एक आम जर्मन का राष्ट्रवाद

फ़ुटबाल मेरा पसंदीदा खेल है। यूं तो यह टीम गेम है मगर तालमेल के साथ खेलते हुए भी किसी किसी खिलाड़ी की आक्रामकता मुझे रोमांचित करती है।

यह पावर गेम है जहां व्यक्तिगत ऊर्जा का विशेष महत्व है, ऐसे में हरेएक प्लेयर का स्टेमिना लाखों-करोड़ों दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करता है।

विश्वस्तर पर हिन्दुस्तान यह खेल खेलता नहीं, अतः जर्मनी मेरी पसंदीदा टीम है। और मैं इसका हर खेल पिछले तीन वर्ल्ड कप से देख रहा हूँ। इसके पहले ब्राज़ील और उसके पहले अर्जेंटीना मेरी पसंदीदा टीम हुआ करती थी।

आजकल जर्मनी को पसंद करने के अनेक कारण हैं, जिसमें से एक है कि यह बिना स्टार वाली एक सफल और संतुलित टीम रही है। इसमें तीन चार खिलाड़ी ऐसे हैं जो अपने गेम के कारण पहचाने जाते हैं। मेरी निगाहें उन्हें हर खेल में फॉलो करती रही हैं। वे हैं, मूलर, क्लोसे, ओज़िल और फिलिप।

आप सोच रहे होंगे कि विश्व कप 2018 तो खत्म हो गया और जर्मनी तो ग्रुप मैच में ही बाहर हो गई थी, फिर मैं इतने दिनों बाद इसकी चर्चा लेकर क्यों बैठ गया।

हुआ यूं कि इस बार जब जर्मनी हर मैच में संघर्ष करते हुए हार रही थी तो एक खिलाड़ी के कमज़ोर प्रदर्शन की ओर मेरा ध्यान गया था।

आज आप शायद यकीन ना करें मगर यह सच है। आप यूट्यूब पर देख सकते हैं। इस बार पूरे टूर्नामेंट में ओज़िल के खेल में मुझे वो बात नज़र नहीं आ रही थी।

मैं हैरान हो रहा था कि जर्मनी के एक आक्रमक मिडफील्डर को यह क्या हो गया है। वो निष्क्रिय नज़र आता था। उसका तालमेल टीम के साथ नहीं दिख रहा था। वो थकाहारा और अलगथलग सा लगता।

अंतिम ग्रुप मैच में तो मुझे लगा कि इसे खिलाया ही क्यों जा रहा है। उस समय मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था मगर पिछले दिनों के घटनाक्रम ने मुझे अंदर तक हिला दिया।

पिछले दिनों ओज़िल ने जर्मनी टीम का साथ छोड़ा और अंतर्राष्ट्रीय फ़ुटबाल से भी संन्यास ले लिया। यूं तो एक से एक महान खिलाड़ी हार के बाद संन्यास लेते रहते हैं, मगर यह सामान्य रूप से लिया गया फैसला नहीं है और ओज़िल यहां विश्व स्तर पर चर्चा में ज़रूर हैं मगर गलत कारणों से।

सुन-पढ़ रहे हैं कि ओज़िल तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप एड्रोगन के साथ तस्वीर खिंचाने को लेकर जर्मनी में आलोचना के शिकार हुआ। बात इतनी बढ़ गई कि अंत में उन्हें व्यथित होकर संन्यास का फैसला लेना पड़ा।

और यह विश्व में एक बड़ी खबर बनी। इतनी कि इसे हिन्दुस्तान की मीडिया ने भी अपने यहां जगह दी। मगर मात्र एक फोटो के चक्कर में किसी को संन्यास लेना पड़े, बात गले नहीं उतरती। इसके पीछे कुछ तो ऐसा ज़रूर होगा जो बात इतनी बढ़ गई।

जब इस खबर को मैंने ध्यान से पढ़ा तो जो जानकारी हाथ लगी उसने मुझे यह लेख लिखने के लिए बाध्य किया।

पता चला कि मेसुत ओज़िल मूलतः तुर्की से हैं और अपने धर्म से जुड़े हुए मुस्लिम हैं। ये दो तथ्य ही इस कहानी के केंद्र में हैं और कारण भी।

जर्मनी में जन्मे ओज़िल तीन पीढ़ियों से यहां हैं। ओज़िल जर्मनी की तरफ से तीन तीन वर्ल्ड कप खेल चुके हैं और 2014 के विश्वकप विजेता टीम के वे अहम सदस्य भी रहे हैं।

इतने सफल खिलाड़ी के साथ इस घटनाक्रम का होना हैरान करता है। और हैरान होना स्वाभाविक है, मुझ जैसा फ़ुटबाल प्रेमी जो आप के खेल के कारण आपको जानता था अब आप को इस घटनाक्रम के कारण याद रखेगा। मैं ही नहीं, पूरी दुनिया भी।

लेकिन आज मैं जर्मन फ़ुटबाल प्रेमियों के दर्द को समझ सकता हूँ, जब मेरे जैसा एक निष्पक्ष दर्शक आप के खेल में निष्क्रियता का भाव देख रहा था तो जर्मनी के दर्शकों पर आप के खेल को लेकर क्या बीती होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है।

मैं तो उपरोक्त घटनाक्रम और उसकी पृष्ठभूमि को नहीं जानता था जबकि एक आम जर्मन इन सब बातों से भलीभांति परिचित था।

ओज़िल कहते हैं कि उनके फोटो खिंचवाने को किसी राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। मैं भी मानता हूँ कि यह कोई कारण ही नहीं। दुनिया में हर प्रवासी अपने मूल देश के राष्ट्राध्यक्ष और प्रमुखजन के साथ मिलकर फोटो खिंचवाता है और बतियाता भी है।

आम से लेकर खास यह करते रहे हैं, इसमें कोई नई बात नहीं। लेकिन अगर आप आलोचना का शिकार हो रहे हैं तो कोई कारण तो ज़रूर होगा। बिना आग के धुंआ नहीं होता।

और मेरा सवाल यहीं से शुरू होता है कि यह आप के साथ ही क्यों हुआ? और भी तो कई दूसरे मूल के खिलाड़ी अनेक टीमों में हैं, जो अपने अपने मूल देश के विशिष्ट व्यक्तियों से मिलते भी रहते हैं।

मगर कौन किससे मिल रहा है और कब, कहाँ, क्यों मिल रहा है, यह महत्वपूर्ण हो जाता है, वो भी तब जब आप एक स्वयं में महत्वपूर्ण व्यक्ति हों।

मैं तो नहीं जानता था कि आप के साथ यह सब चल रहा है फिर भी मैंने आप के खेल में एक किस्म की उदासीनता देखी थी। मगर आप को तो पता था कि आप इस मानसिक दौर से गुजर रहे हैं तो आप को अपनी टीम के हित में स्वयं विश्वकप के मैच के पहले अपने आप को अलग कर लेना चाहिए था।

अगर आप को संन्यास ही लेना था तो यह आप पहले भी ले सकते थे। क्या आप नहीं मानेगे कि जर्मनी का अपने अंतिम ग्रुप मैच में दक्षिण कोरिया जैसी सामान्य टीम से 0-2 से हारना एक ऐतिहासिक हार है, जिसके लिए आप भी बराबर से दोषी हैं। इस शर्मनाक हार ने क्या आप के दिल को नहीं कचोटा? लगता नहीं, वरना यह सब आप हार के बाद नहीं करते।

जिस जर्मन फ़ुटबाल ने आप को सबकुछ दिया उससे आप को ज़रा सी भी मोहब्बत होती तो आप वो सब नहीं करते जो आप ने किया।

क्या आप नहीं जानते थे कि जिस तुर्किश राजनेता के साथ आप फोटो खिंचवा रहे हैं वो चुनाव में है और उस राजनेता ने अपने चुनावी भाषण में अनेक बार आप के अपने देश जर्मनी के विरोध में आक्रामक बातें कहीं हैं?

क्या आप को ऐसे में अपने देश की भावना का ध्यान रखते हुए इससे दूर नहीं रहना चाहिए था?

आप इतने भी भोले नहीं। क्या आप नहीं जानते कि कोई भी घर-परिवार यह कभी बर्दाश्त नहीं करेगा कि उसके घर का कोई अहम् सदस्य उसके साथ फोटो खिचवाये जो आपके परिवार की मुखर आलोचना कर रहा हो? मगर आप ने किया, अगर आप को तुर्की की राजनीति में सक्रिय ही होना है तो खुल कर आते।

आप कहते हैं कि आप के साथ दोहरे मापदंड (तुर्की मूल का होने के कारण) अपनाये गए और आप को इसमें नस्लवाद की बू आती है। कितना हास्यास्पद है यह सब।

जो देश आप को सर पर बिठा चुका है उसकी आलोचना आप ने कितनी आसानी से कर दी। क्या आप इस बात से इंकार करेंगे कि अगर ऐसा होता तो आप कभी राष्ट्रीय टीम में नहीं चुने जाते।

आप यह तो मानेंगे कि आप जर्मन टीम से हैं, जर्मन टीम आप से नहीं। आप ने जर्मनी फुलबॉल महसंघ की आलोचना की, कितना दु:खद होगा उन सब को यह सब सुनना जिन्होंने आप को कभी चुना होगा। आप ने तो अपने प्रशंसकों को भी नहीं छोड़ा, उनकी भी आलोचना की। जिसने आप को स्टार बनाया उसी की आलोचना, कैसे कह पाए आप यह सब?

मगर आप के इस आलोचनात्मक वक्तव्य में मुझे बिलकुल भी हैरान नहीं किया। आप अकेले नहीं, ना ही पहले हैं। हर देश में एक ओज़िल मिल जाएगा। हमारे यहां भी एक अज़हरुद्दीन हुआ था।

और फिर खेल ही क्यों हर क्षेत्र में आप मिल जाते हैं। उदाहरण के लिए हमारे यहां एक आमिर खान हैं, उन्हें तो अचानक भारत देश ही असुक्षित लगने लगा था। एक हामिद अंसारी हैं, वे तो उपराष्ट्रपति के पद से हटते ही आप की तरह वक्तव्य देने लगे।

आप कहते हो कि आप के दो दिल हैं, एक जर्मन और एक तुर्किश। मगर क्या आप को पता नहीं कि दिल एक ही ठीक है, वरना दो-दो को आप दिल दे बैठो तो यह आप के लिए ही घातक होगा।

क्यों आप ने वो कहावत नहीं सुनी कि दो नावों पर सवार नहीं होते! और यहां तो आप एक साथ दो-दो जगह दिल्लगी करना चाहते हो, जबकि कोई भी महबूबा अपनी सौत को पसंद नहीं करती। मगर आप की विचारधारा में यह स्वीकार्य है, प्रचलन में भी है और यही समस्या भी है।

ये दो दिल ही कारण है जो आप किसी एक के साथ पूरी तरह शत प्रतिशत नहीं जुड़ पाते। यह संभव ही नहीं। वरना क्या कारण है जो हजारो लाखों हिन्दुस्तानी हर देश में हैं मगर कभी इस तरह की आलोचना का शिकार नहीं होते।

सिर्फ हिन्दुस्तानी ही नहीं, अन्य देश के असंख्य नागरिक दूसरे देशों में रहते हैं, मगर आमतौर पर कभी ऐसी किसी दुर्भावना का शिकार नहीं होते। जबकि आप की तरह ही दो दिल वाले, फिर चाहे वो तुर्की से आयें या सीरिया से या ईराक-पाकिस्तान से, अमूमन किसी ना किसी गलत कारण से ही दुनिया भर की चर्चा में आते हैं।

अहम् सवाल है कि आप के साथ ही दुनिया में यह सब क्यों होता है? कोई कारण तो होगा। आखिर क्या कारण है कि जर्मनी के पूर्व कप्‍तान और महान फुटबॉलर रहे लोथार मथायस यह कहने के लिए मजबूर हुए कि ओज़िल जर्मन टीम की जर्सी पहनकर खेलते हुए कभी भी सहज नहीं दिखे?

आखिर क्या कारण है जो जर्मनी के कुछ राजनेताओं ने और आमजन ने आप की जर्मनी के प्रति वफादारी पर संदेह जताया? मेरे लिए आप महत्वपूर्ण नहीं, यह सवाल महत्वपूर्ण है कि दुनिया में ओज़िल के साथ ही इस तरह का संदेह क्यों पैदा होता है?

इसका जवाब दुनिया को नहीं ओज़िल को ही ढूंढना होगा।

राहुल गांधी तो नहीं, पर हैरान करता है हमारा यह पतन

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY