अस्तित्व को निगलने आ रहे दावानल से परिचित हुई दिशाभ्रम में जी रही नस्ल

देश के सामने जो नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न असम की जो फाइनल रिपोर्ट रखी गयी है, वह यही बता रही है कि असम का नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन, एक ऐसी बोतल साबित हुआ है जिसमें से 33 वर्षो से बन्द जिन्न बाहर निकल आया है।

यह जो जिन्न है, कोई साधारण जिन्न नहीं बल्कि यह भारत के सेक्युलर राजनैतिक दलों जिसमें मूलतः कांग्रेस व वामपंथी दल शामिल हैं, की वे अवैध औलादों हैं जिन्हें अवैधानिक तरीके से भारत को वैध मनवाये गये, बंगलादेशी/ रोहंगिया मुसलमान हैं।

कल जब नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न असम की फाइनल रिपोर्ट भारत के सामने रखी गयी, तो उसमें इनकी गिनती करीब 40 लाख आयी है जो असम की कुल जनसंख्या के 13.5% है।

अब तक भारत की सरकार से जो संकेत आ रहे हैं उससे यही लग रहा है कि जिन लोगों को भारतीय नागरिक नहीं माना गया है, उनको 2 महीने का एक अंतिम अवसर मिल रहा है कि वे अपने भारत का नागरिक होने को प्रमाणित करें और बंग्लादेश व म्यांमार से बात कर उन्हें भारत से निकाला जायेगा।

इस विषय पर मैं लोगों के लेख व प्रतिक्रियाएं देख रहा हूँ और जहां इस को लेकर लोगों मे उत्साह का एक नया संचार देख रहा हूँ, वहीं पर चिर परिचित शैली में कुछ को उदास व भविष्य में होने वाली घटनाओं को लेकर नकारात्मकता के अहसास में डूबा पा रहा हूँ।

जो उत्साहित हैं उनको इस बात की प्रसन्नता है कि भारत में अवैध रूप से घुस आये बंगलादेशी व रोहंगिया भारत से निकाले जायेंगे, और जो दुःखी हैं वो या तो इसलिये दु:खी हैं क्योंकि उनको इन अवैध घुसपैठियों में सिर्फ उनका मुस्लिम होना दिख रहा है।

यह उनके बनाये गये वोट बैंक का मामला उड़ता हुआ दिख रहा है, या फिर इस लिये कि उनको 40 लाख की संख्या कम लग रही है और यह मनवाने के लिये ही बैठे हैं कि मोदी की नालायक सरकार, कुछ नहीं कर पायेगी!

मेरे लिये, वर्तमान में इन अवैध घुसपैठियों के मुस्लिम होने कारण समर्थन करने वालों का दुःखी व आक्रोशित होना बिल्कुल समझ में आता है, लेकिन एनआरसी असम द्वारा 40 लाख अवैध नागरिकों के चिह्नित किये जाने के बाद, आगे की घटनाओं का नकारात्मक पूर्वानुमान लगा कर निराशा में घिरे रहना बिल्कुल समझ में नहीं आता है।

मेरे लिये तो यह मील का पहला पत्थर है और मुझ को गर्व है कि नरेंद्र मोदी सरकार व बीजेपी में यह साहस है कि जिस काम को बहुत पहले होना था, उसको उन्होंने एक पड़ाव तक पहुंचाया है।

इस काम की शुरुआत तो भारत के कांग्रेसी प्रधानमंत्री स्व राजीव गांधी द्वारा 14 अगस्त 1985 को असम समझौते के साथ की थी, लेकिन मुस्लिम वोट बैंक की चिंता में उसे छोड़ दिया था।

कांग्रेस के साथ वामपंथियों ने इन्ही बंग्लादेश और फिर बाद में म्यांमार के रोहंगिया मुसलमानों को अवैध रूप से पेशेवर तरीके से सीमावर्ती राज्यों में बसा कर, डेमोग्राफी बदलने के लिये उपयोग किया है।

क्या लोगो को इस बात का संतोष नहीं है कि 33 वर्षो से एक रुके हुये काम को वैधानिक रुप से एक स्थूल शक्ल दी है?

मेरे लिये यह अंतिम परिणाम का अंतिम चरण नहीं है बल्कि अंतिम परिणाम का प्रथम चरण है। लोग आज एनआरसी असम द्वारा दी गयी सँख्या को बहुत सीमित दृष्टिकोण से देख रहे हैं जबकि इसके दूरगामी परिणाम आयेंगे।

असम से हुई शुररुआत निश्चित रुप में अन्य राज्यों में फैलेगी और सेक्युलर राजनैतिक दल, हिन्दू समुदाय को जातिगत आधार पर और फाड़ कर, आगामी वर्षों में पूरे भारत मे घुसपैठ किये/ कराए गए अवैध बंगलादेशी/ रोहंगिया के मामले को सीधा-सीधा हिन्दू मुस्लिम बनाने का वीभत्स प्रयास करेंगे।

सेक्युलर राजनैतिक दलों के द्वारा बनाई गई यह ऐसी भीड़ होगी जिससे उनकी अपेक्षा होगी कि वो हिंदुत्व व राष्ट्रवादी विचारधारा पर हिंसक कुठाराघात करे। इस क्रम में सेक्युलर वर्ग के लिये भारत यदि जलता है तो जले, क्योंकि यह उनकी प्राथमिकता नहीं होगी।

ऐसी संभावना में यदि भारत जले तो जले, लेकिन जल कर, तप कर सोना बन निकले, यह प्राथमिकता हमारी होनी चाहिये। यह प्राथमिकता हम हिन्दुओं और राष्ट्रवादी भारतीयों की है क्योंकि भारत कोई सराय या मानवाधिकार का दफ्तर नही है, जहां बंगलादेशी/ रोहंगिया अपना अधिकार मान लें… यह हमारा है।

आज इसकी चिंता मत कीजिये कि भारत की सरकार कैसे इन अवैध बंगलादेशियों और रोहंगियाओं को निकालेगी, आज इसकी चिंता कीजिये कि इस वर्तमान की मोदी सरकार ने हम लोगों को जो नई नई भयानकता से परिचय कराया है, उससे अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये हम कितने निकलेंगे?

मेरे लिये मोदी की सरकार की सबसे बड़ी सफलता यही है कि उसने 70 वर्षो से दिशाभ्रम में जिये जा रही नस्ल को उसके अस्तित्व को निगलने आ रहे दावानल से परिचय करा दिया है।

आज मोदी की सरकार ने जगाया है तो बिस्तर से उठ कर खड़े होने की जिम्मेदारी हमारी है, सरकार की नहीं है। इसलिये नकारात्मकता और संदेह का त्याग कर के साथ जुटिये और 2019 को जीतते हुए, आगे के संभावित युद्ध के लिये तैयार रहिये।

अक्सर बड़ी हिंसा को जन्म देता है, छोटी हिंसा का भय

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