व्यंग्य : बकरी सशक्तिकरण वक़्त की ज़रूरत, बनाया जाए बकरी आयोग

अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अल्पसंख्यक आयोग है। दलितों पिछड़ों के लिये पिछड़ा आयोग है।

बच्चों के हितों की सुरक्षा के लिये बाल आयोग है। महिलाओं के लिए महिला आयोग है।

बकरियों की सुरक्षा कैसे होगी?

मोदी जी को इस विषय पर ध्यान देना चाहिए।

एक बकरी आयोग की स्थापना होनी चाहिए।

बकरी सशक्तिकरण (Empowerment) आज वक़्त की ज़रूरत है।

अगर बकरियों पर ध्यान न दिया गया तो ये प्रजाति लुप्त हो जाएगी।

अब लगता है कि बकरी रक्षा आंदोलन करना पड़ेगा…

हिन्दू वीरों पर महती जिम्मेवारी आन पड़ी है…

पहले गौरक्षक गुंडे कह के निंदा होती थी… अब बकरी रक्षा की जिम्मेवारी भी हमारे नाजुक कंधों पर आन पड़ी है…

बकरी रक्षक दल को बड़ी समझदारी से काम लेना होगा… कानून अपने हाथ में नहीं लेना है।

अखलाक, पहलू खान, रकबर खान की गौरवशाली परंपरा में कुछ और नाम नहीं जुड़ने चाहिए।

उधर मुसलसल ईमान रखने वाली मोहतरमाओं ने मांग की है कि बकरियां उनके काम मे हाथ बंटाती हैं… मोहतरमाओं का काफी कार्यभार बकरियों की तरफ divert हो जाता है…

बक़रीज़ आर ए ग्रेट हेल्प… जे हमारा अंदरूनी मामला है… हम सरकार को चेतावनी देती हैं कि हमारे अंदरूनी, ज़ाती, धार्मिक मामलों में दखलंदाज़ी न करें… हर पीसफुल आदमी का ये फ़र्ज़ है कि वो बकरियों के साथ मोहब्बत से पेश आये… बकरियों से प्रेम करना हमारा दीनी फ़र्ज़ है।

मोहतरमाओं का ये कहना है कि बकरियां हमारी छोटी बहनों की माफिक हैं। हमारा बकरियों से रिश्ता 1400 साल पुराना है। सदियों से बकरियां हमारे काम में हाथ बँटाती आयी हैं। इसलिए मोदी सरकार से गुज़ारिश है कि बकरियों के मुआमले में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें।

उधर समाजशास्त्रियों का ये कहना है कि बकरियों की निगरानी करने से मोहतरमाओं की सामाजिक स्थिति में तेज़ी से सुधार होगा। आजकल तो भाई जान लोग ज़रा ज़रा सी बात पर TTT बोल के बकरी ले आते हैं। अगर बकरियों के हक़ो हुक़ूक़ का ध्यान रखा जाए तो TTT में कमी आएगी।

उधर एक भाईजान ने दारू ल उल्लू म से ये सवाल किया है कि एक सच्चा मुसलमान एक साथ कितनी बकरियां पाल सकता है? क्या सिर्फ 4 बकरियाँ पालने जैसी कोई बंदिश है?

मने अगर पहले से शादी शुदा है तो अब सिर्फ 3 ही पाल सकता है?

क्या हर भाई की अलग बकरी होनी चाहिए?

अब्बू की बकरी को घर में क्या दर्जा हासिल होगा?

ऐसे बहुत से सवालात हैं जिनका जवाब मिलना अभी बाकी है।

वरुण जायसवाल की टिप्पणी :

एनिमल सेक्स कमोबेश दुनिया भर में हर समुदाय के लोग करते रहे हैं, पर सिवाय इस्लामिक विद्वानों के कोई भी अन्य इसको जस्टिफाई करता हुआ नहीं दिखता, हदीसों और परम्पराओं के आधार की आड़ नही लेता।

सोशल मीडिया पर उड़ाये जा मजाक और आलोचना का यही केंद्र बिंदु है। इस्लामपरस्ती में ऐसी घृणित हरकत को लेजिटिमेसी (वैधता) देने का फ़ल तो भुगतना ही होगा।

गांधी की बकरी मोदी से करे पुकार

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