सदियों में नहीं, पूरे इतिहास में केवल एक ही बार पैदा होता है रफी जैसा नायाब हीरा

आज मोहम्‍मद रफी की 38 वीं पुण्‍यतिथि है। निश्चित ही वे हिंदी सिनेमा के सर्वकालिक, सर्वश्रेष्‍ठ गायक तो हैं ही, वे एक दुर्लभ किस्‍म के इंसान भी थे। आने वाली पीढि़यों को यह विश्‍वास करना मुश्किल हो जाएगा कि क्‍या मोहम्‍मद रफी जैसा कोई इंसान वास्‍तव में हुआ भी था।

जहां तक गायन की बात है, रफी ने गायन विधा का स्‍तर इतना अधिक ऊंचा उठा दिया कि गाने-बजाने के प्रति उदासीन व्‍यक्ति भी गायन के लिए उत्‍सुक हो जाए।

उन्‍होंने अपने गीतों को इस ढंग से गाया कि हर गवैये का मन ललचाने लगता है कि काश हम भी ऐसा गा पाते।

रफी ने गायन को इस तरह स्‍थापित कर दिया कि लोग केवल रफी को सुनकर ही गाना सीख गए। फिर उन्‍हें किसी भी पाठशाला, घराने, गुरु आदि की ज़रूरत नहीं पड़ी।

रफी को सुनना अपने आप में एक संपूर्ण स्‍कूल या यूनिवर्सिटी का कोर्स पूरा करने के समान है। रफी की तारीफ में कहे गए शब्‍द अतिश्‍योक्ति इसलिए नहीं हो सकते क्‍योंकि उनकी तारीफ करने के लिए शायद कोई पैमाना बना ही नहीं है। प्रशंसा का हर शब्‍द उनके आगे बेमानी है।

निश्चित ही रफी जैसा नायाब हीरा सदियों में एक बार नहीं, पूरे इतिहास में केवल एक ही बार पैदा होता है। आज उनको गए 38 साल पूरे हो गए हैं और उनके गीत हर साल और अधिक गहरे होते जा रहे हैं।

अभागे हैं वो लोग जिन्‍होंने मनुष्‍य जीवन तो पाया लेकिन कोई शौक नहीं पाला। शौक तो पाला पर संगीत का नहीं पाला। संगीत का तो पाला लेकिन रफी को नहीं सुना, और रफी को न सुनना एक भरे-पूरे स्‍वर्ग से वंचित हो जाने जैसा है। बेशक, रफी जैसा कोई आदमी कभी जन्‍मा था, यह भी एक रहस्‍य ही बन जाने वाला है।

– नवोदित सक्तावत

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