‘अवसाद’ नाम का FMCG

अवसाद बिकता बहुत है, इसलिए उसे “फ़ास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड” मानने में किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। नमूने के तौर पर प्रेमचंद के फटे जूते ही देख लीजिये! उनकी साहित्यिक उपलब्धियां नहीं, उनके जन्मदिन पर उनके फटे जूतों की कहानी बेची जाती है। चलती भी खूब है! फटे जूते दिखाकर किस्सागो यूँ समां बांधते हैं कि जैसे उनके जूतों के फटे होने का जिम्मेदार श्रोता-पाठक ही हो। उसकी गलती ना होती तो आखिर प्रेमचंद को फटे जूते क्यों पहनने पड़ते? हमें वो तस्वीर देखते ही “जूतों से दाल परोसने” वाली कहावत याद आ जाती है। हम जूतों में परोसी गयी दाल चखने से इनकार कर देते हैं।

अवसाद बिकते देखना हो तो हिंदी फिल्मों के गाने भी देख लीजिये। खुशनुमा हों, प्रेम, देशभक्ति, बच्चों के लायक गाने हों, कोई भी उतने लम्बे समय नहीं चलते जितने दर्द भरे गीत चल जाते हैं। एक मशहूर लघु-कथा “एस्ट्रोलॉजर्स डे” का ज्योतिषी अपने हर ग्राहक को कहता था कि उसे उसकी मेहनत का पूरा नतीजा नहीं मिल पाता, लोग उसके साथ न्याय नहीं करते। ये ऐसा वाक्य है जिससे सभी सहमती जता देंगे। बिहार के दोनों ब्रजेश (एक नेताजी जिसके पक्षकार का भाई होने के कारण उसकी करतूत पर बात नहीं होती और दूसरा बाल आवास वाला) जैसे अपराधी भी इस वाक्य पर हाँ कह देंगे।

दर्द भरे गानों में भी शायद सबको अपना ही दर्द नजर आने लगता है। ऐसे ना हो तो फिल्मों का चलना, हिट होना देख लीजिये। बरसों की मेहनत और लागत से बनी मीना कुमारी की फिल्म “पाकीज़ा” जब आई तो फ्लॉप हो गयी थी। मीना कुमारी की मौत पर लोग उनकी आखरी फिल्म देखने निकले, और मौत के गम में फिल्म हिट हो गयी!

आज के दौर की नायिका कंगना राणावत की तारीफ में बिछे फेमिनाज़ी उनकी तुलना अक्सर मीना कुमारी से भी करते पाए जाते हैं। हमारे ख़याल से ये ज्यादा दिन नहीं चलेगा, क्योंकि हाल में कंगना ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर दी है। अब शायद वो “अछूतों” में डाल दी गयी होंगी।

मीना कुमारी का “ट्रेजेडी क्वीन” का तमगा शायद कंगना पर इसलिए भी फिट आ जाता है क्योंकि उन्होंने हाल ही में “क्वीन” नाम की एक फिल्म की थी। कहना तो नहीं होगा कि ये फिल्म क्या बेच रही थी? असली वाली ट्रेजेडी क्वीन के जन्मदिन पर उनके जीवन पर लिखी विनोद मेहता की किताब भी फिर से निकाली जा रही है।

सत्तर के दशक की शुरुआत में जब उन्होंने ये किताब लिखी तो वो फिल्म जर्नलिस्ट भी नहीं थे। अपनी किताब के लिए चार महीने खोज-बीन करते हुए वो ड्राईवर, बावर्ची, नाई, मेकअप आर्टिस्ट जैसे लोगों से मिलते रहे और मीना कुमारी के बारे में काफी अनोखी जानकारियां जुटाई। अदाकारों पर लिखी किताबें कम बिकती हैं, मगर ये ऐसी थी जो अच्छी बिकती भी रही (https://amzn.to/2Arn06q)

माहज़बीन बानो के पिता अली बख्श सुन्नी मुसलमान थे। उन्होंने रविन्द्रनाथ ठाकुर की एक बहुत दूर की रिश्तेदार प्रभावती देवी से दूसरी शादी की थी। शादी के लिए इसाई प्रभावती ने मजहब बदला और वो इकबाल बेगम हो गयी। गरीब पारसी थिएटर के ये कलाकार चाहते थे कि बेटा हो मगर जब दूसरी बेटी हुई तो उसे अली बख्श एक अनाथालय के बाहर छोड़ आये। कहते हैं थोड़ी देर बाद वो उसे वापस ले आये, और यही लड़की बाद में मीना कुमारी बनी। चार साल की उम्र में उन्होंने फिल्मों में बेबी मीना नाम से काम करना शुरू कर दिया था और उन्हें इस बात का बड़ा गर्व था कि वो बचपन से ही अपने परिवार के लिए कमाती थीं।

इतनी कम उम्र से फिल्मों में काम करने की वजह से वो कभी ढंग से स्कूल नहीं जा पायीं। उन्होंने पढ़ना लिखना ज्यादातर खुद ही सीखा था। अपने समय के कई साहित्यकारों से उनकी दोस्ती थी, खुद भी नाज़ के नाम से लिखती थीं। विजय भट्ट जिन्होंने उन्हें बचपन में पहली बार काम दिया था, उन्ही की फिल्म बैजू बावरा (1952) माहज़बीन बानो को सबसे ज्यादा प्रसिद्धि दिला गयी। 1946-52 के दौर में उन्होंने और भी कई फ़िल्में की थीं, मगर वो कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ पायीं। “बैजू बावरा” के गीत “मोहे भूल गए सांवरिया” में अब भी नजर आ जाती हैं। सन 51 के ही दौर में उनकी मुलाकात कमाल अमरोही से भी हुई, जिन्होंने करीब बीस साल में “पाकीज़ा” बनाई और जिससे उन्होंने बाद में शादी की थी।

ऐसा कहते हैं कि “ट्रेजेडी किंग” कहलाने वाले युसुफ उर्फ़ दिलीप कुमार भी मीना कुमारी के आगे ठहर नहीं पाते थे। उनके साथ के कलाकारों में एक धर्मेन्द्र के अलावा सभी मीना कुमारी के बारे में बात करते हैं। कहते हैं धर्मेन्द्र का कुछ छह महीने से तीन साल के बीच मीना कुमारी से प्रेम प्रसंग रहा था। इतना धर्मेन्द्र को सुर्ख़ियों में ला देने के लिए तो काफी था।

कमाल अमरोही ने शादी के बाद माहजबीन को काम इस शर्त पर करने दिया था कि वो अपने मेकअप रूम में किसी को घुसने नहीं देंगी और साढ़े छह बजे अपनी कार से घर लौटेंगी। मीना कुमारी ये शर्ते पूरी करती हैं या नहीं, ये जांचने के लिए उनका जासूस, बाकर अली, “साहेब बीवी और गुलाम” के सेट पर भी मौजूद रहता था।

सन 1963 तक वो नींद ना आने की बीमारी की शिकार हो चुकी थी और डॉ.सईद तिमुर्ज़ा ने उन्हें ब्रांडी पीने की सलाह दी। ये फिर शराब की लत में बदल गयी। एक बार (1964 में) गुलज़ार को कमरे में ले जाने के कारण बाकर अली ने माह्ज़बीन को थप्पड़ भी जड़ दिया था। हालाँकि हलाला के नाम पर सेक्युलर चुप्पी छा जाती है, मगर “द क्विंट” की मानें तो तलाक़ के बाद उन्होंने जीनत अमान के पिता, अमान-उल्ला खान से एक महीने के लिए निकाह किया और फिर तलाक़ लेकर कमाल अमरोही से दोबारा निकाह किया था। शराब की लत के कारण उन्हें लीवर सिरोसिस हो गया था। माह्ज़बीन बानो उर्फ़ मीना कुमारी की मौत भी शराब की लत और लीवर सिरोसिस से ही हुई।

वो अपने दौर में सबसे महंगी हीरोइन थी। वो इम्पाला कार खरीदने वाली पहली हीरोइन भी थी। अपने दौर में वो इतनी शक्तिशाली थी कि नायकों को बना और मिटा सकती थी। धर्मेन्द्र ही नहीं, राजेन्द्र कुमार और सुनील दत्त के स्टार बनने में भी उनका बड़ा हाथ रहा।

लिखने के अलावा उन्होंने कई फिल्मों में गाने भी गाये। उनका गाया गाना पाकीज़ा फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुआ, मगर बाद में पाकीज़ा – रंग बरंग नाम के एक एल्बम में आया था। उनकी मौत के बाद “तनहा चाँद” नाम से उनकी कविताओं का संकलन गुलज़ार ने किया था। मीना कुमारी के नाम से भारत का डाक विभाग एक स्टाम्प भी जारी कर चुका है। आज गूगल डूडल भी ट्रेजेडी क्वीन पर बना हुआ है।

अवसाद बिकता तो है!

दम है रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे…

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