100 दिन के रिजेक्शन से क्या सीखा मैंने : Jia Jiang

The most effective way to overcome fear of rejection is to face it. Jia Jiang shares the 5 lessons he learned during 100 days of rejection.

जब मैं 6 साल का था, मेरी टीचर को एक गज़ब आइडिया सूझा। वह चाहती थीं कि हमें गिफ्ट पाने का तजुर्बा हासिल हो, लेकिन इससे पहले उनकी इच्छा थी कि हम एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट देने का गुण भी सीखें। टीचर हमारे लिए गिफ्ट लेकर आईं और क्लासरूम के एक कोने में रख दिए। फिर उन्होंने कहा कि हम सब एक-दूसरे के बारे में कुछ अच्छा बोलें और अपना गिफ्ट उठाकर ले जाएं। हम सब बहुत खुश हुए।

क्लास में 40 बच्चे थे। बारी-बारी से सबका नाम बुलाया जाने लगा। धीरे-धीरे 40 में से 20, फिर 10 बच्चे गिफ्ट पाने के लिए रह गए। फिर 5 और इसके बाद 3। मैं उनमें से एक था। लेकिन जब मेरी बारी आई तो मेरे लिए अच्छा बोलने वाला कोई नहीं था। मैं रोने लगा। टीचर ने कहा कि क्या कोई है, जो इसके बारे में कुछ अच्छा बोलना चाहता है। कोई सामने नहीं आया। लेकिन टीचर ने मुझे गिफ्ट लेने से रोका नहीं। उन्होंने कहा कि हम सब अपने गिफ्ट ले जाएं और आगे कुछ अच्छा करें ताकि अगले साल लोग हमारे बारे में अच्छी-अच्छी बातें करें।

उस दिन मुझे बहुत बुरा लगा। मैं खुद को जीवन में दोबारा उस हालत में कभी नहीं देखना चाहता था, पब्लिक में सबके सामने रिजेक्ट कर दिए जाने वाले शख्स के तौर पर। 8 साल बाद हमारे यहां बिल गेट्स आए। मैंने उनका संदेश देखा। मुझे उनसे प्यार हो गया। मुझे ऐसा लगा मानो मुझे पता चल गया कि आगे मुझे करना क्या है? मेरी उम्र उस समय 14 साल थी। उस रात मैंने अपने परिवार को एक चिट्ठी लिखी। मैंने लिखा कि 25 साल का होते-होते मैं दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बनाऊंगा और वह कंपनी माइक्रोसॉफ्ट को खरीद लेगी। इस चिट्ठी का एक ही सार था। मैं दुनिया जीत लूंगा। दो साल बाद मुझे अमेरिका जाने का मौका मिला। मैं उछल पड़ा क्योंकि यहां बिल गेट्स रहते थे।

मुझे लगा कि एक ऑन्ट्रप्रनर के तौर पर मेरा सफर शुरू हो रहा है। फिर 14 साल गुजरे और मैं 30 साल का हो गया। मैं माइक्रोसॉप्ट खरीद नहीं पाया। माइक्रोसॉप्ट खरीदना तो दूर, मैं अपनी कंपनी भी शुरू नहीं कर पाया। सच पूछिए तो मैं एक फॉर्च्यून 500 कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर था। मैं अटक गया था। कहां गया वह लड़का जिसने 14 साल की उम्र में वह चिट्ठी लिखी थी। ऐसा नहीं था कि मैंने कोशिश नहीं की थी। मैंने बहुत कुछ नया करने की कोशिश की, नए प्रपोज़ल बनाए, लोगों के सामने बोलने की कोशिश की, अपने काम में कुछ नया किया। लेकिन हर बार मैं दुनिया जीतने वाले उस 14 साल के बच्चे और 6 साल के उस बच्चे के बीच फंसकर रह गया, जिसे रिजेक्ट होने का डर था। हर बार वह 6 साल का बच्चा जीत जाता था।

रिजेक्ट होने का डर

मेरे अंदर यह डर तब भी मौजूद था, जब मैंने अपनी कंपनी शुरू की। जब मैं ऑन्ट्रप्रनर था तो मैंने निवेशकों के लिए प्रपोजल तैयार किया लेकिन उसे ठुकरा दिया गया। रिजेक्शन से मुझे बहुत ठेस पहुंची। मन तो ऐसा किया कि सब कुछ छोड़-छाड़ दूं। फिर मुझे लगा कि अगर बिल गेट्स की तरह बनना है तो एक बेहतर लीडर बनना पड़ेगा। मैं हर बार अपने अंदर के उस रिजेक्टेड 6 साल के बच्चे को जीतने नहीं दे सकता।

फिर मैंने इंटरनेट पर सर्च की, साइकॉलजी के आर्टिकल पढ़े और अपने अंदर के इस डर को जीतने की कोशिश की। एक दिन मुझे इंटरनेट पर एक वेबसाइट rejectiontherapy.com दिखी, जिसने मुझे जीवन जीने का नया रास्ता दिखा गया। इसे रिजेक्शन थेरपी नाम दिया गया जिसमें आपको 30 दिनों तक बाहर जाना था, सिर्फ रिजेक्ट होने के लिए। आखिर में आप खुद को रिजेक्ट किए जाने के डर से बेअसर कर लेते हैं। आपके ऊपर ठुकराए जाने का कोई फर्क नहीं पड़ता। मैंने उस टास्क में बदलाव किया और उसे 30 दिन की जगह 100 दिनों तक करने का टारगेट बनाया। साथ ही, उसका विडियो बनाकर एक विडियो ब्लॉग शुरू करने का फैसला किया।

पहले दिन मैंने किसी अजनबी से अपने ऑफिस के नीचे 100 डॉलर उधार हासिल करने की कोशिश की। मैं बंदे से डॉलर मांगने के लिए जब बढ़ा तो दिल धकधक कर रहा था और हाल बुरा था। फिर भी हिम्मत करके मैंने डॉलर मांग ही लिए। उसने मना कर दिया और पूछा क्यों?

मेरे पास इसका जवाब नहीं था। मैंने ‘सॉरी’ कहा और वहां से भाग खड़ा हुआ। बाद में जब रात में घर आकर अपना वीडियो देखा तो पाया कि उस बंदे ने मुझसे पूछा था: क्यों? इस तरह उसने मुझे अपनी बात रखने का मौका दिया। मैं बहुत कुछ बोल सकता था, उससे बात कर सकता था। लेकिन मैंने कुछ नहीं किया। बस वहां से भाग गया। मुझे अपनी कमज़ोरी का पता चला। मैं अपने रिजेक्शन से डर रहा था। जैसे ही रिजेक्ट होने का हल्का-सा डर लगा, मैं उस चीज से पीछा छुड़ाकर भागना चाहता था। अगले दिन मैं एक बर्गर जॉइंट पर गया। वहां मैंने बर्गर रिफिल मांगा। काउंटर पर मौजूद शख्स हैरानी में पड़ गया कि बर्गर रिफिल क्या होता है? मैंने उसे अपने तरीके से समझाने की कोशिश की। मेरी बात बनी नहीं लेकिन काफी सारी बात हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस दिन मैं वहां से भागा नहीं था।

रोज़ नया करने की कोशिश

इस तरह रोज़ मैं नई जगह पर जाता और कुछ नया करने की कोशिश करता। एक डोनट शॉप पर मैंने ओलिंपिक के निशान वाला डोनट मांगा। उन्होंने कहा कि नहीं है। मैंने उन्हें तरीका बताया कि 5 डोनट को जोड़कर ऐसा करना मुमकिन हो सकता है। 15 मिनट बाद डोनट मेरे सामने था। यह वीडियो जब मैंने ब्लॉग पर डाला तो कुछ ही घंटे में इसे लाखों लोगों ने देखा।

इस तरह अपने रिजेक्शन के 100 दिनों को मैंने अपना प्लेग्राउंड बना लिया। उसे रिसर्च का एक प्रोजेक्ट बना लिया। मैं देखना चाहता था कि रिजेक्ट कर दिए जाने से मैं क्या सीखता हूं? मैंने ‘ना’ को ‘हां’ बनाना सीख लिया था। उसके लिए एक जादुई शब्द मुझे मिल गया – क्यों।

एक दिन इसी तरह मैं एक पौधा लेकर एक अजनबी के घर पहुंच गया। मैंने उससे कहा कि मैं आपके घर पर यह पौधा लगाना चाहता हूं। उसने मना किया। मैंने पूछा: क्यों? उसने कहा कि घर में कुत्ता है, जो पौधा खराब कर देगा। मैं उसकी वजह समझा और उसके सुझाव पर पड़ोस के दूसरे घर में पौधा लगा आया। अगर उस दिन मैंने क्यों नहीं पूछा होता और सिर्फ ना सुनकर लौट गया होता तो वह पौधा मैं उनके पड़ोस में नहीं लगा पाता।

रिजेक्शन को पहचान बनाएं

मैंने अपने अनुभव से यह पाया कि जो लोग वाकई दुनिया में कुछ बदलाव लाते हैं या फिर लोगों के जीने के तरीके को बदलते हैं, वे वही होते हैं जिन्हें शुरुआती दौर में बुरी तरीके से ठुकराया गया हो। आप महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला या फिर जीसस क्राइस्ट के उदाहरण से समझ सकते हैं। लेकिन रिजेक्शन को इन लोगों ने अपने पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपने रिजेक्शन को अपनी पहचान बना लिया। उन्होंने रिजेक्शन को आत्मसात कर लिया। हमें रिजेक्शन से सीखने के लिए उनकी तरह नहीं बनना है। मुझे ठुकराए जाने ने इसलिए बहुत परेशान किया क्योंकि मैं उससे डरकर भाग रहा था। लेकिन फिर मैंने रिजेक्शन को अपना बनाना शुरू कर दिया। उसे मैंने अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा बना लिया। मैंने लोगों को बताना शुरू किया कि रिजेक्शन को मौका कैसे बनाए जाए?

जीवन में जब आप ठुकराए जाते हैं या नई मुश्किल का सामना कर रहे होते हैं या नई नाकामी झेल रहे होते हैं तो संभावनाओं को तलाशिए। भागिए मत। तब ये नाकामियां आपके लिए तोहफा हो सकती हैं।

(लेखक, ब्लॉगर, ऑन्ट्रप्रनर जह जहांग ने किताब ‘रिजेक्शन प्रूफ’ लिखी है, जिसमें नाकामी से लड़कर विजेता बनने के गुर सिखाए गए हैं।)
अनुवाद: प्रियंका सिंह

– राजेश मित्तल के सौजन्य से

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