घर आया मेरा परदेशी : कांग्रेस को धन्यवाद और बीजेपी को महज़ साधुवाद

किसी के घर आने की इच्छा है? आपका स्वागत है। लेकिन दरवाजा खटखटा कर उसकी अनुमति लें, फिर आएं।

अगर आप पिछले दरवाजे या टूटी खिड़की, नाली-नाबदान से उसकी जानकारी के बिना घुसेंगे तो आपको संवैधानिक और कानूनी रवायत से लतिया के निकालने का हक उसे है।

देश को उसका यह हक़ दिलाने के लिए कांग्रेस पार्टी को बहुत-बहुत धन्यवाद, आभार।

कांग्रेस पार्टी और स्व. पंडित नेहरू की दूरदृष्टि के चलते… स्व. राजीव गांधी के किये समझौते और देखे हुए सपने के पहले चरण को अपने कार्यकाल के मात्र दो सालों में पूरा करने के लिए असम की बीजेपी सरकार को साधुवाद।

आभार भारत के सर्वोच्च न्यायालय… सुप्रीमकोर्ट को, जिन्होंने 17 दिसंबर 2014 को इस मामले को देखते हुए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनसीआर) को अपडेट करने की समय सीमा तय की और खुद उसकी निगरानी भी शुरू की।

एनडीए की वर्तमान केंद्र सरकार को भी साधुवाद देना बनता है… क्योंकि उसके कार्यकाल में आये फैसले के क्रियान्वन का पहला चरण पूरा हुआ, जो 1951 में शुरू हुआ था।

कांग्रेस को धन्यवाद और बीजेपी को महज साधुवाद इसलिए क्योंकि :

– 1951 में पंडित नेहरू और उनकी सरकार ने भारत के नागरिकों का डाटा रखने के लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) बनाया।

– 1960 में सारा डाटा पुलिस वेरिफिकेशन के लिए पुलिस को दे दिया गया।

– लेकिन स्व. राजीव गांधी के कार्यकाल में… 1985 में इस काम में तेजी आई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि साल 1951 से 1971 तक असम में मुसलमानों की आबादी में 51% की बढ़त हुई।

– इसके बाद 1979 में इसके खिलाफ असम में बहिरावत आंदोलन शुरू हुआ। अंत में 1985 में स्व. राजीव गांधी के साथ समझौता हुआ। जिसमें असम समझौते के मुताबिक एनआरसी को अपडेट करने को कहा गया।

स्व. राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार का असम समझौता था :

– 24 मार्च 1971 की आधी रात तक जो भी भारत आये, उन्हें यहीं का नागरिक माना जाए।

– 1951 से 1961 तक भारत आये सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट डालने का अधिकार मिला।

– 1961 से 1971 के बीच आये लोगों को नागरिकता और अन्य अधिकार दिए गए लेकिन वोट का अधिकार नहीं दिया गया। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या फर्जी ढंग से वोटिंग करती भी रही।

अंततः असम सरकार ने 1951 के देखे पंडित नेहरू के सपने, 1985 के स्व. राजीव गांधी के समझौते और आदरणीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप : 2 करोड़ 89 लाख 38 हजार 677 लोगों की नागरिकता की पुष्टि की, और 40 लाख 52 हजार 703 लोगों को बाहरी दर्ज किया।

यह एक दीर्घकालिक योजना थी जिसका सपना पँडित नेहरू ने देखा और भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी और उनकी कांग्रेस सरकार ने इसे ज़मीन पर उतारने की भूमिका तैयार की, महत्वपूर्ण निर्णय लिए।

अब एक बड़ी जिम्मेदारी वर्तमान केंद्र सरकार पर है, जिससे अपेक्षा है कि संविधान की मंशा और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में इन बाहरी लोगों के बारे में उचित कार्यवाई सुनिश्चित कराए।

क्योंकि इन्हें ये हक़ हासिल हैं :

– सूची में जगह न पाने वालों के पास दुबारा प्रमाणों के साथ दावा करने का मौका और अधिकार है, जिसकी समय सीमा सुप्रीम कोर्ट तय करेगा।

– ये बाहरी लोग अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में भी अपील कर सकते हैं।

एक बहुत जरूरी ध्यान रखने की बात : एक भ्रम यह फैलाने का प्रयास हो सकता है कि इन ‘बाहरी’ लोगों में तमाम हिन्दू बंगाली, बिहारी, बौद्ध, जैन, सिख आदि लोग भी शामिल हैं।

तथ्य यह है : स्व. राजीव गांधी की सरकार का असम समझौता “बाहर से भारत आये” लोगों पर लागू है… जिसमें बांग्लादेशी, म्यांमार के हिन्दू, बौद्ध आदि भी शामिल हो सकते हैं। लेकिन किसी भारतीय बंगाली, बिहारी, मुसलमान, बौद्ध आदि पर इसका कोई असर नहीं जो असम में रहते आये हैं, जो असम के नागरिक हैं, जो असम के वोटर हैं। इसमें कोई गफलत नहीं होनी चाहिए।

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  1. दुनिया के किसी भी देश मे घुसपैठिये बोझ ही समझे जाते हैं। कर हम देते हैं, भारत के मेहनतकश नागरिक और मजे ये लेते हैं। ऊपर से हमारे अवसरों पर डकैती डालते हैं। जिस काम के लिए देसी मजदूर सौ रुपये लेता है, वही ये दस में करने को राजी हो जाते हैं। नुकसान किसका हो रहा है। भारत में बढ़ते अपराधों में इनकी बहुत बड़ी हिस्सेदारी है। ये जहाँ से वहां जाएं। अगर नही जाते या वह देश इन्हें वापस लेने को राजी नहीं है, इन्हें उठाकर समुद्र में फेंक दिया जाना चाहिए। दुसरो का कचरा हम अपने घर मे क्यो बटोरें?

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