भारतीय मीडिया के अनजाने रहस्य -1

मुझे तक़रीबन तीन दशक हो गए भारत के विभिन्न हिस्सों में मीडिया में अपनी सेवाएं देते हुए। इस समूचे कार्यकाल में मैंने पाया कि भारत का समस्त मीडिया येन-केन-प्रकारेण हिन्दू विद्वेषी सिद्ध होता है। इसके पीछे किसी अख़बार में काम कर रहे किसी जर्नलिस्ट का कोई ख़ास नज़रिया हो, ऐसा भी नहीं है। इसका एकमात्र कारण है भय।

अबे, यह क्या लिख दिया? अभी वे तलवारें लेकर आ जाएंगे? तब कौन बचाएगा हमें?

अरे, यार ! तुम पत्रकार हो या कुछ और? यह क्या लिख दिया? ऐसे लिखा जाता है क्या?

श्रीमान, आपने ट्रेनिंग कहां से ली है? ख़बर में इस तरह हिन्दू-मुस्लिम लिखते हैं क्या?

ओह, आप तो महान पत्रकार हैं। आपने तो पराड़कर जी को भी फेल कर दिया? अब भी अंग्रेज़ों का राज समझ रखा है क्या?

ये हैं वे कुछ जुमले, जो उन झिड़कियों में से कुछ प्रमुख हैं, जो मैंने विभिन्न अख़बारों के सम्पादकों के श्रीमुख से सुने।

ऐसा क्यों होता है? इसका एकमात्र कारण यह है कि हिन्दू समाज उदार है। उसे कोई मतलब नहीं कि उसके बारे में क्या छप रहा है। दरअसल वह ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का मारा है। उसके पास न तो कोई ईशनिंदा क़ानून है, न मुर्तद घोषित करने की कोई ईश्वरीय आज्ञा और न ‘तनखैया’ यानी धर्म बहिष्कृत करने का कोई प्रावधान।

इसीलिए आप मंदिर जाते हैं, तो हिन्दू। नहीं जाते, तो भी हिन्दू। ईश्वर को अपशब्द कहते हैं, तो भी हिन्दू और नकारते हैं, तो भी हिन्दू। आपके देवी-देवताओं के नग्न चित्र बनते हैं, तो उन्हें ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर डिफेंड करने वाले ढेर सारे हिन्दू मौजूद हैं।

आप करोड़ों हिन्दुओं की आराध्य दुर्गा को एक गलीज़ उपाधि से कलंकित कर चैन का जीवन जी सकते हैं। त्यौहार आपका है, लेकिन आपको ध्यान रखना है कि अल्पसंख्यकों की भावनाएं आहत नहीं हों, इसके बरक्स आपकी कोई भावना है, तो उसे ताले में बंद कर रखें। यह नहीं करेंगे, तो आपको जो सुरक्षा बल दौड़ा-दौड़ा कर अधमरा कर देगा, वह कौन है? कभी विचार किया? उसमें नब्बे फ़ीसदी आपके बीच के यानी हिन्दू कर्मचारी हैं। असंख्य उदहारण हैं, क्या-क्या गिनाया जाए?

दो उदाहरण देता हूं। किसी हिन्दू तीर्थस्थल से दस किलोमीटर दूर भी कोई कुकर्म होता है, तो मीडिया आपको पढ़ाता-दिखाता है – फ़लाने मंदिर के पास कुकर्म। लेकिन ठीक ऎसी ही वारदात अगर किसी अन्य रिलीजन के केंद्र पर होती है, तो आपको बताया जाता है – एक धार्मिक स्थल पर कुकर्म।

जयपुर में एक फ़ादर पकड़े गए। वे अपने चर्च द्वारा चलाए जा रहे अनाथालय की बच्चियों का बरसों से यौन शोषण कर रहे थे। राजस्थान भर के सारे अखबार एक धर्मगुरु छापते-दिखाते रहे। किन्तु इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मज़बूरी है। इस तथाकथित धार्मिक स्थल के चित्र दिखाए, तो सब को समझ आना ही था।

जयपुर के ही सांगानेर इलाके में एक मौलवी साहब मदरसे की छत पर एक अल्पवयस्क बच्ची को ले गए और उसकी देह से अनाचार की कोशिश करते पड़ौसियों द्वारा रंगे-हाथ पकड़ लिए गए। पुलिस में केस दर्ज़ होने और गिरफ़्तार कर लिए जाने के बावजूद मीडिया में वे ‘धर्म गुरु’ थे और यह मदरसा ‘धर्मस्थल’।

अब आप विचार करें कि ऐसा क्यों है? यह न तो कोई विचारधारा का परिणाम है, न किसी क़ानून का भय। असल में यह हमले का भय है। संगठित शक्ति, एकजुटता का भय।

लगभग तीन दशक पहले राजस्थान के नंबर एक अखबार के दफ्तर पर हमला हुआ। तलवारें, हॉकी, चैन और लाठियां लिए हमलावर आए और उन्होंने जो मिला, उसे ठोका। उसके खेल संवाददाता अब्दुल ग़नी एक मेज के नीचे छुप गए थे, लेकिन बच नहीं सके। उन्हें वहां से निकाल कर पीटा गया। कमाल की बात यह है कि दोष अब्दुल ग़नी का कतई नहीं था, क्योंकि ख़बर उनकी नहीं थी। उनका दोष सिर्फ़ यह था कि उन्होंने साम्प्रदायिक (मज़हबी) हित का ध्यान नहीं रखा था।

एक ऎसी ही दूसरी घटना एक कार्टून के प्रकाशन पर हुई। समाज का एक वर्ग लाठी-डंडे लेकर अख़बार के दफ़्तर पर हमलावर हो गया। जो मिले पीटे गए, जिनसे मित्रता थी; उन्हें कुछ गालियों का प्रसाद दिया गया और भविष्य में कर्तव्य ढंग से निभाने की नसीहत के साथ मार-पीट से बख़्श दिया गया। अगले दिन अख़बार ने कार्टूनिस्ट को प्रताड़ित करने और कई बरस तक पदोन्नति नहीं देने की घोषणा करते हुए माफ़ीनामा छापा, तो मामला शांत हुआ।

ऎसी अनेकानेक घटनाओं का मैं गवाह हूं, जो साबित करती हैं कि भीड़तंत्र का भय मीडिया को प्रभावित करता है और इसमें हिन्दू समाज उदार है, तो वह हमेशा घाटे में रहता है।

तब और अब : बदल चुका है बहस का मुद्दा और देश की दिशा भी!

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