तब और अब : बदल चुका है बहस का मुद्दा और देश की दिशा भी!

वो भी एक समय था जब देश के कई हिस्सों में एक के बाद एक बम धमाके होते थे, बिना दिवाली के दिवाली मनती थी।

बड़ी हैरानी हुई थी जब 2006 में आतंकियों ने बनारस में संकट मोचन मंदिर, रेलवे स्टेशन व घाट पर सीरियल बम ब्लास्ट किए थे।

ये क्षेत्र कोई सीमांत क्षेत्र नहीं था, हमेशा शांत रहता था, आतंकी इतने अंदर घुसे थे तो इसका मतलब है, इन्हें अंदर घुसने में किसी ने मदद की थी।

उन दिनों व्यक्ति सुरक्षा को लेकर चिंतित था।

मुंबई में 2008 में 26/11 के आतंकी हमले के बाद तो देश में सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से लोगों का विश्वास ही उठ गया था।

2011 में मुंबई में सीरियल ब्लास्ट के बाद राहुल ग़ाँधी का बयान आया था कि देश में ऐसी आतंकी घटनाएँ होती रहेंगी, हम सारी घटनाएँ नहीं रोक सकते।

ये तो कुछ मुख्य धमाके हैं, लिस्ट बहुत लम्बी है!

वो भी दिन थे जब आतंकियों को भटका हुआ नौजवान कहकर सरकार उन्हें टैक्सपेयर के धन से सरकारी मदद मुहैया कराती थी।

उन दिनों बहस का विषय ये नहीं था कि भारत स्वच्छ कैसे हो? भारत में किसानों की आय कैसे दोगुनी हो? या 24 घंटा बिजली कैसे मिले? ग़रीब महिलाओं को LPG मिले? युवाओं को रोज़गार कैसे मिले? मुद्रा योजना, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया, जनधन खाते आदि ये मुद्दे नहीं थे।

उन दिनों तो एक तरफ़ भ्रष्टाचार व घोटालों की ख़बरें आती थीं, वहीं दूसरी ओर बम ब्लास्ट की ख़बरें आती थीं।

पिछले चार-साढ़े चार वर्षों के मोदी सरकार के कार्यकाल में देश का स्तर ऊपर गया है जहाँ भ्रष्टाचार व असुरक्षा से बाहर निकलकर सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्यों में उसने कितना पाया या नहीं पाया, इसपर बहस हो रही है। कई लक्ष्य समय से हासिल हुए, कई हासिल नहीं हो सके।

लेकिन देखने की बात ये है कि बहस का मुद्दा बदल चुका है और देश की दिशा भी! पहले जहाँ आप गर्त में जा रहे थे, अब ऊपर जा रहे हो!

पहले कितने गर्त में गए, इस पर बहस होती थी, अब कितने ऊपर गए, कम गए, ज़्यादा गए, इस पर बहस हो रही है!

पहले आतंकी हमलों में कितने आम नागरिक मरे इस पर बहस होती थी, अब आतंकियों व पत्थरबाजों को AK47 से मारें या पेलेट गन से मारें, इस पर बहस हो रही है!

ये है वो परिवर्तन, ये परिवर्तन अनुभव करना होगा! जिन्हें अनुभव नहीं हो रहा है उन्हें भी अनुभव करना होगा क्योंकि 2019 का एग्ज़ाम आने को है, लोकतंत्र का इम्तहान! इस एग्ज़ाम में राजनैतिक पार्टी पास-फ़ेल नहीं होती, इसमें जनता पास-फ़ेल होती है!

एग्ज़ाम में एक साल भी नहीं बचा, इसीलिए रिवीज़न आरम्भ कीजिए, बिना रिवीज़न एग्ज़ाम पास नहीं कर सकते! छिछोरों की कुसंगति से दूर रहिए। याददाश्त दुरुस्त रखिए, योग व्यायाम कीजिए, अध्ययन कीजिए, मनन चिंतन कीजिए, सत्य देखिए, सत्य ही बोलिए, क्योंकि लोकतंत्र का इम्तहान आ रहा है!

बोली… बहत्तर छेद वाली छलनी भी बोली

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