आखिर सोनिया और उनके परिवार के समक्ष साष्टांग दंडवत क्यों करते हैं पत्रकार!

पिछले महीने रिलीज़ हुई अपनी पुस्तक में पत्रकार करण थापर लिखते हैं कि लंदन में पढ़ने और नौकरी करने के बाद वे 1989 में दिल्ली घूमने आये थे। कुछ महीने पहले ही थापर की पत्नी की कैंसर से मृत्यु हो गयी थी।

एक भेंट में राजीव (गाँधी) – थापर की तत्कालीन प्रधानमंत्री और उनके परिवार से घनिष्ठता थी और वे उन्हें राजीव ही बुलाते थे – ने उनसे पूछा कि तुम अब क्या करोगे? तुम्हे भारत में काम-काज का कोई अनुभव तो नहीं है। ऐसा क्यों नहीं करते कि थोड़े समय के लिए कुछ ‘ट्राई’ कर लो जिससे तुम्हे निर्णय लेने में आसानी हो जायेगी।

थापर लिखते है कि राजीव ने इस बारे में पहले से ही सोचा हुआ था। उन्होंने सुझाव दिया कि थापर कुछ समय के लिए दूरदर्शन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में काम कर ले। अगर उन्हें अच्छा लगता है तो थापर भारत में सैटल हो सकते हैं। थापर को राजीव का यह सुझाव उचित लगा और उन्होंने तुरंत सहमति जता दी।

कुछ समय दूरदर्शन में काम करने के बाद थापर ने राजीव से कहा कि उन्हें कुछ ठोस कार्य करना होगा जिससे कि वह भारत में सैटल होने का निर्णय ले सकें। राजीव ने पहले से ही इसकी तैयारी की हुई थी।

राजीव ने पूछा कि क्या तुम वीडियो मैगज़ीन का कार्य करना चाहोगे। राजीव उस समय हिंदुस्तान टाइम्स की संपादकीय निदेशिका शोभना भरतिया के साथ संपर्क में थे। उन्होंने शोभना को एक वीडियो न्यूज़ मैगजीन चलाने का सुझाव दिया था जिसे शोभना ने स्वीकार कर लिया था।

राजीव ने शोभना को कहा कि आप थापर को इस मैगजीन को चलाने का कार्य सौंप दें। और इस प्रकार से थापर उस समय की न्यूज़ मैगजीन ‘आई विटनेस’ के साथ जुड़ गए। बाद में वह न्यूज़ मैगज़ीन दूरदर्शन ने ले ली (जिसके लिए थापर को हर सप्ताह मोटा पैसा मिलता था)।

यह तो थापर ने स्वयं स्वीकार किया है।

NDTV न्यूज़ चैनल का उद्घाटन प्रधानमंत्री निवास से गुजराल ने किया था। मैं उस कार्यक्रम में स्वयं उपस्थित था।

बहुत सी कहानियां है कि कैसे NDTV को सरकारी सहायता नियमों को तोड़-मरोड़ कर मिली। लेकिन उस कहानी को किसी अंदर वाले को ही बाहर लाना होगा।

क्या आपको लगता है कि ऐसा कोई पत्रकार या चैनल जिसका करियर ही भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के वरदहस्त से शुरू हुआ, उसमें सोनिया और उनके परिवार से कठिन प्रश्न पूछने की हिम्मत है?

अभिव्यक्ति की आज़ादी सिर्फ आपकी नहीं, सबसे पहले है यह आम आदमी का हक़

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