जीवन-मुक्ति : ज्योतिष शास्त्र और स्वप्न जगत के संदेशों का रहस्य

ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह राठौड़ से मेरा परिचय बहुत योजनाबद्ध तरीके से हुआ है, जिसके बाद हमारी मुलाकात होना तय थी, सो हुई। हालांकि हमारे स्वभाव और ज्ञान में धरती आकाश का अंतर है। वे ज्योतिष के इतने बड़े ज्ञाता हैं कि वे हर घटना का सटीक ज्योतिषीय आंकड़ा दे कर अस्तित्व की इतनी चमत्कारी व्यवस्था के प्रति नत मस्तक होते रहते हैं। और मैं ऐसी हर घटना के पीछे का गणित न खोजते हुए बस आँखों के सामने चल रहे चमत्कार पर अभिभूत होकर अस्तित्व के प्रति कृतज्ञता से भरी रहती हूँ।

जिस घटना को वे शास्त्र के रूप में उदाहरणों से प्रतिपादित कर सकते हैं, उसे मैं महामाया की माया कहकर उसमें उलझने का आनंद लेती हूँ। हम दोनों की यात्रा की दिशा और भाव लगभग एक ही है, बस रास्ते अलग हैं।

ध्यान बाबा ने मुझे अपने आध्यात्मिक ज्ञान के बल पर बहुत पहले ही बता दिया था कि यह आपका अंतिम जन्म है और आप इसी जन्म में मोक्ष को प्राप्त होंगी, उसी बात की पुष्टि करते हुए हमारी मुलाकात पर मेरी कुण्डली के आधार पर राहुल सिंह ने बताया था कि चूंकि यह आपका अंतिम जन्म है इसलिए आपके जीवन में भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर पर बहुत सारी घटनाएं और परिवर्तन बहुत जल्दी जल्दी होंगे।

और इस बात की मैं साक्षात गवाह हूँ क्योंकि पिछले एक डेढ़ वर्ष में बहुत तेज़ गति से मुझ पर से घटनाएं गुज़र रही हैं, और स्वप्न में मुझ पर प्रयोग हो रहे हैं, आगे का रास्ता मुझे प्राय: इन स्वप्न संकेतों से ही मिलता है।

यह संकेत मात्र आध्यात्मिक यात्रा के लिए ही नहीं होते, छोटे से छोटे सांसारिक कार्यों के लिए भी यह संकेत मिलते रहते हैं, बस हमें अपनी दृष्टि बहुत सूक्ष्म और हृदय अत्यंत विशाल रखना होता है। एक छोटी सी शंका भी आपको इस चमत्कारी जगत से बाहर धकेल सकती है। ऐसे में आपकी ध्यान साधना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

गीताप्रेस गोरखपुर के वार्षिक अंक ज्योतिषतत्त्वांक से शकुन शास्त्र पर कुछ लेख प्रकाशित कर इन संकेतों पर के बारे में मैंने विस्तृत से बताया है।

जैसे मेरे साथ यह हमेशा होता है कि यदि सोशल मीडिया पर मुझे कोई तस्वीर बहुत प्रभावित करती है तो मैं प्रतीक्षा करती हूँ कि तस्वीर मिली है तो इस पर आधारित लेख भी मुझ तक पहुंचता ही होगा, या कोई लेख मिला है तो प्रतीक्षा रहती है कि इसके लिए उचित चित्र मेरे पास आता ही होगा।

और वह मुझे मिलता भी है, यहाँ बहुत सारी चीज़ें काम करती हैं जिसमें अस्तित्व का आकर्षण का नियम भी सम्मिलित है। तो चाहे ज्योतिष शास्त्र हो, शकुन शास्त्र हो, अस्तित्व का आकर्षण का नियम हो या चाहे क्वांटम भौतिकी के सूत्र हो, आपके आँखों के सामने हो रहे चमत्कारों के पीछे इन सब का मिला जुला रूप होता है।

जैसे दो दिन पहले ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह राठौड़ ने यह किस्सा साझा किया –

मैं अक्सर कहता हूँ कि छोटी-बड़ी प्रत्येक घटना अपनी प्रकृति के अनुसार एक नियत समय पर होती है. यहाँ तक कि सोशल मीडिया पर हमारे सामने बेतरतीब से आ जानेवाले पोस्ट और पिक भी बेतरतीब नहीं होते बल्कि टाइमिंग के एक पैटर्न को फॉलो करते हैं.

मुझे ऐसा बोलने के कारण ही कुछ लोगों को तथाकथित विज्ञान की ओट में मुझ पर हमला करने का अवसर मिल जाता है. उनके पास अभी तक विज्ञान में हुए डेवलपमेंट के कॉपी-पेस्ट कलेक्शन हैं. मैं उन लोगों का विरोध भी नहीं करना चाहता, क्योंकि मैं मानता हूँ कि विज्ञान और अध्यात्म दोनों अलग विषय हैं और दोनों को एक ही कसौटी पर नहीं कसा जा सकता.

विज्ञान की दिशा वस्तुनिष्ठ है और अध्यात्म की व्यक्तिनिष्ठ. विज्ञान के खोजों का अनुभव सबको कराया जा सकता है पर आध्यात्मिक अनुभूति को सिर्फ कोई मुमुक्षु साधक ही समाधि में अपरोक्षानुभूति कर सकता है. यदि उससे इसका सबूत माँगा जाये तो वो नहीं दे पायेगा पर उसका अनुभव विज्ञान से भी अधिक यथार्थ है.

विज्ञान के नये खोज पूर्व की अपनी ही मान्यताओं को धराशायी कर देता है, अर्थात यहाँ नयी स्थापनाएं पूर्व के स्थापनाओं को खण्डित कर सकती है. पर अध्यात्म में जिस सत्य को एक बार साक्षात प्रत्यक्ष कर लिया जाता है वो बाद के किसी भी अनुभव से खण्डित नहीं किया जा सकता.

जैसे ज्योतिष में घटनाओं को टाइमिंग का पीछा करने का मेरा हज़ारों बार का अनुभव है. ये ज़रूरी नहीं कि ऐसा प्रत्येक व्यक्ति के साथ हो, लेकिन एक ज्योतिषी के लिए यह एक आवश्यक शर्त है कि वह इतना सेंसेटिव हो कि प्रकृति उससे संवाद स्थापित कर सके, नहीं तो केवल ज्योतिषीय कैलकुलेशन से कुछ हाथ नहीं लगेगा.

वर्तमान समय में टेक्नोलॉजी ने हमें इतनी सुविधा प्रदान की है जिसके कारण हम सभी ऐसी घटनाओं को समझने का प्रयास कर सकते हैं. एक शाम 06:28 में फेसबुक खोला तो सबसे पहले देवहुति सिंह जी की बन्दूक लिए हुए नयी प्रोफाइल पिक मेरी आँखों के सामने आई. मैंने तुरन्त उसी समय की कुण्डली बनायी कि अभी किन ब्रह्माण्डीय ग्रहों के प्रभाव से ऐसा एक महिला द्वारा शौर्य प्रदर्शित करता पिक मेरे सामने आया है.

मैं हर बार की तरह इस बार भी दंग रह गया. लग्न में उच्च का दबंग मंगल केतु के साथ बैठा हुआ है. चन्द्रमा दबंग मंगल की ही मेष राशि में, केतु के नक्षत्र में और शुक्र के सब-नक्षत्र में बैठा है. उच्च का मंगल भी सूर्य के नक्षत्र और शुक्र के सब-नक्षत्र में बैठा है.

मन का कारक चन्द्रमा केतु के अश्विनी नक्षत्र में है और केतु चन्द्रमा के श्रवण नक्षत्र में है, अर्थात चन्द्रमा और केतु का नक्षत्र परिवर्तन हो गया है. मंगल और केतु जैसे हिंसा और युद्धप्रिय ग्रहों का लग्न और चन्द्रमा दोनों से इतना गहरा संबंध तथा इनका शुक्र के सब-नक्षत्र में होना किसी वीरांगना दबंग क्षत्राणी स्त्री के हाथों में तमंचा के पिक को दर्शा रहा है.

मैं बिना किसी एडिटिंग के दोनों पिक का स्क्रीन शॉट आपलोगों के शोध के लिए डाल रहा हूँ, जिससे आप दोनों पिक के ऊपर में लिखा समय चेक कर सकें और जिनके पास कुण्डली बनाने का सॉफ्टवेयर है वे उस समय विशेष की कुण्डली खुद बनाकर इस कथन की सत्यता का परीक्षण कर सकें.

अब आप लोग खुद ही बताइए कि हम जैसे लोग अपने अनुभवों को उठाकर किस समुद्र में फेंक दें और वैज्ञानिक सोच के नाम पर प्रकृति से इस मौन संवाद का गला कैसे घोंट दें?

मेरे पास ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह जैसा ज्योतिषीय ज्ञान तो नहीं है लेकिन मेरे स्वप्न आजकल बहुत मुखर हो चुके हैं…

पिछले कुछ महीनों से माया ने बहुत उलझा रखा था, और मैं उलझने का आनंद लेती रही, लेकिन एक सीमा के बाद लगा जैसे मैं एक ही जगह पर बस गोल गोल घूमे जा रही हूँ… इससे आगे नहीं बढ़ पा रही.. चेतना स्तर पर भले माया ने बहुत लम्बी यात्रा तय करवाई लेकिन सांसारिक मन जैसे वहीं खड़ा रह गया हो… और इतना भारी हो गया कि अब इतने वज़न के साथ चेतना की गति के साथ कदमताल करना मुश्किल होता जा रहा था…

जीवन किसी के लिए नहीं रुकता… चेतना का रुकना भी असंभव था, मुझे ही अपने सांसारिक मन की बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ना था… बहुत ही मुश्किल प्रक्रिया के बाद जब लगा कोई तार अब भी बहुत मजबूती से बांधे हुए हैं… तब महामाया से प्रार्थना की कि मुक्त कर दो अब इस माया से … अब सहनशक्ति के बाहर हो रहा है…मैं उड़ जाना चाहती हूँ चेतना के साथ उस रहस्यमय दुनिया में…. अब इस जगत में मन नहीं लगता…

यूं तो ध्यान बाबा अक्सर समझाते रहते थे… आप ही की रची हुई माया है, आप उलझना चाहती हैं इसलिए वो उलझाती हैं… और इससे बाहर निकलने की कुंजी भी आप ही के पास है…

ध्यान और साधना के बहुत से प्रयोगों के बाद जब मन इस भागा दौड़ी और खिंचाव से थक गया तब साहस जुटाकर मैंने छलांग मारी… कल रात मेरे लिए बहुत साहस की रात थी… आख़िरी बंधन सांसारिक जगत से तोड़कर आई थी…

रात बहुत शांति से गुज़री और फिर सुबह सुबह प्रारम्भ हुआ स्वप्न संकेत…

मैं किसी एक बहुत ही बौनी स्त्री के साथ खेल रही हूँ… एक रात पहले भी एक बौनी स्त्री को देखा था लेकिन वो कम से कम मेरे कमर तक आ रही थी… आज जो स्त्री दिखी… वो सिर्फ मेरी एक ऊंगली के बराबर थी….

वो मेरे साथ खेल रही है, मैं उससे बचने के कोशिश कर रही हूँ और वो मुझे छूने की…. जब वह बहुत थक जाती है फिर भी मुझे पकड़ नहीं पाती है तो मैं उसे कहती हूँ, चलो अब मेरी बारी मैं तुम्हें पकड़ती हूँ तुम भागो… लेकिन वो अचानक से कहती है… नहीं नहीं मुझे छूना नहीं… और खुद को समेटने लगती है… मैं नहीं मानती और उसे अपनी ऊंगली से छू लेती हूँ…

मेरे छूते ही वो और भी छोटी हो जाती है और छोटे होने के साथ ही एक छोटी सी मछली के पारदर्शी लार्वे में बदल जाती है… अपना रूप बदलते हुए वो कहती है… मैंने कहा था मुझे छूने की गलती मत करना … अब भुगतो…

उसकी ऐसी बातें सुनकर मैं उसे अपनी ऊंगली से मसल देती हूँ लेकिन मेरे ऐसा करने के साथ ही उस मछली के लार्वे के अन्दर से एक और मछली प्रकट होती है… अब वो एक से दो हो चुकी हैं…. अब वो मुझे पानी के छोटे से गड्ढे में दिखाई देती हैं और इतनी तेजी से दो से चार और चार से आठ में विभाजित होती है कि मुझे आश्चर्य होता है…

वही पानी का छोटा सा गड्ढा अब एक कुण्ड में बदल जाता है और वो अब लार्वा से सच्ची की छोटी छोटी मछलियाँ बन जाती हैं…

मैं कुण्ड के किनारे खड़ी हूँ.. वो ढेर सारी छोटी छोटी मछलियाँ तेज़ी से मेरी तरफ आती हैं और कुण्ड की दीवारों से जब टकरा कर लौटती हैं तो बहुत ही बड़ी बड़ी मछलियों में परिवर्तित हो जाती हैं…

मैं समझ जाती हूँ कि माया को छूने की जो मैंने गलती की है वही दोगुनी और दोगुने से चार गुना होकर मेरे सामने प्रकट हो रही है… यदि मैं इसमें ही उलझी रही तो यह अपना आकार इतना बढ़ा लेगी कि मुझे ही निगल जाएगी.. थोड़ा भय उठता है… लेकिन यह भी आभास है कि भय बना रहा तो यहाँ से जा न सकूंगी… तो मैं लापरवाही से मुंह मोड़कर घर लौट आती हूँ…

घर लौटने पर मन में इतना सुकून रहता है कि यह तो कितना आसान था, मैं नाहक इतने लम्बे समय से इसमें उलझी रही… मैं अपनी प्रसन्नता को ध्यान बाबा से बांटना चाहती हूँ तभी ध्यान बाबा कहते हैं जाओ देखो दरवाज़े पर अंकल आपकी बड़ी सुपुत्री को लेकर तो नहीं आए…

मैं अभी पलंग पर ही बैठी हूँ और दोनों घर में प्रवेश करते हैं… मैं ध्यान बाबा की ओर देखकर कहती हूँ आप सच में जादू हैं आपको कैसे पता चल जाता है सब… वो हमेशा की तरह बस मुस्कुरा भर देते हैं…

बड़ी बेटी जो सत्रह अठारह वर्ष की सुन्दर युवती हो चुकी है आते से ही मेरी गोद में सर रख लेती है… और रोते हुए बताती है कि वो किसी मुसीबत में है, और एक प्रौढ़ व्यक्ति के चंगुल से भाग कर आई है…

मैं उसकी समस्या का समाधान करती हूँ और उसे विश्वास दिलाती हूँ कि अब उसकी सारी समस्या ख़त्म हो गयी है चिंता न करे…

वो खुश हो जाती है और लौटने का आग्रह करती है… मैं चाहकर भी उसे रोक नहीं पाती और हम स्टेशन पहुँच जाते हैं… लेकिन स्टेशन पहुँचने के साथ ही उसकी गाड़ी को निकलते हुए देखते हैं और वो उसमें बैठ नहीं पाती… हम दोनों बहुत प्रसन्न हैं… दोनों ही नहीं चाहते थे कि वो वापस जाए…
चूंकि बड़ी सुपुत्री का कुछ दो चार दिनों में ही जन्मदिन आ रहा है, तो हम दोनों ही चेतन-अचेतन मन में एक दूसरे को स्मरण कर रहे होंगे, इसलिए उसका स्वप्न में आना स्वाभाविक है… अचंभित इसलिए हूँ कि स्वामी ध्यान विनय ने मुझे 2008 में उनके पास आने के पूर्व ही बता दिया था कि आपकी सुपुत्री के जीवन में कोई समस्या आएगी जिसके समाधान के लिए वो आपके पास आएगी… तो उस घटना का संकेत भी मुझे इस स्वप्न से मिला…

इस स्वप्न के साथ ही आँख खुलती है… तो पाती हूँ पापा आवाज़ लगा रहे हैं… शैफाली उठो चाय बनाना है… आज रविवार है, बच्चों को भी स्कूल नहीं जाना और पापा कभी बिना वजह सिर्फ चाय बनवाने के लिए नहीं जगाते, तो मैं जल्दी से उठकर रसोई में जाती हूँ…

पापा किसी करीबी की मृत्यु की खबर देते हुए कहते हैं आठ दस कप चाय बना दो उनके घर पहुंचा दूं…

ये मेरे साथ अक्सर हुआ है… ऐसी किसी महत्वपूर्ण घटना या स्वप्न के बाद मुझे अक्सर किसी की मृत्यु की खबर मिलती है… जिसे मैं जीवन से मुक्ति का संकेत मानती हूँ…

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कल रात से आज तक में बाबाजी को कई बार याद किया… सद्गुरु से आजकत तार जुड़े अनुभव करती हूँ तो सुबह सूर्य साधना के दौरान आदियोगी के स्मरण के साथ ध्यान प्रारम्भ किया और पूरी तरह प्रार्थना हो गयी… अपने सांसारिक कर्तव्य का मुझे पूरा ध्यान है, प्रेम का जो रिश्ता सबसे बना है उसमें कोई कमी न आएगी, लेकिन इस मोह और माया से मुझे मुक्त कर दो… एक छोटा सा तार जो बचा है मोह और आसक्ति का वो मुझे बहुत पीड़ा पहुंचा रहा है… मुक्त कर दो…

और आँखें खोलते से ही देखती हूँ दो प्रकाश पुंज मेरे सिर से उड़ते हुए बाहर वातावरण में लुप्त हो जाते हैं…

मैं अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता से भरी हूँ… मैं नहीं जानती मैं कितना इस मोह और माया के जगत से मुक्त हो सकी हूँ लेकिन इतना विश्वास है कि मैं उनकी एक और परीक्षा में सफल होकर आगे की यात्रा के लिए तैयार हूँ… क्योंकि जब तक जीवन है तब तक मेरी मुक्ति के लिए गुरुओं की परीक्षा चलती रहेगी… ऐसे ही एक-एक तार से वो मुझे मुक्त करते जा रहे हैं, पिछले वर्ष भय से और इस वर्ष मोह और माया से मुक्त किया है…

गुरुओं को और अस्तित्व को माँ जीवन का प्रणाम

ताड़पत्र-3 : पिछले जन्मों का हिसाब

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