शॉपिंग करने नहीं, बाज़ार में अनुभव या मनोरंजन खरीदने निकलता है आज का उपभोक्ता

एक मित्र ने एक समाचार के बारे में मेरी राय पूछी है जिसके अनुसार भारत सरकार ‘भारतीय’ ऑनलाइन उद्यमों को बढ़ावा देने और ई-कॉमर्स सेक्टर को भारी डिस्काउंट पर माल बेचने के सिस्टम को नियंत्रित करने के लिए ई-कॉमर्स नीति बनाने की तैयारी कर रही है।

पहली बात यह समझिए कि यह समाचार सिर्फ ई-कॉमर्स नीति बनाने के बारे में है। नीति बन जाने से ही ई-कॉमर्स के डिस्काउंट पर रोक नहीं लग सकती। कुछ उदाहरण के साथ समझाने का प्रयास करते हैं।

चलिए अमेज़न तो एक विदेशी कंपनी हुई, लेकिन कल को वही अमेज़न भारत में एक सब्सिडियरी क्रिएट कर देती है जिसका मालिक एक भारतीय है। तब आप क्या करेंगे?

उदाहरण के लिए क्या कोलगेट एक विदेशी कंपनी है या भारतीय कंपनी? क्या प्रोक्टर एंड गैंबल एक विदेशी कंपनी है या भारतीय कंपनी? Suzuki एक विदेशी कंपनी है या भारतीय? Hyundai विदेशी कंपनी है या भारतीय? टाटा एक विदेशी कंपनी है या भारतीय? याद रखिए टाटा की यूरोप में कार और स्टील बनाने की भी फैक्ट्रीज़ हैं।

और जिन ऑनलाइन कंपनियों को आप डिस्काउंट देने से मना करेंगे अगर वह कोर्ट चले गए तब?

ओला और उबर में यात्रा दिल्ली की काली पीली टैक्सी से सस्ती पड़ती है। क्या आप ओला और उबर को बैन कर देंगे?

चलिए सरकार ने कहा कि 31 इंच के टीवी की कीमत यह होगी। अब कंपनी कहती है 42 इंच का TV आपको 31 इंच के दाम पर देंगे। क्या आप उसे ऐसा करने से मना कर देंगे? या फिर कंपनी कहती है कि हम आपको इसी दाम पर HD TV की जगह 4K टीवी देंगे। साथ में बढ़िया एक्सटर्नल स्पीकर भी देंगे। क्या उस पर सरकार एक्शन लेगी?

या फिर ऑनलाइन सेल फोन विक्रेता कहता है कि आप इस ब्रांड का सेल फोन खरीदेंगे तो आपको एक साल जियो का सब्सक्रिप्शन फ्री। क्या आप उस पर रोक लगा सकेंगे?

एक अन्य उदाहरण। जूता बेचने वाला कहता है कि एक जोड़ा जूता खरीदने पर एक जोड़ा जूता मुफ्त। फिर आप क्या करेंगे? या फिर एक किलो दाल खरीदने पर एक किलो चावल मुफ्त। क्या आप इसे डिस्काउंट बोलेंगे या चावल का प्रमोशन या विज्ञापन।

सरकार ने न्यूनतम वेतन की दर तय की हुई है। लेकिन उत्पादों की कीमतें कैसे तय करेंगे? क्या सरकार बतलाएगी कि जूते की कीमत क्या होनी चाहिए? या फिर सेल फ़ोन की, जिसमे हर छः महीने में नया फीचर जैसे कि शक्तिशाली कैमरा, मेमोरी, फ़ास्ट प्रोसेसर इत्यादि के बाद भी दाम वही रहता है?

या फिर आटे की कीमत, चाहे गेंहू शरबती हो, ऑर्गेनिक हो, या फिर बेसन और सोया का मिक्स हो? किस अनुपात में अन्य अनाज का आटा मिक्स होना चाहिए, क्या सरकार इसे निर्धारित करेगी? या फिर, अगर उद्यमी या ऑनलाइन विक्रेता पांच किलो आटे पर एक किलो बेसन फ्री में देना चाहे तब सरकार को क्या करना चाहिए?

कुछ विचार आपके समक्ष रखूँगा (इन प्रश्नों को मै पहले भी उठा चुका हूँ); उत्तर की अपेक्षा है।

अगर पब्लिक पॉलिसी के नज़रिये से देखें तो सरकार की क्या नीति होनी चाहिए?

अब पहला विचार यह है कि सरकार को क्या यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उत्पादकों, व्यवसायियों और दुकानदारों को अधिक लाभ मिले या या उपभोक्ताओं को सस्ता उत्पाद मिले?

दूसरा, किस बिंदु पर उत्पादकों, दुकानदारों और उपभोक्ताओं का हित एक हो सकता है?

तीसरा, क्या सरकार नवयुवक और नवयुवतियों को छोटे और पारम्परिक व्यवसायियों को बचाने के लिए ऑनलाइन उद्यम लगाने से मना कर सकती है?

चौथा, क्या सरकार – या कोई भी राजनैतिक दल या हम स्वयं भी – डिजिटल युग में आने वाले इनोवेशन या नई खोज को रोक सकते हैं?

पांचवां, इस डिजिटल युग में विश्व भर में होने वाले व्यापारों और उद्यमों से कैसे टक्कर लेंगे, अगर हम अपने देश में ही इस युग के विकास पर रोक लगा देंगे?

छठा, कैसे ऑनलाइन विक्रेता और छोटे दुकानदार अपना काम कर सकें, साथ ही इनोवेशन या नई खोज, नए उद्यमों और नवयुवक और नवयुवतियों को भी बढ़ावा मिले?

सातवां, कुछ ही वर्षो में पेट्रोल का उत्पादन करने वाले देशों का एकाधिकार ख़त्म हो जायेगा। क्या हम गैर पारम्परिक ऊर्जा के स्रोतों का उत्पादन बंद कर दें, क्या इलेक्ट्रिक कार मार्केट में ना आने दे, क्यों कि पेट्रोल पंप के मालिक की दुकाने बंद हो जाएगी? इलेक्ट्रिक कार में लगभग 24 मूविंग पार्ट्स या घूमने वाले हिस्से होंगे, जबकि पेट्रोल कार में लगभग 150 होते है। क्या कार मैकेनिक के जॉब चले जाने के डर से भारत में इलेक्ट्रिक कार ना आने दें?

मैं विनम्रतापूर्वक यह कहना चाहूंगा कि इस डिजिटल क्रांति के प्रभाव को आप नहीं रोक सकते हैं। कोई भी सरकार कैसा भी नियम, कानून, नीति बना ले, ना तो डिस्काउंट ना ही इस क्रांति के प्रभाव को रोक सकती है। यह सिर्फ कुछ दुकानदारों के शोर मचाने के कारण एक लॉलीपॉप उछाल दिया गया है जो किसी को भी नहीं मिलने वाला।

बेहतर यह होगा कि इस क्रांति के अनुरूप अपने आप को ढालने का प्रयास करें, उपभोक्ताओं के बदलते टेस्ट को समझने की कोशिश करें। अब उपभोक्ता शॉपिंग करने नहीं निकलता, बल्कि बाजार में अनुभव या मनोरंजन खरीदने निकलता है।

शॉपिंग चाहे दूध, चाय की पत्ती, तेल की हो, या टेलीविजन की, यह डिजिटल युग के उपभोक्ता के लिए एक मनोरंजन है, मन बहलाने और अनुभव का साधन है, ना कि घर की आवश्यकता को पूरा करने की प्रक्रिया।

अगर आपकी दुकान के आसपास उचित पार्किंग की व्यवस्था नहीं है, बाहर गंदगी है, मक्खी भिनभिनाती है, आप ग्राहक को बादशाह होने का अनुभव नहीं दे सकते तो आप भूल जाइए कि वह रिटेल से शॉपिंग करेगा।

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