SC-ST एक्ट : हंगामा है क्यों बरपा?

वर्ष 2016 में देश में IPC तथा SLL की धाराओं के तहत देश मे दर्ज हुई आपराधिक घटनाओं की संख्या 48 लाख 31 हज़ार 515 थी।

वर्ष 2015 में यह संख्या 47 लाख 10 हज़ार 676 थी तथा वर्ष 2014 में यह संख्या 45 लाख 71 हज़ार 663 थी।

जबकि वर्ष 2016 में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 40 हज़ार 801 थी यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 00.85%

2015 में में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 38 हज़ार 670 थी। यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 00.82%

2014 में में दलितों के खिलाफ अत्याचार की आपराधिक घटनाओं की संख्या 47 हज़ार 64 यानि कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं का लगभग 01.04%

यहां उल्लेख अत्यन्त आवश्यक है कि NCRB (National Crime Records Bureau) के दस्तावेज़ यह बताते हैं कि दलितों के खिलाफ अत्याचार की कुल दर्ज आपराधिक घटनाओं में हत्या सरीखे जघन्य अपराध की संख्या का प्रतिशत डेढ़ से दो के बीच है तथा बलात्कार सरीखे घृणित अपराध की संख्या का प्रतिशत 5 से 6 के बीच है।

यह प्रतिशत पिछले कई वर्षों से है। बल्कि पिछले कई वर्षों से यह लगभग स्थिर ही है।

उपरोक्त आंकड़ें SC/ST एक्ट में संशोधन के विरोध और समर्थन में हंगामा हुड़दंग कर रहे दोनों पक्षों को कठघरे में खड़ा करते हैं।

यह आंकड़े न्यूज़ चैनलों, राजनेताओं और उन तथाकथित बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों को भी पूरी तरह बेनकाब करते हैं जो देश में ऐसा हंगामा कर रहे हैं, मानो देश में दलितों पर अत्याचार की बाढ़ आ गयी हो।

पहले बात उन लोगों की, जो पिछले कुछ दिनों से दलित एक्ट में संशोधन के खिलाफ प्रचण्ड मातम कर रहे हैं।

उन्हें क्या यह ज्ञात नहीं, या वो जानबूझकर अनजान बनने का ढोंग कर रहे हैं कि देश में दर्ज होनेवाली 40-45 लाख आपराधिक घटनाओं में जिन धाराओं के तहत गिरफ्तारी होती है उनमें से बहुत बड़ी संख्या ऐसी धाराओं की है जो गैर जमानती होती हैं। अतः SC/ST एक्ट में गैर जमानती बनाने पर ऐसा हंगामा क्यों, मानो आसमान टूट पड़ा हो या धरती फट गयी हो।

अब सवाल उन न्यूज़ चैनलों, राजनेताओं, तथाकथित बुद्धिजीवियों, दलित चिंतकों से भी, जो दलितों पर अत्याचार की घटनाओं का डंका इस तरह पीट रहे हैं मानो देश में चारों तरफ आग लगी हो और उस आग में केवल दलितों को जलाया जा रहा है।

देश में प्रतिवर्ष औसतन 37-38 हज़ार हत्याएं तथा लगभग 32-35 हज़ार बलात्कार सरीखे जघन्य अपराधों की घटनाओं समेत 40-45 लाख आपराधिक घटनाएं होती हैं, उनका शिकार बनने वाले लोगों की हत्या क्या जाति देखकर/ पूछकर की जाती है?

सच यह है कि जिस देश में 40-45 लाख आपराधिक घटनाएं प्रतिवर्ष होती हों, तो उस देश में रहने वाला कोई भी वर्ग, कोई भी समुदाय उन घटनाओं की चपेट में आने से कैसे बच सकता है?

सच तो यह है कि सरकारों की सजगता और SC/ST सरीखे कानूनों के चलते देश में दलितों के खिलाफ होने वाले अत्याचार की आपराधिक घटनाओं का प्रतिशत देश में होनेवाली कुल आपराधिक घटनाओं की तुलना में बहुत कम है।

अतः SC/ST एक्ट के समर्थन और विरोध में हंगामा बन्द करिये।

विराट हिन्दू हित की अनुसूचित ‘माया’

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