चले जाओ यहाँ से…

नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीज़न्स (NRC) यह गत तीन दिनों से एक गर्माया हुआ मुद्दा है। संसद और संसद के बाहर घमासान मचा हुआ है।

वास्तव में NRC है क्या?

यह जानने के लिए हमें 67 साल पीछे जाना होगा। स्वतंत्रता के बाद पूर्वी पाकिस्तान से भारत के असम राज्य में बड़े पैमाने पर घुसपैठ शुरू हो चुकी थी और इस खतरे को भांपते हुए वहां के नागरिकों का एक विस्तृत ब्यौरा तैयार किया जाना चाहिए, ऐसी संकल्पनाएँ आने लगी थी।

इसी सन्दर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदु और घटनाक्रम –

हमारे देश की पहली जनगणना सन 1951 में हुयी थी। इस जनगणना में यह रजिस्टर पहली बार तैयार किया गया। इसमें असम में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का विस्तृत ब्यौरा लिखा गया। व्यक्ति का नाम, पिता या पति का नाम, घर का पता, संपत्ति, अर्थोपार्जन के साधन जैसी बातों का समावेश किया गया।

एक बात यहाँ महत्वपूर्ण है कि ऐसा रजिस्टर सिर्फ असम के लिए तैयार किया गया है।

एक बार लिए गए इस अच्छे निर्णय के बेहतरीन परिणामों के लिए इसे समय समय पर अपडेट करना आवश्यक था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आजतक नहीं हुआ।

1971 की लढाई के बाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ। युद्ध के बाद असम में बांग्लादेशी शरणार्थियों की संख्या बढ़ने लगी। डेमोग्राफी बदलने लगी। अनेक आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक समस्याएं मुंह बाये खड़ी थीं।

तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के संज्ञान में यह बातें लायी गयी। इसमें अग्रणी भूमिका निभाई थी असम स्टूडेंट्स यूनियन ने। इस विषय को इंदिरा जी ने गंभीरता से लिया। ‘इललीगल मायग्रन्ट्स’ (डिटरमिनेशन बाय ट्रिब्यूनल) एक्ट 1983, यह कानून संसद में पारित हुआ।

इस कानून के लागू होने से पहले ही इंदिरा गाँधी की हत्या हुई और राजीव गाँधी ने सत्ता सम्हाली।

यह मुद्दा फिर संज्ञान में लाया गया। 15 अगस्त 1985 को असम समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते के अनुसार NRC का समय समय पर अपडेट होना ज़रुरी था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

1998 में असम के तत्कालीन राज्यपाल श्री सिन्हा ने घुसपैठ के ऊपर एक रिपोर्ट तत्कालीन राष्ट्रपति श्री नारायणन के सामने प्रस्तुत की। उस वक़्त की अटल जी की सरकार ने श्री माधव गोडबोले के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन किया। इस ‘टास्कफोर्स ऑन बॉर्डर मैनेजमेंट’ का निष्कर्ष बहुत ही भयावह है।

इसके बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। सरकार श्री सिन्हा की रिपोर्ट के प्रति गंभीर नहीं है, ऐसा सुप्रीमकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए कहा था।

अंततः डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली UPA सरकार ने 2005 में इस रजिस्टर को फिर से अपडेट करने का निर्णय लिया।

कल एक न्यूज़ चैनल ने खुलासा किया है कि यदि समय रहते कदम न उठाये गए तो वो दिन दूर नहीं जब असम में एक बांग्लादेशी मुख्यमंत्री राज करेगा।

पी चिदम्बरम को वीसा के नियमों में और कड़ाई बरतने को कहा गया था। बंगाल भी इस समस्या से अछूता नहीं रहेगा, यह सम्भावना भी श्री प्रणव मुखर्जी ने व्यक्त की थी।

इतना सब होने के बावजूद UPA 1 और 2 के कार्यकाल में कोई कदम नहीं उठाये गए। इसी दौरान 2009 में असम पब्लिक वर्क्स ने NRC अपडेट करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। तब से सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर संज्ञान लिया हुआ है।

यह सब अचानक से सामने आया है। मोदी सरकार ने ध्रुवीकरण के लिए यह सब किया है, ऐसा कहा जा रहा है। लोगों में इस बाबत कोई गलतफहमी न बढ़े इसलिए यह पार्श्वभूमि संक्षेप में बताने का प्रयास किया है।

असम में बीजेपी सरकार आने के बाद वास्तव में यह रजिस्टर अपडेट करने की शुरुआत हुई और उसके बाद का इतिहास सभी को ज्ञात है। यह रजिस्टर 30 जून 2018 तक अपडेट करना था। लेकिन उसके लिए कोर्ट ने एक महीने की मोहलत बढ़ा दी। अर्थात इसमें ढिलाई कोर्ट को भी मंजूर नहीं थी। और यह मसला जल्द से जल्द निपटे ऎसी कोर्ट की मंशा है।

इसके अनुसार 30 जुलाई को पहला ड्राफ्ट तैयार करके संसद में पेश किया गया। इसके अनुसार तकरीबन 40 लाख लोग असम में अवैध रूप से रह रहे है। 28 सितम्बर 2018 तक अपील करने का मौका दिया गया है।

यह देश की सुरक्षा से जुडा मुद्दा है और इसका राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए यह बहुत ही खेदपूर्वक यहाँ बताना चाहता हूँ। 2005 में पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने जो आशंका व्यक्त की थी वो शायद भविष्य में सच भी हो जाये।

प्रणव दा के पास इस खतरे को भांपने की दूरदृष्टि थी यह आज समझ आ रहा है। पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हुयी है और ऐसी आशंका है कि इन घुसपैठियों को मतदान पहचान पत्र भी जारी किये गए होंगे। ममता बनर्जी द्वारा गृहयुद्ध की धमकी देना क्या इसी बात का प्रमाण है?

बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने दो दिन पूर्व ही इस बाबत जोरदार दलील संसद में देते हुए कहा कि राजीव गाँधी द्वारा किये गए समझौते पर कार्यवाही करने की हिम्मत हमारी सरकार ने दिखाई है जो UPA सरकार नहीं कर सकी।

रजिस्टर को समय समय पर अपडेट करके अवैध रूप से रह रहे नागरिकों को देश से बाहर निकलना अत्यंत आवश्यक है, यह कांग्रेस को भी लगता था। इस दिशा में उन्होंने कदम भी उठाये थे, लेकिन इस पर ठोस कार्यवाही न करने से यह एक ऊपरी मरहम पट्टी करने जैसा था।

अवैध नागरिकों को ढूँढकर उन्हें देश के बाहर निकालना ज़रुरी है। यहाँ वैध रूप से रहने वाले नागरिकों की जान और संपत्ति को खतरा होता है। इस परिस्थिति में NRC अपडेट करते रहना, उसके अनुसार उचित कार्यवाही करना, और आगे के प्रोसीजर निश्चित करना ज़रुरी है।

आज भले ही NRC असम तक सीमित हो लेकिन देश के अन्य भागों में भी घुसपैठ हुयी है। इसलिए ऐसे रजिस्टर देश के हर राज्य में तैयार कर कर अवैध रूप से रह रहे नागरिकों से शोले के ठाकुर बलदेव सिंह की तरह खा जाने वाली नज़रों और गरजती आवाज में कहना चाहिए…

“चले जाओ यहाँ से…”

मूल लेखक : आनंद देवधर
अनुवाद : दीप्ति विटवेकर कुलकर्णी

अक्सर बड़ी हिंसा को जन्म देता है, छोटी हिंसा का भय

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