वे पन्द्रह दिन : 02 अगस्त 1947

17, यॉर्क रोड… इस पते पर स्थित मकान, अब केवल दिल्ली के निवासियों के लिए ही नहीं, पूरे भारत देश के लिए महत्त्वपूर्ण बन चुका था।

असल में यह बंगला पिछले कुछ वर्षों से जवाहरलाल नेहरू का निवास स्थान था। भारत के ‘मनोनीत’ प्रधानमंत्री का निवास स्थान।

और इस उपनाम या पद में से ‘मनोनीत’ शब्द मात्र तेरह दिनों में समाप्त होने वाला था, क्योंकि 15 अगस्त से जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार का आरम्भ करने जा रहे थे।

17, यॉर्क रोड… इस पते पर अधिकारियों एवं नागरिकों की हलचल तेजी से बढ़ने लगी थी। वैसे तो यॉर्क रोड पहले से ही महत्त्वपूर्ण मार्ग था।

बंगाल की अशांत स्थिति के कारण अंग्रेजों ने जब अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया, उस समय अर्थात 1911 में एडविन लुटियन नामक ब्रिटिश आर्किटेक्ट को ‘नई दिल्ली’ की रचना का कार्य सौंपा गया।

लुटियन ने दिल्ली के इस महत्त्वपूर्ण इलाके की रचना का काम इसी यॉर्क रोड से प्रारम्भ किया था। नेहरू जिस बंगले में रह रहे थे, वह सन 1912 में बनाया गया था।

इसी बंगले में 2 अगस्त 1947 की सुबह, बेहद व्यस्तता और आपाधापी भरी थी। ब्रिटिश साम्राज्य की तरफ से हस्तांतरण के लिए केवल तेरह दिन बाकी थे। उस कार्यक्रम की तैयारी करना तो एक प्रमुख विषय था ही, परन्तु अनेक महत्त्वपूर्ण विषय लगातार बहते झरने के समान नेहरू के सामने आते जा रहे थे।

राष्ट्रगीत से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक की बड़ी लंबी कार्यसूची नेहरू के सामने थी। इन सबके बीच 15 अगस्त के दिन किस प्रकार की पोशाक पहनी जाए, इतनी छोटी सी बात पर भी नेहरू ध्यान रखे हुए थे।

काँग्रेस के कुछ नेता एवं प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी 17, यॉर्क रोड पर आकर बैठे थे। उन सभी से नेहरू को अलग-अलग विषयों पर चर्चा करनी थी। इसी कारण उस दिन नेहरू ने जल्दी-जल्दी में अपना नाश्ता समाप्त किया और एक अत्यधिक व्यस्त दिन का सामना करने की तैयारी में लग गए।

भोपाल के नवाब का जिन्ना को पत्र

इधर दूसरी तरफ, भारत के स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत में शामिल होने वाले राज्यों के बारे में कई घटनाएं लगातार घटित हो रही थीं।

सरदार वल्लभभाई पटेल स्वयं एक-एक राज्य, एक-एक राजशाही पर अपनी निगाह बनाए हुए थे। इस काम के लिए उन्होंने अपने गृह विभाग में वी.के. मेनन जैसे अत्यधिक कुशल प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति भी कर रखी थी।

सरदार पटेल की सूचना के आधार पर 2 अगस्त को प्रातः वी के मेनन ने भारत के विषय को देखने वाले विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी सर पेट्रिक को एक पत्र लिखा।

इस पत्र में उन्होंने सूचित किया कि ‘भारत में आकार एवं आर्थिक दृष्टि से जो बड़े रजवाड़े हैं, जैसे कि मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर एवं जोधपुर, वह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हैं. फिलहाल हैदराबाद, भोपाल एवं इंदौर ने इस सम्बन्ध ने कोई निर्णय नहीं लिया है।’ इन रजवाड़ों का निर्णय अभी लंबित था।

भोपाल, हैदराबाद एवं जूनागढ़ इन तीनों रजवाड़ों की इच्छा भारत के साथ रहने की कतई नहीं थी। इसी सन्दर्भ में 2 अगस्त को भोपाल के नवाब ने जिन्ना को एक पत्र लिखा।

जिन्ना और भोपाल के नवाब हमीदुल्ला दोनों अच्छे मित्र थे। अपने इस मित्र को लिखे पत्र में नवाब हमीदुल्ला ने लिखा कि ‘अस्सी प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या वाली मेरी भोपाल रियासत इस ‘हिन्दू भारत’ में एकदम एकाकी और अलग-थलग पड़ गई है। मेरी इस रियासत को मेरे और इस्लाम के दुश्मनों ने चारों तरफ से घेर रखा है। कल रात को ही आपने यह स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान भी हमारी कोई मदद नहीं कर सकता है।’

डॉ राजेंद्र प्रसाद का तत्कालीन रक्षामंत्री को पत्र

1, क्वीन विक्टोरिया रोड स्थित निवास में रहने वाले डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की व्यस्तताएं भी बहुत बढ़ गयी थीं। हालांकि भविष्य में भारत के पहले राष्ट्रपति बनने में काफी समय था, परन्तु वर्तमान नेतृत्व में वे एक पितृपुरुष के समान सभी बातों पर चारों ओर ध्यान रखे हुए थे।

स्वाभाविक सी बात थी कि सत्ता हस्तांतरण के इस प्रमुख एवं नाजुक समय पर उनके पास विभिन्न प्रकार की सलाह मांगने वाले अथवा अन्य मसलों पर चर्चा करने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी।

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद मूलतः बिहार से थे, इसलिए बिहार से आने वाले अनेक प्रतिनिधिमंडल भिन्न-भिन्न प्रश्न लेकर उनके पास आते थे।

इसी बीच 2 अगस्त की दोपहर को वे तत्कालीन रक्षामंत्री सरदार बलदेव सिंह को एक पत्र लिख रहे थे। यह पत्र 15 अगस्त का उत्सव मनाने के विषय में था।

उन्होंने लिखा कि ‘पटना शहर में नागरिकों एवं प्रशासन के साथ सेना को भी इस उत्सव में शामिल होना चाहिए, जिससे इस कार्यक्रम की भव्यता में और भी वृद्धि होगी’।

सरदार बलदेव सिंह अकाली दल की तरफ से मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे और वे डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद का बहुत सम्मान करते थे। इसलिए वे राजेन्द्र बाबू के पत्र पर समुचित कार्यवाही करेंगे, यह निश्चित ही था।

हिन्दू महासभा के नेता गिरफ्तार

2 अगस्त की सुबह से ही संयुक्त प्रांत में (यानी वर्तमान उत्तरप्रदेश में) एक अलग ही नाटक खेला जा रहा था।

इस प्रदेश की हिन्दू महासभा के नेताओं को सरकार ने गत रात्रि को ही गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। इन पर आरोप लगाया गया था कि महासभा के नेतागण सरकार के विरुद्ध ‘’डायरेक्ट एक्शन’ का शंखनाद करने वाले हैं।

‘डायरेक्ट एक्शन’ नामक शब्द भारतीय राजनीति में बदनाम हो चुका था, क्योंकि केवल एक वर्ष पहले ही बंगाल में मुस्लिम लीग के हिंसक गुण्डों ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम पर पांच हजार से अधिक हिंदुओं का कत्लेआम एवं हजारों स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था।

काँग्रेस कार्यसमिति ने आगे चलकर विभाजन का जो प्रस्ताव स्वीकार किया, उसके पीछे ‘डायरेक्ट एक्शन’ शब्द की पाशविक स्मृतियां प्रमुख रूप से थीं।

इस कारण ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम से हिन्दू नेताओं को उठाकर जेल में ठूंसना बड़ा ही विचित्र मामला था, क्योंकि इस शब्द का उपयोग केवल मुस्लिम लीग से ही जोड़ा जा सकता था।

यहां तक कि इस विचित्र समाचार को सिंगापुर से प्रकाशित होने वाले ‘इन्डियन डेली मेल’ नामक दैनिक ने भी प्रमुखता दी। शनिवार 2 अगस्त के अंक में बिलकुल प्रथम पृष्ठ पर उन्होंने यह समाचार प्रकाशित किया था। इस समाचार के साथ ही हिन्दू महासभा की दस प्रमुख माँगें भी प्रकाशित की थीं। इस समाचार के कारण हिन्दू महासभा के समर्थकों में बेचैनी का वातावरण निर्मित हो गया था।

कोहिमा से आई चुनौती

उधर सुदूर ईस्टर्न फ्रंट के ‘कोहिमा’ से शनिवार 2 अगस्त को एक और समाचार ने धमाका किया, जो कि भारतीय संघ राज्य के लिए अच्छी बात नहीं थी।

‘इंडिपेंडेंट लीग ऑफ कोहिमा’ ने ऐसी घोषणा की, कि 15 अगस्त को वे भारतीय संघ राज्य में शामिल नहीं हो रहे हैं। वे एक निर्दलीय नागा सरकार का गठन करेंगे, जिसमें नागा जनजाति की जनसंख्या वाला सम्पूर्ण प्रदेश होगा।

15 अगस्त को आकार ग्रहण करने जा रहे भारतीय संघ राज्य के सामने एक के बाद एक लगातार चुनौतियां खड़ी होती जा रही थीं।

अशोक कुमार की फिल्म ‘आठ दिन’

इन सब तनाव भरी ख़बरों की पृष्ठभूमि में देश-विदेश में भारतीय फ़िल्में लोगों का मनोरंजन कर ही रही थीं।

सिंगापुर के डायमंड थियेटर में अशोक कुमार एवं वीरा अभिनीत फिल्म ‘आठ दिन’ काफी भीड़ खींच रही थी। इस फिल्म की कहानी उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार सआदत हसन मंटो ने लिखी थी और संगीतकार एस.डी. बर्मन ने इसी फिल्म के द्वारा भारतीय फिल्म जगत में पहला कदम रखा था।

नेहरू का सरदार पटेल को पत्र

सरदार पटेल के दिल्ली स्थित निवास (यानी वर्तमान में 1, औरंगजेब रोड) पर भी हलचलें तेज़ हो चुकी थीं। राज्यों के विलीनीकरण एवं साथ ही सिंध, बलूचिस्तान एवं बंगाल में भड़के हुए दंगे, इत्यादि तमाम मुद्दों पर गृह मंत्रालय की परीक्षा जारी थी।

इसी समय दोपहर को सरदार पटेल को पंडित नेहरू द्वारा लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ। पत्र छोटा सा ही था। उसमें नेहरू ने लिखा था – “देखा जाए तो केवल एक औपचारिकता के नाते मैं आपको यह पत्र भेज रहा हूं। मैं आपको अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का निमंत्रण देना चाहता हूं। वैसे तो इस पत्र का कोई विशेष अर्थ नहीं है, क्योंकि आप तो पहले से ही मेरे मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं…”।

सरदार पटेल ने वह पत्र ग्रहण किया। थोड़ी देर उस पत्र की तरफ देखा। हल्के से मुस्कुराए और तत्काल ही वे भारत-पाकिस्तान की सीमा (जो कि अभी तक घोषित नहीं हुई थी) पर भड़के हुए भीषण दंगों के बारे में अपने सचिव से चर्चा करने लगे।

काँग्रेस में छिपे वामपंथियों की चिंता

दिल्ली की इस आपाधापी और व्यस्तता के बीच उधर दूर महाराष्ट्र में आलंदी नामक स्थान पर काँग्रेस के अंदर वामपंथी विचारों वाले नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था।

इस अंदरूनी वामपंथी समूह ने दो माह पहले ही तय कर लिया था कि 2 और 3 अगस्त को इस समूह की बैठक होगी। शंकरराव मोरे एवं भाऊसाहेब राउत के आह्वान पर काँग्रेस की यह वामपंथी मण्डली वहां जमा हुई थी।

भारत स्वतन्त्र होने वाला है और इस स्वतन्त्र भारत की चाभी अब काँग्रेस के हाथों में आने वाली है, यह उन्हें स्पष्ट रूप से दो माह पहले ही दिख गया था। अब इस समूह के सामने बड़ा सवाल यह था कि सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में वामपंथी और साम्यवादियों का क्या होगा? इसी का विचार मंथन करने के लिए यह बैठक दिल्ली से बहुत दूर बुलाई गई थी।

काँग्रेस के लिए काम कर रहे, लेकिन विचारों से वामपंथी, अनेक नेता जैसे तुलसीदास जाधव, कृष्णराव धुलूप, ज्ञानोबा जाधव, दत्ता देशमुख, र.के. खाडिलकर, केशवराव जेधे जैसे नामचीन और वरिष्ठ नेता इस बैठक में आए थे।

काँग्रेस के अंदर ही मजदूरों एवं किसानों के लिए एक अलग कार्यकर्ता संघ की स्थापना करने की उनकी योजना थी। किसी ने सोचा भी न था कि इस बैठक से ही आगे चलकर भविष्य में महाराष्ट्र की एक प्रमुख और बड़ी वामपंथी विचारों का पोषण करने वाली तथा किसान-मजदूरों का पक्ष रखने वाली पार्टी जन्म लेगी।

2 अगस्त को संपन्न हुई इस बैठक में इन बड़े वामपंथी नेताओं ने भारत विभाजन अथवा भीषण पाशविक अत्याचारों से युक्त दंगों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। इन्हें केवल काँग्रेस में अपने भविष्य की चिंता सता रही थी।

एंग्लो-इंडियन समुदाय को आश्वासन

दो अगस्त को ही मद्रास के एग्मोर इलाके में शाम को एक विशाल सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी के खाद्य, औषधि एवं स्वास्थ्य मंत्री टी.एस.एस. राजन, एंग्लो-इन्डियन समुदाय से संवाद स्थापित करने में लगे हुए थे। अंग्रेजों के जाने के बाद एंग्लो-इंडियन समुदाय का क्या होगा, यह प्रश्न अनेकों के मन में शंकाएं उत्पन्न कर रहा था।

इस समुदाय को आश्वस्त करते मंत्री महोदय ने कहा कि आपके इस छोटे से समुदाय ने अभी तक उत्तम पद्धति एवं संस्कार दिखाते हुए भारतीय समाज में मिल-जुलकर रहने की शानदार मिसाल पेश की है। आगे भी स्वतंत्रता के पश्चात आपको एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभानी है। काँग्रेस आपका पूरा ध्यान रखेगी।

वैचारिक आग से भरा वीर सावरकर का संबोधन

उधर पूना में हिन्दू महासभा ने एस. पी. कॉलेज पर एक सार्वजनिक सभा आयोजित की थी। देश की वर्तमान परिस्थिति, देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन की घटनाओं पर इस सभा में स्वयं वीर सावरकर अपना भाषण देने वाले थे।

देखते ही देखते सभा में ज़बदरस्त भीड़ हो गई। इसे सच में एक ‘विशाल आमसभा’ कहा जा सकता था।

अपने गरज़दार और वैचारिक आग से भरे भाषण में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा कि, ‘आज देश में जो परिस्थिति निर्मित हुई है, इसके लिए प्रमुखता से केवल काँग्रेस ही नहीं, सामान्य जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है। जनता ने समय-समय पर आंख मूंद कर लगातार काँग्रेस को जो समर्थन दिया, देश का विभाजन उसी की परिणति है। काँग्रेस के नेताओं द्वारा बारम्बार एक ही वर्ग का तुष्टिकरण करने की वजह से यह वर्ग और इसके नेता विभाजन करने में सफल हुए हैं’.

श्रीनगर में दूसरे दिन भी नेशनल कांफ्रेंस के घेरे में गांधीजी

उधर श्रीनगर में गांधीजी की पहली बहुप्रचारित यात्रा का आज दूसरा दिन समाप्त होने जा रहा है। आज का दिन कोई खास महत्त्वपूर्ण घटनाओं से भरा हुआ नहीं था।

सुबह की प्रार्थना के पश्चात गांधीजी के ठिकाने, अर्थात किशोरी लाल सेठी के निवास स्थान, पर अकबर जहाँ अपनी बेटी को लेकर आईं। इस मुलाक़ात में भी उन्होंने गांधीजी के सामने बार-बार यही सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनके शौहर अर्थात शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा किया जाना कैसे और क्यों जरूरी है।

आज के दिन भी गांधीजी के चारों तरफ नेशनल कांफ्रेंस के ही मुस्लिम नेताओं का चुस्त घेरा बना हुआ था। हालांकि आज गांधीजी ने अनेक लोगों से भेंट की, जिसमें हिन्दू नेता भी थे। रामचंद्र काक द्वारा दिए गए निमंत्रण के अनुसार कल, अर्थात 3 अगस्त को गांधीजी, कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से भेंट करने वाले हैं।

दो अगस्त की काली और भयानक रात

आज के दिन भी लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, चटगाँव, ढाका, अमृतसर इत्यादि स्थानों से लगातार हिन्दू-मुस्लिम दंगों की ख़बरें आती रही हैं। जैसे-जैसे रात का अंधेरा गहरा होता जा रहा हैं, वैसे-वैसे सम्पूर्ण प्रदेश के क्षितिज पर आग और धुएं की बड़ी-बड़ी लपटें दिखाई देने लगीं हैं… दो अगस्त की यह काली और भयानक रात ऐसी ही अशांत रहने वाली है…

वे पन्द्रह दिन : 01 अगस्त 1947

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