छोटी-सी उम्र में पानी और बिजली बचाने के लिए, अपने आस-पास को साफ़-सुथरा रखने के लिए, पेड़-पौधों-फूलों-वनस्पतियों-नदियों के लिए तुम्हें सचेत और सचेष्ट देखता हूँ तो हृदय गदगद और मस्तक ऊँचा हो उठता है।

पर अभी तो मेरा मजबूत आश्रय और निकट मार्गदर्शन तुम्हें प्राप्त है, पर जिस दिन तुम उच्च शिक्षा ग्रहण करने उन आधुनिक पढ़े-लिखों के प्रगतिवादी संसार में कदम रखोगी,उस दिन के विचार-व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को लेकर मैं आशंकित हूँ।

मुझे डर है कि जिस देश में अपने देश, संस्कृति व संस्कारों को गाली देना आधुनिकता व प्रगतिशीलता का पर्याय मान लिया गया हो, जहाँ धर्मनिरपेक्षता मतलब अपने धर्म को बुरा-भला कहना हो, जहाँ वैज्ञानिकता का अभिप्राय अपने विश्वासों का गला घोंटना हो, वहाँ मेरे दिए संस्कार कहीं तुम्हारी प्रगति की बेड़ियाँ न बन जाएँ!

हाँ, जब मैं ‘कन्हैया’ और ‘उमर’ जैसों के समर्थन में ‘आई लव यू’ की तख्तियाँ उठाए लड़कियों को देखता हूँ तो मुझे डर लगता है। मुझे डर लगता है जब मैं अपने से दुगुनी उम्र के प्रधानमंत्री का उपहास उड़ाने पर, सस्ती और छिछोरी बातों व भाव-भंगिमाओं पर मुस्कुराहट वारतीं, निहाल होतीं लड़कियों को देखता हूँ; हाँ, मैं चिंतित और व्यग्र हो उठता हूँ जब मैं अपने घर से मीलों दूर पढ़ने गए लड़के-लड़कियों को देशद्रोही नारों में अपनी आवाज़ बुलंद करते देखता हूँ।

मैं जानता हूँ कि कल की सुनहरी इबारत आज दिए जा रहे संस्कारों से लिखी-गढ़ी जाती है और इसलिए मैं कुछ हद तक आश्वस्त भी हूँ। परंतु सवाल यह उठता है कि क्या इनके माता-पिता ने इन्हें ऐसे संस्कार दिए होंगे, मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ, नहीं, कदापि नहीं। यह कुसंगति का प्रभाव है या शुगरकोटेड ब्रेन वाश या मानसिक दिवालियापन।

अतः मेरी उन सभी अभिभावकों के प्रति पूरी सहानुभूति है, जिनके बच्चे किसी नकली क्रांति के मायाजाल में फंस अपने और माता-पिता के सपनों का गला घोंट आए या रोज थोड़ा-थोड़ा घोंट रहे हैं!
– तुम्हारा पिता
(प्रणय कुमार)

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