आइये समर्थन करें, SC-ST एक्ट पर मोदी सरकार के कदम का

संवैधानिक विशेषाधिकार किसी भी नागरिक समुदाय को मिले यह सैद्धांतिक रूप से गलत है।

अनुसूचित जातियों/ जनजातियों को मिल रहे विशेषाधिकारों का दुरूपयोग बढ़ने पर भारत के उच्चतम न्यायालय ने एट्रोसिटी एक्ट के कुछेक प्रावधानों पर रोक लगा दी थी, न्यायपालिका ने इस विषय में ‘न्याय को कानून से ऊपर’ माना था।

अब यह ख़बर आई है कि मोदी सरकार एट्रोसिटी एक्ट के प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय के आदेश पूर्व की स्थिति में लाने के लिए बिल लाने जा रही है।

अब इसके लिए इस सरकार की आलोचना होनी चाहिए क्योंकि यह बिल न्याय की समानता के ऊपर कानूनी विशेषाधिकार को स्थापित करेगा।

सामान्यतया इसकी आलोचना होनी ही चाहिए।

पर वह कहते हैं ना कि महान लक्ष्यों के लिए उच्चतम बलिदानों की आवश्यकता होती है।

हम भारतीय आज से नहीं बल्कि मुहम्मद बिन कासिम की सिंध विजय से आज तक सभ्यताओं के वैश्विक संघर्ष में फँसे हुए हैं।

1000+ वर्षों से ही भारत के किसी न किसी हिस्से पर इस्लामवाद का शासन रहा है, करीब 200 वर्षों तक ईसाई सभ्यता की गुलामी हमने भोगी है।

महज़ 70 वर्षों पूर्व ऐसे ही संघर्ष में हमने आज़ादी नाम के छलावे में ही अपना एक चौथाई भू-भाग इस्लामवाद के हाथों गँवा दिया था, एकता का अभाव तब भी था, सो अब भी है।

हमें भूलते देर नहीं लगी कि महज़ 70 वर्षों पूर्व ईसाइयत और इस्लामवाद ने हमारी पूरी तबियत से धुलाई की थी।

1947 के विभाजन से 3 दशकों पूर्व ही दलित समाज के नेतृत्व को हमारे विरुद्ध भड़काया जाना शुरू कर दिया गया था। कोशिश यही थी कि दलित समाज मुख्यधारा से अलग हो कर नरम चारा बन जाये।

डॉ आंबेडकर तो फिर भी शुरुआती फिसलन के बाद सम्हल गये पर जोगेंद्र नाथ मंडल जैसे कइयों ने हमसे मुंह मोड़कर ऐसे धतकरम को समर्थन दिया जिसकी कोई कीमत चुकानी संभव नहीं है।

आज हालात फिर से वहीं हैं, सभ्यताओं का संघर्ष महज़ 70 वर्षों में द्वार पर विभाजन की एक और माँग के साथ खड़ा हो गया है।

सेक्युलकरवादियों द्वारा गृहयुद्ध की धमकी दी जा रही है और इस्लामवाद सीधे अलग से भूमि का पुनर्विभाजन माँग रहा है।

हम आज भी देख सकते हैं कि दलित समाज को अपनी जागीर समझने वाला शासक वर्ग डॉ अम्बेडकर के नाम की माला भले जपता हो पर उसकी निष्ठा जोगेंद्रनाथ मंडल और पेरियार हो जाने में है।

गत चार वर्षों में दलित समाज को भड़काने का हर संभव उपाय किया जा चुका है, और यह खेल सिर्फ़ वोटबैंक के आधार पर चुनाव को जीतने भर का नहीं है।

यह खेल है भारतीय राष्ट्र (जिसकी आत्मा हिंदुत्व है) को अन्यायपूर्ण एवं अनैतिक राज्य सिद्ध कर देने का…

लाख कमियों के बावजूद यह मानने से इनकार नहीं है कि समाज की निम्न सीढ़ियों पर खड़े वर्गों को आज के राष्ट्र में संविधान की सुरक्षा में ‘ढाल’ जैसा भरोसा दिखता है।

अब इस्लामवाद और साम्यवाद ने इसी ढाल को अनैतिक, असुरक्षित और अन्यायपूर्ण सिद्ध करने का बीड़ा उठाया है।

उन्हें बस इतना ही तो सिद्ध करना है कि वर्तमान सरकार उच्चतम न्यायालय के माध्यम से अनुसूचित जातियों/ जनजातियों के हितों के विरुद्ध संविधान को कमजोर कर रही है ताकि ‘सवर्ण हिन्दू राष्ट्र’ बनाया जा सके.

दुर्भाग्य है कि उच्चतम न्यायालय के एट्रोसिटी एक्ट से सम्बंधित फैसले से इस अवधारणा को मजबूती मिली।

संविधान के नैतिक समर्थन से हटाते-हटाते अनुसूचित जातियों/ जनजातियों का वोटभोगी वर्ग कब उन्हें राष्ट्रद्रोही बना देगा यह आपको पता भी नहीं चलेगा।

ठीक वैसे ही जैसे आपकी नजरें गाँधी-नेहरू-पटेल पर टिकी रहीं और जोगेंद्र नाथ मंडल बंगाल के 4 जिले ले गया.. लाहौर छीन लिया गया, मीरपुर – मुज़फ्फराबाद लूट लिया गया पर पता नहीं चला।

आज भी कैराना-किशनगंज-मुर्शिदाबाद-मल्लापुरम लुट चुके हैं पर दिखाई नहीं दे रहे।

औऱ आपको लगता है कि यह वोटबैंक का खेल चुनाव भर जीतने का है, ठीक जैसे गाँधी को लगता था कि ख़िलाफ़त में मुसलमानों की भागीदारी देश की आज़ादी के लिए थी।

नरेंद्र मोदी सरकार यह जानती है कि अनुसूचित जातियों/ जनजातियों के समर्थन मात्र से वह चुनाव नहीं जीतने वाले, बल्कि इस तरह से वह अपने कट्टर सवर्ण वोटरों के एक हिस्से का समर्थन गंवा देंगे।

यह जानकर भी वह एट्रोसिटी एक्ट की पुरानी स्थिति को बहाल करने का जोख़िम उठा रहे हैं।

वजह फ़िर दुहराता हूँ, यह सिर्फ़ चुनाव जीतने भर का खेल नहीं है, यह दृष्टिकोण है भारतीय राष्ट्र-राज्य (जिसकी आत्मा हिंदुत्व है) के संविधान को वंचित वर्गों के लिए न्यायपूर्ण, नैतिक सिद्ध करने का…

अनुसूचित जनजातियों/ जातियों का वोटभोगी शासक वर्ग उन्हें संविधान और भारत के विरुद्ध भड़का न सके, इसकी पहल है।

विभाजन और गृहयुद्ध जैसी आवाज़ों में भारत के सबसे बड़े संगठित संख्याबल को संविधान और भारत समर्थक बनाये रखने की गूँज है यह….

आइये इसका समर्थन करें…

विराट हिन्दू हित की अनुसूचित ‘माया’

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