क्या हम बच पाएंगे?

अमेरिका में एक मित्र है। कुछ वर्ष पूर्व, बातचीत के दौरान कह रहा था कि अमेरिका के सुरक्षा तंत्र इतने चौकन्ने हैं कि अगर तुम मेरे साथ हमारी बातचीत या मेल में दो बार से अधिक अमेरिकी राष्ट्रपति का नाम भी लेते हो तो सेंडर (भेजने वाले) के नाम के साथ रेड फ्लैग जुड़ जाएगा।

मैंने तब तो कुछ नहीं कहा था, मगर बाद में जरूर सोचा कि फिर भी अमेरिका में ट्विन टावर पर 9/11 हो गया था।

नहीं नहीं… यह पूरा सच नहीं है। कहते हैं कि यह अमेरिका ने खुद करवाया था। अब यह अफवाह है या कुछ और, मगर इसे सिरे से नहीं नकारा जा सकता।

मगर कोई अपने घर में ही आग क्यों लगवायेगा? कोई भी पूछ सकता है। लेकिन जो पूछ रहा है वो सरल और भोला इंसान होगा। क्यों, इतिहास पढ़ते नहीं क्या, षड्यंत्र रचने वाले क्या कुछ नहीं करते आये हैं।

इसे जानने और समझने के लिए, देखते हैं कि 9/11 के बाद क्या क्या हुआ…

सर्वप्रथम ईसाई प्रभुत्व वाला अमेरिका विश्वस्तर पर आम जन के बीच इस्लाम के साथ आतंक को जोड़ने में बहुत हद सफल हुआ। और फिर अमेरिका को मानो पश्चिम एशिया में तबाही मचाने का लाइसेंस मिल गया हो। ना जाने कितने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग और उपयोग हुआ होगा।

लेकिन क्या हमने यह सोचा है कि जिनके खिलाफ इन बम-गोलों का इस्तेमाल हुआ उनके पास भी अमेरिका के ही शस्त्र थे। अर्थात चोर और सिपाही दोनों के पास पिस्तौल एक ही दुकान से आयी थी। तो फिर असल फायदे में कौन रहा? दुकानदार।

बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती, बाद में ओसामा बिन लादेन को मारने के नाम पर वो तबाही मचाई गई कि सोच कर रूह काँप जाये। लेकिन इसके लिए विश्वस्तर पर वो प्रतिक्रिया नहीं हुई जो अमेरिका के वियतनाम पर हमले को लेकर हुई थी।

हो भी नहीं सकती थी, उलटे विश्वजन के लिए यह एक राहतभरी खुशी की खबर बनी। क्यों, क्योंकि परसेप्शन पहले ही गढ़ दिया गया था। तो क्या अमेरिका ने वियतनाम से यही सीखा था? शायद।

उपरोक्त ‘शायद’ को पक्का करने के लिए इतिहास में थोड़ा पीछे चलते हैं…

क्या आप जानते हैं कि रोमन साम्राज्य के पतन के बाद के इतिहास में एक डार्क ऐज अर्थात अधंकार युग भी है। यह कालखंड काला इसलिए नहीं है कि इसके बारे में लोगों को पता नहीं, जैसा कि कुछ बिके हुए बुद्धिजीवी बतलाते हैं, बल्कि यह मानवता का काला अध्याय था।

विस्तार में ना जाते हुए, उस समय ईसाइयत के नाम पर जो अमानवीयता की गई आज उसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जो काम इस्लाम ने हिन्दुस्तान में किया, उससे भी बुरा हाल ईसाइयत ने यूरेशिया में किया।

पुस्तकालय जला दिए गए थे, बुद्धिजीवियों को मार दिया गया या वे पलायन कर गए। प्राचीन परम्परा, संस्कृति और कला को नष्ट कर दिया गया। आमजन को चर्च का अन्धविश्वास मानना ही एक मात्र रास्ता था। सत्ता ने ईसाइयत अपना ली थी और मज़हब के नाम की अराजकता अपने चरम पर थी।

अर्थात इस्लाम ने जो अपने जन्म के बाद किया वो ईसाइयत पहले कर चुका था। तो क्या ईसाइयत ने इस्लाम के कारण अपने में सुधार किया? नहीं… उसने चोला बदला, उद्देश्य और लक्ष्य नहीं। रास्ते बदले, तरीके नए हुए, मगर मंजिल वही रही। इस्लाम नया नया कट्टर हुआ तो ईसाइयत ने धूर्तता का रास्ता अपना लिया था।

याद कीजिए मुग़लों ने हमें तलवार से नष्ट किया लेकिन हमारी जड़ों को नहीं छेड़ पाए थे इसलिए शाखाओं और डालियों को ही काट पाए, जबकि अंग्रेज़ों ने हमारी संस्कृति इतिहास और धर्म पर प्रहार करके हमें जड़विहीन कर दिया और हम खोखले हो गए।

स्वतंत्रता दिवस नजदीक है, अतः पाकिस्तान के निर्माण से इसे और अच्छे से समझा जा सकता है…

कहा जाता है कि अंग्रेज़ों को जाते जाते कोई और समाधान नजर नहीं आया तो उन्होंने बंटवारा कर दिया। उन्होंने कहा, और हमने मान लिया? नहीं, हमने कहाँ माना था, हमसे तो पूछा ही नहीं गया था। मानने वाले दोनों, जिन्ना और नेहरु किसके प्रभाव में थे दुनिया जानती है, दोनों काले अंग्रेज़ थे।

इसलिए यह कहना कि अंग्रेज़ों को हमारी चिंता थी, ये मानवता के नाम का एक ढकोसला है। हमारा जो कुछ होना था, होता, हो सकता है हम बर्बाद हो जाते। मगर हमारे बर्बाद होने से बचाने में उन्हें इतनी हमदर्दी क्यों हो रही थी कि जाते जाते दो देश बना गए।

ध्यान दें, दो पड़ोसी देश। अर्थात दुश्मनी को उन्होंने इस तरह से स्थाई रूप से स्थापित कर दिया कि गोरों की दुकान अब तक चल रही है। वो अपने मकसद में हर तरह से कामयाब हुए। इन गोरों ने दुनिया पर इसी तरह राज किया और अब भी कर रहे हैं।

कभी मुस्लिम भाइयों ने सोचा कि उन्हें क्या मिला? वे सोचते हैं कि उन्हें मज़हब के नाम पर एक देश मिला। मगर क्या उन्होंने कभी इस तरह से सोचा कि जो भूमि (पाकिस्तान) आर्यों के स्वर्ग का हिस्सा थी, वो अब नरक से भी बदतर है।

मैं यहां पाकिस्तान की आम जनता की बात कर रहा हूँ, उनके शासक वर्ग से जुड़े परिवार की नहीं।

तो क्या मुस्लिम दोषमुक्त हुए? नहीं। वे चाहकर भी नहीं हो सकते। और फिर यह इसलिए संभव नहीं क्योंकि कट्टरता उनके मूल तत्वों में है। वहाँ तो सोचने की आज़ादी भी नहीं। मगर इस पर विस्तृत विश्लेषण लेख का उद्देश्य नहीं।

हाँ, यह सत्य है कि इस कट्टरता का खामियाजा वे स्वयं, अर्थात मुस्लिम ही अधिक उठा रहे हैं। मगर वे इससे बाहर निकल नहीं पा रहे बल्कि उलझते ही जा रहे हैं।

इन सब के बीच, कोई आतंकवादी अगर यह कहता है कि उसका युद्ध अमेरिका के खिलाफ है तो वो सच बोलता है, मगर वो सच आधा ही है। क्योंकि उसे कोई यह नहीं समझाता कि आप अपने को इस्तेमाल होने क्यों दे रहे हो? ऐसा होने पर इसमें आप का ही कसूर है।

यह तो एक तरह से कुछ कुछ वही हुआ कि किसी अपराधी प्रवृत्ति वाले को कोई बड़ा सफेदपोश डॉन परदे के पीछे से इस्तेमाल करे। ऐसे में भी दोनों अपने गुनाहों से माफ़ नहीं किये जा सकते। इस पर लंबा लिखा जा सकता है मगर यह विषयांतर होगा।

इसे अब आज के हिन्दुस्तान के संदर्भ में देखते हैं…

अगर उपरोक्त दोनों (ईसाइयत एयर इस्लाम) के बीच आपस में गैंगवार हो जाए तब? हो जाए नहीं, गैंगवार चल रही है, जिसके परिणामस्वरूप पूरा पश्चिम एशिया तबाह है। इससे पूरा विश्व प्रभावित है। हिन्दुस्तान में तो ये दोनों आमने सामने हैं।

इसलिए अगर मैं कभी यह कहता हूँ कि भारत की भूमि पर तीसरा विश्वयुद्ध लड़ा जा रहा है तो इसका संदर्भ यही है। दिक्कत यह है कि दोनों आपस में ना लड़ते हुए अपनी शक्ति का प्रदर्शन हम पर कर रहे हैं।

अर्थात हम दो-दो से लड़ रहे हैं, एक सामने है और एक पीछे। अगर हम पीछे मुड़ते हैं तो सामने वाला अपनी तलवार से हमे काटने में दो मिनट नहीं लगाएगा और अगर हम सामने वाले से ही लड़ते रहते हैं तो पीछे वाला हमारे पांव के नीचे की ज़मीन ही खोखली करता जा रहा है। अर्थात आगे खाई और पीछे दलदल।

क्या आप जानते हैं कि जितने भी मानवतावादी गैंग है उनमें से अधिकांश अमेरिका के टुकड़े पर पलने वाले शूटर हैं। क्या कभी आप ने सोचा है कि ये हमेशा मुस्लिम के समर्थन में ही क्यों रहते हैं? उन्ही के पक्ष में क्यों बोलते हैं?

अमेरिका चाहता हैं कि हमारा सारा ध्यान इस्लाम पर ही केंद्रित रहे और वे पीछे से अपनी दुकान चलाता रहे। ऐसे में बदनामी भी नहीं होती और ऊर्जा भी कम खर्च होती है, पैसा भी क़म लगता है।

और फिर एक सेना जो किसी और से लड़कर थक जाए तो उसे अंत में हरा कर उस पर कब्ज़ा करना आसान होता है। कमज़ोर शेर और भ्रमित हाथी का शिकार आसान होता है।

इस युद्ध में एक तीसरे पक्ष ने आकर इसे और जटिल कर दिया है, उलझा दिया है। चीन, पाकिस्तान के रास्ते पूरा सक्रिय है। जिस तरह से अमेरिका, इंग्लैंड का एडवांस्ड वर्ज़न है वैसे ही चीन वामपंथ के नाम पर रूस का एडवांस्ड वर्ज़न है।

यहां वामपंथ को मैं एक संप्रदाय के रूप में ही मानता हूँ और इसने समाजवाद का चोला ओढ़ा हुआ है, ठीक उसी तरह, जिस तरह से ईसाइयत ने पूंजीवाद का रूप धर लिया है। बस एक इस्लाम ही है जो अपने असली रूप में ही दुनिया के सामने पेश आता है। मगर अब भी मुख्य मुकाबला पहले दोनों के बीच ही है, वामपंथ तो दोनों के लिए काम करने को तैयार रहता है।

उपरोक्त दोनों प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों ने भारत में जो अपने अपने सैनिक उतारे हुए हैं, वे सब कहीं बाहर से नहीं आये। सब यहीं के हैं। धर्म परिवर्तन का काम किया ही इसलिए जाता है क्योंकि फिर वो आप का पक्का सिपाही हो जाता है। वो भी मुफ्त में। आस्था के नाम पर उससे कुछ भी करवाया जा सकता है। और वही करवाया जा भी रहा है।

यह आधुनिक युग का वॉर ज़रूर है मगर इसमें मज़हब की वही पुरानी भूमिका है। एक और रणनीति है जिसमें स्थानीय जनता में से ही कुछ एक को खरीद लिया जाता है जो अपनी ही सत्ता के खिलाफ फिर विद्रोह करती है।

यह कोई पहली बार नहीं हो रहा…

यह सफल प्रयोग अनेक देशों में किया जा चुका है। आखिरकार, असहिष्णु गैंग हो या टुकड़े टुकड़े नारा लगाने वाला गिरोह, इनको फंडिंग कहाँ से होती है? अरुंधती रॉय आदि को ही अवार्ड क्यों मिलता है? वो कश्मीर में ही क्यों जाती हैं? वो जो भी कहे मीडिया में क्यों छपता है? ये घर में हलचल मचाने का काम है जिसके पैसे मिलते हैं।

मुस्लिमो ने कश्मीर खाली करवाया मज़हब के नाम पर, मगर पाकिस्तान कश्मीर के नाम पर हथियार खरीद रहा है। कहाँ से? अमेरिका से। कश्मीर की समस्या खत्म हो जाए तो कइयों की दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए कश्मीर समस्या को ज़िंदा रखा जाएगा, जब तक कोई नई समस्या हाथ नहीं लग जाती।

जैसे ही कश्मीर की तरह कोई और भारत का भूखंड अस्थिर होगा तो इनकी दुकान और अधिक चलेगी। बस इसी का प्रयास जारी है। मगर इस तरह से अस्थिर किये जा रहे भूखंड का आमजन कश्मीर से सबक क्यों नहीं लेता, वो यह क्यों नहीं देख पाता कि इससे आमजन को नुकसान ही होता है।

असल में उसे देखने ही नहीं दिया जाता। उसे मज़हब का चश्मा पहना दिया गया है। उसे सब हरा हरा ही नज़र आता है। कोई आम मुस्लिम किसी आतंकवादी से यह क्यों नहीं पूछता कि उसे ऐसा करने का क्या फायदा हो रहा है? और अगर कोई ज्यादा पूछे इससे पहले ही उसे जन्नत की हूरों की बात ऐसे घोट कर पिलाई जाती है कि वो मरने के लिए तैयार हो जाता है।

फिर वे हमारा शोषण नहीं कर पाएंगे…

पश्चिम एशिया से चली आग पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर होते हुए पूरे भारत में फ़ैल चुकी है। और कई दुकानदार लार टपका रहे हैं। अर्थात संक्षिप्त में इस भूभाग की स्थिति गंभीर है। मगर हमें समझने नहीं दिया जा रहा। हमें वही पढ़ाया जाता है जो हमें नहीं पढ़ना चाहिए और वो बिलकुल नहीं पढ़ने दिया जाता जिसे हमें पढ़ना चाहिए।

क्यों? क्योंकि इससे हम बौद्धिक रूप से समृद्ध होंगे और फिर वे हमारा शोषण नहीं कर पाएंगे। हम अपना सच जान कर एकजुट हो जाएंगे। जो बड़ी मुश्किल से अलग हुए हैं। पहले आर्य बाहरी बताये, फिर आर्य-द्रविड़ अलग किया, अब दलित-दलित का शोर।

ऐसे अनेक प्रसंग गढ़े गए, इसके लिए पूर्वनियोजित रूप से रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब आदि को स्थापित किया गया था। और फिर यह भी प्रचारित कर दिया गया कि जो भी इनका लिखा बदलने का प्रयास करे तो उसे भगवाकरण माना जाए।

कोई यह क्यों नहीं पूछता कि भगवा ने इतिहास में कभी भी आतंक फैलाया? नहीं… उलटे जब आर्यों का युग था वे जहां जहां भी गए वहाँ वहां मानव संस्कृति का प्रचार किया। किसी भी भूमि पर कब्जा नहीं किया।

आज यूरोप जिन ग्रीक चिंतकों से प्रभावित हैं वे सब सनातन जीवन दर्शन के ही लाभार्थी रहे हैं। विश्व में शांति के प्रतीक बुद्ध भी सनातन की ही देन हैं। जैन विचारधारा यहीं से निकली। फिर क्या कारण हुआ कि हमें उसी वेद उपनिषद को पढ़ने नहीं दिया जाता।

और अगर हिन्दुस्तानियों का आग्रह बहुत ज़ोर मार रहा हो तो पटनायक आदि जैसे छद्म माइथोलॉजी के विशेषज्ञ पैदा किये जाते हैं जो अधूरा ज्ञान बता कर आप की प्यास का धंधा भी कर लेते हैं और आप तृप्त भी नहीं हो पाते। ऐसे ऐसे संत-बाबा प्लांट किये गए कि उनकी बातों को सुनकर कोई भी हैरान हो जाये। मगर वो खूब मीडिया में दिखते हैं। दिखते नहीं दिखाए जाते हैं। जिससे आप का सनातन के प्रति मोह भंग रहे।

इस तरह से इन तीनों विश्व शक्तियों का खेल जारी है, इनकी धूर्तता की कोई सीमा नहीं। और फिर भी अगर कोई ज्यादा हिन्दू और हिंदुत्व की, सच्ची मानवता की बात करे तो उसे फंसाने के लिए भी पूरी मशीनरी तैयार है।

इन सब के बीच आम जन को जो दिख रहा है वो सच नहीं, जो सच है उसे भ्रमित करने के लिए पूरी पेड टीम बैठी है मीडिया में, सिनेमा में, साहित्य में, यहां तक कि सत्ता के अनेक संस्थानों में भी।

सनातनियों की ये अग्निपरीक्षा है। इस से पूर्व ऐसी विषम परिस्थिति कभी नहीं हुई। पहले कभी चाणक्य ने राह दिखाई थी तो कभी तुलसी भक्तिमार्ग पर खड़े नज़र आते थे, फिर विवेकानंद और दयानन्द ने मार्ग सुझाया था। अब यह सिलसिला भी रुक सा गया है। या कहें रोक दिया गया।

सनातन धर्म के क्षेत्र को इतना उलझा दिया गया है कि इसमें से कोई निकल ही नहीं सकता। ऊपर से इसमें जो मर्जी हस्तक्षेप करता रहता है। पहली बार सोशल मीडिया, जो है तो पश्चिम की देन, उसे हिन्दुओं ने उपयोग करना सीखा। आम जन का आक्रोश वहाँ फूटने लगा।

मगर फिर यहां भी खेल बिगाड़ने के लिए पेड सैनिक तैयार कर दिए गए हैं। जिन्हे आम फेसबुकिया समझ नहीं पा रहा। वो हर वक्त घट रही क्रियाओं पर अपनी त्वरित प्रतिक्रिया दे रहा हैं। उससे यह अपेक्षा करना उसके साथ ज्यादती होगी कि हर क्रिया और प्रतिक्रिया के पीछे के खेल को समझे। यह असम्भव नहीं, मगर आसान भी नहीं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हम बच पाएंगे?

एक पौराणिक कहानी याद आती है भस्मासुर की। भस्मासुर का अंत तो होना ही है, मगर पहले कौन सा भस्म होगा यह अभी कहना कठिन है। इस पर कोई पूछ सकता है कि ईश्वर सुन्दर नर्तकी के रूप में अवतार कब लेंगे?

पूछने वाले को शायद यह नहीं पता कि हर कण में ब्रह्म है, हर जीव में शिव है, हर सनातनी विष्णु का अवतार है। बस सनातन के योद्धाओं को किसी भी कीमत पर श्रीकृष्ण के कर्म मार्ग को छोड़ना नहीं है ना ही श्रीराम के आदर्श को।

जो हम इस मार्ग पर चल पड़े तो अंत में लंका दहन सुनिश्चित है। रामराज्य की स्थापना हो कर रहेगी। एक बार फिर ये देवभूमि विश्व को मानवता का मार्ग दिखाएगी और धर्म का भगवा ध्वज लहराएगा।

क्या हिन्दू बच पाएंगे? लगता तो नहीं…

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