सामाजिक समरसता बचाने का यही एक तरीका, वर्ना जो होगा सबके साथ होगा, मुझे क्या?

दलितों, SC/ST वालों ने… (छोड़ो, सच्चाई ही लिख देता हूँ), काँग्रेस सहित अन्य सरकार विरोधी विपक्ष ने (यही सच है) SC/ST एक्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सवर्णों को अन्याय से बचाने के लिए किए गए बदलाव के खिलाफ 9 अगस्त को विरोध प्रदर्शन का कार्यक्रम बनाया हुआ है।

पिछले ऐसे प्रदर्शन में की गई भारी हिंसा, तोड़ फोड़, आगज़नी और भारी नुकसान के बावजूद।

इसी दबाव में केंद्र सरकार उससे पहले ही संसद में इस एक्ट में संशोधन करके सुप्रीम कॉर्ड के आदेश को रद्द करने का प्रयास कर रही है।

यानि अब फिर से पहले की तरह सिर्फ किसी SC/ST द्वारा किसी सवर्ण के खिलाफ मात्र इतना आरोप लगाते ही (झूठा ही सही) कि फलाँ सवर्ण ने उनको उनके जाति के नाम वाले जातिसूचक शब्दों से संबोधित किया है, उस सवर्ण को सीधा जेल की कोठरी में डाल दिया जाएगा।

इससे आम जनता में (सवर्णों में) दहशत का माहौल है। हालाँकि ये कानून पहले भी था, और इसका दुरुपयोग भी बराबर होता रहा है, लेकिन पहले फिर भी ये इतना आम नहीं था।

लेकिन इस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उस पर विपक्षियों द्वारा सरकार को बदनाम करने की नीयत से किए गए हो हल्ले के बाद अब ये कानून दलित समुदाय के बच्चे बच्चे की जानकारी में और उनके हाथ में थमे एक विध्वंसक हथियार की तरह आ गया है, जिसका गलत प्रयोग (पहले भी होता था, अब और ज्यादा होगा) सामाजिक समरसता के ताने बाने में आग लगा देगा।

इसी के डर से अभी से ऐसी चर्चाएं सुनने में आने लगी हैं कि अब सवर्ण समुदाय इस डर के कारण दलितों को नौकरी पर या किराए पर रखने या उनके साथ किसी भी तरह का व्यवहार/ लेन देन करने से बचेगा कि पता नहीं किस समय और किस बात पर सामने वाले को बुरा लग जाए और वो अपने हाथ में थमा ब्रह्मास्त्र चला कर उनको खेत कर दें।

हालाँकि इसका नुकसान दोनों समुदायों को होगा, लेकिन बड़ा नुकसान उस दलित SC/ST समुदाय को ही होगा, जिसकी भलाई (ऐसा उनको समझाया जा रहा है) के लिए इस कानून को संशोधित करके वापिस पहले जैसा बनाने की कवायद हो रही है।

उदाहरण से समझाता हूँ…

अगर आपकी चप्पल टूट गई तो आप उसको सुधरवाने के लिए किसी मोची के पास न जाकर उसकी जगह नई चप्पल खरीदना अफोर्ड कर सकते हैं, आपकी तरह 10 लोग और भी ऐसा कर सकते हैं।

लेकिन वो मोची, जो इन 10 ग्राहकों से 20-30 रूपए इकट्ठे करके शाम को उन 200-300 रु से अपने बच्चों के लिए भोजन का प्रबंध करता… क्या वो इस नुकसान को अफोर्ड कर पाएगा? जवाब है – नहीं। शायद 2 दिन या 4 दिन कर भी ले, लेकिन आखिर कब तक भूखा रखेगा अपने परिवार को।

तो आखिर इसका हल क्या है? क्योंकि सरकार तो इसका मन बना चुकी है।

इसका हल ये है कि ये सब बातें जल्द से जल्द जनता के बीच में ले जाई जाएं, सरकार और विपक्ष के कानों तक पहुंचाई जाएँ।

दलित समाज के लोगों को इससे उन्हें होने वाला नुकसान समझाया जाए (क्योंकि इससे उनको फायदा तो कोई है नहीं) कि अगर तुमने किसी को नाराज़गी के कारण जेल भिजवा भी दिया तो इससे तुम्हारे घर का बुझा चूल्हा नहीं जलेगा।

दलितों के आगे विपक्ष की इस साज़िश को नंगा किया जाए कि ये लोग अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए तुम्हारे पेट पर लात मारने का प्रबंध कर रहे हैं।

उनको समझाया जाए कि काँग्रेस सहित झूठे विपक्ष ने तुम्हें ये गलत बताया है कि सरकार ने SC/ST कानून खत्म कर दिया है।

SC/ST कानून अभी भी अपनी पूरी पावर के साथ कायम है। बदलाव सिर्फ ये है कि अब गिरफ्तारी फौरन न होकर जाँच में शिकायत सही पाए जाने पर होगी। और इससे जिसकी शिकायत सच्ची होगी उसको न्याय मिलने में कोई कोताही नहीं होगी।

मात्र यही एक तरीका है सामाजिक समरसता को बचाने का, वरना तो जो होना है वो सबके साथ ही होना है… मुझे क्या?

आइये समर्थन करें, SC-ST एक्ट पर मोदी सरकार के कदम का

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