सौरभ-वाणी : विस्मय, कौतुहल और आश्चर्य के पल

नए लोग अनजाने ना लगे और परिचित व्यक्तियों से बार-बार मिलने का मन हो इसलिए हम क्या कर सकते हैं? दोनों अलग मुद्दे हैं, बारी-बारी देखते हैं।

जिनके साथ पहले कभी मुलकात, व्हाट्सप या फोन पर बात ना हुई हो, ऐसे शख्सियत से पहली बार मिलने सामान्यतः हिचकिचाहट होती है। अगर कोई काम के लिए जा रहे हो तो काम कर के देगा कि नहीं, चाहने वाले जैसे मिल रहे हो तो अक्खड़पन से व्यवहार करेगा या प्यार भरी झप्पी देगा, मित्र बनाने की इच्छा हो पर मित्र जैसे गुण उसमें है भी या नहीं, ऐसी दुविधा मन में रहेगी ही।

नई शख्सियत से परिचय होने के साथ उस व्यक्ति के आसपास के समग्र माहौल का परिचय भी होता है। व्यक्ति पसंद आ जाये पर उसका कल्चर पसंद ना आये या फिर इसका उल्टा भी हो सकता है।

पार्टी, सामाजिक कार्यक्रम या नाटक, लग्न, या सामाजिक मैरेज ब्यूरो में होने वाली नई नई जान पहचान में से हर जान पहचान सिर्फ़ औपचारिकता के स्तर पर नहीं रह सकती। कितने ही परिचित विजिटिंग कार्ड या फोन नंबर की लेनदेन कर के संबंधो में सामान्य से बहुत आगे जा सकते हैं।

छोटे से सर्कल में, घर में, ऑफिस में या फिर रेलवे-फ्लाइट जैसी आम जगहों पर सिर्फ एक-दो परिचित व्यक्तियों की मौजूदगी या उनकी गैरमौजूदगी में भी परिचय बनाने खुली जगह मिलती है।

व्यक्ति यानी सिर्फ उसका विजिटिंग कार्ड का नाम या ओहदा नहीं पर इस से भी विशेष है इस बात की प्रतीति ऐसे परिचयों के दरमियान होती है। ऐसे परिचयों में भविष्य में अपॉइन्मेंट के बिना मिलने वाले संबंध भी बनने की गुंजाइश है।

एक बार मिलने के बाद फिर कभी न मिले हो ऐसे चेहरों की लिस्ट बहुत लम्बी होती है. कभी इनमें से कुछ चेहरे नज़र के सामने आकर तुरन्त ओझल हो जाते हैं। उनके साथ की गई मुलाकात की जगह, समय याद करने से पहले ही वो किसी धुंध में खो जाते हैं। बाकी रह जाती है उन्हें कभी वापस मिलने की तीव्र इच्छा।

पहली मुलाकात के बाद जिनसे बार-बार मिलते रहते हैं, उनमें से कितनों को कितने वर्षों से जानते हो?उनके साथ की पहली मुलाकात याद है? कितनों के साथ की पहली मुलाकात का एक एक पल याद है? कितने ही लोग नजदीक आने बाद इतने दूर चले जाते हैं कि उनके साथ पहेली तो क्या आखरी मुलाकात कब हुई ये भी स्मृति में नहीं रहता।

नए व्यक्ति से मिलते वक्त बहुत से खुद के सेफ ज़ोन में से बाहर आने से डरते हैं। उन्हें डर है कि उनकी शख्सियत सामने वाले के सामने खुल जाएगी। अनजान व्यक्तियों से भी मिलना चाहिए, उनमें से कौन मित्र बन जाए ये हम नहीं जानते।

अभी जो मित्र है वो भी कभी आपसे अंजान ही थे। कमनसीबी ये है कि जो कभी मित्र थे वो आज अंजाने हो चुके हैं। रिश्ते आगे बढ़ते-बढ़ते कभी ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हो जाते हैं कि आप उनके साथ जा नहीं सकते और वो आपके साथ चल नहीं सकते। फिर परिचित से अंजान बनने का एक सफर शुरू होता है जो लम्बा और दर्दनाक होता है।

बिछड़े हुए चेहरे आखिर भूल जाते हैं या फिर भूल चुके हैं, खुद को दिलासा देना पड़ता है।. हम वर्तमान के रिश्तों में उन पुराने रिश्तों को खोजने की कोशिश करते हैं और खुद के साथ-साथ आज के और पुराने मित्र के साथ भी अन्याय कर बैठते हैं।

कुटुंब, समाज, मित्रवर्ग में ऐसे कितने ही परिचित चेहरे हैं जिनके साथ के संबंधों पर बरसों की धूल जम चुकी है। स्नेह कम हो जाने से ऐसा हो सकता है। स्नेह, प्रेम या आवेश बढ़ता भी ना हो और घटता भी ना हो ये परिस्थिति सम्बंधों के लिए खतरे की घण्टी है।

ऐसे सपाट सम्बंधो की जमीन पर खरपतवार उग जाती है जिस वजह से विस्मय, कौतूहल, और आश्चर्य के पल नही पैदा होते। संबंध थिर होकर निरस्त न हो जाये इसी लिये लम्बे समय के घनिष्ट सम्बंधों की तंदुरस्ती के लिए झगड़े अनिवार्य होते होंगे। मन में जमा हुआ मेल जब बाहर आता है तभी नजदीकी व्यक्तियों से झगड़ा होता है।

मन में कूड़ा जम जाये तो उसे अलग निकाल कर फेंक देना चाहिए। दुनियादारी में इसे ही रूठना, मनाना, समझाना कहते हैं। ये क्रिया अगर देर से शुरू हो या लम्बी चले तो फिर से संबंध निरस्त हो जाने का भय रहता है।

परिचित से रोज रोज मिलने का मन हो इसलिए खुद के व्यक्तित्व को रोज रोज चमकाते रहना चाहिए। आप जिनसे मिलते हो उसका प्रतिबिम्ब आप झेल ही रहे हो। आप का आईना जितना स्वच्छ चमकदार होगा सामने वाले का प्रतिबिम्ब उतना ही साफ दिखेगा।

खुद को नीरस बनाने वाले व्यक्ति को कभी दूसरे के जीवन में रस नहीं दिखता। नए प्रवाह, नए विचार, नए शौक, नए समय को छूते रहना चाहिए, और पुरानी परंपरा, नीति, पुरानी प्रमाणिकता की धार तेज करते रहना चाहिए। नहीं तो नजदीकी लोग उपेक्षित हो सकते हैं।

हर संबंध को सम्भालने की और उसके लालन पालन की जिम्मेदारी आपके के सर पर है। सामने वाला जैसा बर्ताव करे वो उसका विषय है आप को क्या करना है ये आपको तय करना है।

सम्बंध में एक जड़ता प्रवेश करे उस से पहले सहजता के साथ थोडा अंतर बढ़ा देना चाहिए। ऐसी बाढ़ के बाद सुनामी ज्यादा निकटता लाती है। हर सम्बंध को बारी बारी नए सिरे से देखते रहना चाहिए। शक्य है कि कोई नया अंजना एंगल ध्यान में आये जिस वजह से सम्बंधो को नया नाम मिले।

इसमें जोखिम भी है। कभी कोई ऐसा एंगल भी मिल जाएगा जिस वजह से अर्थ का अनर्थ भी हो सकता है। फिर भी साहस करना चाहिए। साहस किये बिना सम्बंध का पता नहीं चलता। ऐसे संबंध सही वक्त पर कायरता साबित करते हैं। कभी सामने वाले के स्थान पर खुद को रखकर दृश्य को देखने से खुद के व्यक्तित्व को सुधारने का एक मौका मिलेगा।

ज़िंदगी में बहुत से लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं, उनका मिलना हमारे व्यक्तित्व में कुछ देकर जाता है। बिछड़ना कुछ लेकर जाता है। इतने उतार चढ़ाव के बावजूद ज़िंदगी जीने जैसी लगती है इसका रहस्य क्या है? दुनिया के तमाम रहस्यों का जवाब मिल जाए तो लिखने की ज़रूरत ही ना रहे।

– लेखक गुजरात के प्रख्यात पत्रकार और लेखक ‘सौरभ शाह’, जिन्होंने ‘एकत्रीस स्वर्ण मुद्राओं, संबंधों नुं मैनेजमेंट एवं अयोध्या थी गोधरा’ सहित 14 पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें पांच नॉवेल भी सम्मिलित हैं.

(अनुवादक – ‘मेकिंग इंडिया’ टीम के भावेश संसारकर)

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Saurabh

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